समाज में सेक्स-खतरों पर खुली बातचीत की जरूरत

संपादकीय
19 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ के भिलाई में एक महंगे निजी स्कूल में चार बरस की छोटी सी बच्ची के साथ स्कूल के ही एक कर्मचारी द्वारा बलात्कार करने की खबर आ रही है। अभी वहां भीड़ लगी हुई है और तनाव जारी है, बच्ची के घरवालों की शिकायत के बाद आरोपी कर्मचारी को गिरफ्तार कर लिया गया है। इसके पहले भी न सिर्फ इस शहर में, बल्कि छत्तीसगढ़ के बहुत से शहर-कस्बों में, गांव-गांव के आदिवासी आश्रम-छात्रावासों में, मदरसों में और दूसरे धर्मों से जुड़ी हुई स्कूलों में ऐसे मामले हुए हैं, और एक भी मामला ऐसा नहीं रहा जिसमें कोई पकड़ाया न गया हो। लेकिन मुजरिम के पकड़े जाने और सजा पाने से बच्चों की बाकी पूरी जिंदगी पर लगने वाले जख्म की कोई भरपाई नहीं हो सकती। और छत्तीसगढ़ के जिस भिलाई में यह घटना हुई है, वह दुर्ग-भिलाई शहर बलात्कार के मामले में कई बार देश में सबसे अधिक बलात्कार वाले दस लाख आबादी के शहरों में सबसे ऊपर गिनाता है।
ऐसे हादसों की जानकारी पर हमारा एक बिना किसी आधार का अंदाज यह है कि दस-बीस में से कोई एक मामला ही बच्चे अपने मां-बाप या स्कूल-टीचर को बता पाते हैं, और उनमें से अधिकतर मामलों में पुलिस में शिकायत नहीं होती है कि कौन बदनामी झेले, कौन अस्पताल और कोर्ट-कचहरी में आते-जाते कैमरों का सामना करे। समाज में जब सेक्स-अपराधों के खिलाफ शिकायत के मामले में लोगों में हौसला कम है, और शिकायत के बाद भी कार्रवाई न होने पर छत्तीसगढ़ में ही लड़कियों और महिलाओं की आत्महत्या के मामले बहुत अधिक हैं, तो ऐसे में सरकार और समाज दोनों को मिलकर जागरूकता का एक अभियान चलाना चाहिए। हमारा ऐसा खयाल है कि बलात्कारी की नीयत चाहे जो भी हो, अपराध करने के ऐसे दौर के दौरान उसके दिमाग से यह डर निकल जाता है कि उसे किस तरह की जेल हो सकती है, और उतनी लंबी कैद के दौरान उसका परिवार किस तरह और किस हद तक तबाह हो सकता है। अगर समाज के लोगों को ऐसी नौबत का एहसास कराया जाए, तो हो सकता है कि कई मुजरिमों का ऐसे जुर्म का हौसला जवाब दे जाए। दूसरी तरफ परिवार और समाज को सरकार के साथ मिलकर खतरों की ऐसी नौबत को घटाना होगा जिनमें बच्चे या लड़कियां-महिलाएं अकेले रह जाते हैं, और किसी सेक्स-अपराधी के शिकार हो जाते हैं। स्कूलें, खेल के मैदान, काम की जगह, अस्पताल, या सूना घर, इन जगहों को किस तरह की सामाजिक या सरकारी निगरानी या सावधानी में रखा जा सकता है, इसके बारे में अपने मोहल्ले या कॉलोनी में लोगों को बैठकर सोचना चाहिए, और उसके रास्ते निकालने चाहिए। हमारा यह पक्का मानना है कि पुलिस की वर्दी और लाठी, बंदूक या निगरानी मिलकर भी न तो किसी बलात्कारी के दिल-दिमाग को पढ़ सकते, और न ही इस जुर्म को रोक सकते। इसलिए लोगों को ही सावधानी से ऐसे जुर्म के खतरे को घटाना होगा।
दूसरी बात यह कि बलात्कार से कम गंभीर सेक्स-अपराध ऐसे होते हैं जिनमें छोटे बच्चों के देह शोषण के मामले गिनती में बहुत अधिक होते हैं। यह बात अधिकतर हर परिवार के लोग, दोस्त और पड़ोसी, और परिचित लोग ही अधिक करते हैं। इसके बारे में भी स्कूलों को बच्चों को जागरूक करने का अभियान छेडऩा चाहिए, दिक्कत यह है कि इसे तुरंत यौन शिक्षा का लेबल लगाकर दकियानूसी लोग इसके खिलाफ अभियान छेड़ देते हैं। हम इन मुद्दों पर और अधिक लिखने के बजाय केवल यही चाहते हैं कि सरकार और समाज मिलकर इस तरह के सेक्स-खतरों पर खुलकर चर्चा करे, क्योंकि खुली बातचीत के बिना किसी तरह के बचाव की कोई गुंजाइश नहीं बन सकेगी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें