बस्तर के नक्सलियों से बातचीत की जरूरत

संपादकीय
2 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक तरफ तो पुलिस की अगुवाई में केन्द्र से आए हुए सुरक्षा बल भी नक्सलियों से मोर्चा लेने में लगे हुए हैं, और दूसरी तरफ राज्य सरकार नक्सल कब्जे से छूटते हुए इलाकों में काम करने की कोशिश भी कर रही है। आए दिन सरकार की तरफ से ब्यौरा जारी होता है कि बस्तर में कौन-कौन से निर्माण कार्य शुरू हुए हैं, कौन से पूरे हुए हैं, और कौन से चल रहे हैं। अभी जब हम यह बात लिख रहे हैं तब बस्तर में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सरकार की विकास योजनाओं और कामयाबी के बारे में भाषण दे ही रहे हैं। पिछले दिनों कई कार्यक्रमों में उन्होंने बस्तर की पुलिस की भी इस बात को लेकर तारीफ की, कि वह बहुत अच्छा काम कर रही है।
दूसरी तरफ बस्तर में काम करने वाले कई पत्रकारों और सामाजिक संगठनों, मानवाधिकार आंदोलनकारियों और वकीलों का लगातार यह आरोप जारी है कि बस्तर की पुलिस नक्सली बताकर बेकसूरों को मार रही है, आदिवासी लड़कियों के साथ बलात्कार कर रही है, और बेकसूरों को जेल डाल रही है। पुलिस और सामाजिक क्षेत्र के बीच बरसों से चल रहे इस टकराव के बीच बस्तर में समय-समय पर कुछ ऐसे सामाजिक संगठन भी सामने आए हैं जिनके बारे में लोगों को यह शक रहा कि वे पुलिस द्वारा प्रायोजित हैं, और पुलिस की तमाम ज्यादतियों पर पर्दा डालने के लिए, इसका विरोध करने वाले लोगों को नक्सली ठहराने के लिए बनाए गए हैं। यह टकराव भी बस्तर में खूब चल रहा है, और यह नया भी नहीं है। एक वक्त बस्तर के कलेक्टर रहे हुए पुराने वक्त के आईएएस अधिकारी डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा जब सामाजिक आंदोलनकारी की हैसियत से बस्तर गए थे, तो उन पर नक्सल समर्थक होने का आरोप लगाकर उनके कपड़े फाड़े गए थे, और शायद उनके चेहरे पर कालिख भी पोती गई थी। उनके अलावा स्वामी अग्निवेश का भी वही हाल हुआ था, और छत्तीसगढ़ के बाहर से आने वाले कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, कई पत्रकारों का बस्तर में यही हाल किया गया। कुल मिलाकर वहां एक ऐसा माहौल दिखता है कि जो कोई पुलिस के साथ पूरी तरह समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं है, उसकी उठाई गई हर आवाज नक्सल-समर्थक नारा है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का मिजाज जानने वाले लोग यह जानते हैं कि वे बस्तर किस्म की असंवैधानिक हिंसा की हिमायती नहीं हो सकते। लेकिन आज हकीकत यही है कि बस्तर के बेकसूर आदिवासी एक तरफ नक्सलियों के हाथों अपना गला कटवा रहे हैं, तो दूसरी तरफ बस्तर में पुलिस का एक किस्म से राज ही कायम है, और वहां पर पुलिस को जो नापसंद हैं, उनके कोई लोकतांत्रिक अधिकार नहीं हैं। यह नौबत इस वजह से भी आई हुई हो सकती है कि नक्सल मोर्चे पर बस्तर के बड़े पुलिस अफसर जिस तरह की हथियारबंद कामयाबी पा रहे हैं, उसे दिखाकर वे अपनी बाकी बातों के लिए एक किस्म की मंजूरी सरकार से पा रहे हैं। हमारा यह मानना है कि सरकार को इन दोनों बातों को अलग-अलग करके देखने की कोशिश करनी चाहिए, और असल नक्सलियों को मारने में कामयाबी पाने से किसी को सामाजिक आंदोलनों को कुचलने की इजाजत, मीडिया का गला घोंटने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। नक्सलियों की लाशें तो आती-जाती रहेंगी, लेकिन इतिहास बेकसूरों पर ज्यादती को भी बड़ी गंभीरता से दर्ज करता है।
आज छत्तीसगढ़ के बाहर इस राज्य के बारे में अगर कोई एक बात सरकार के खिलाफ जाती है, व्यापक प्रचार पाती है, तो वह बस्तर के इलाके में पुलिस ज्यादतियों की है। हमारा यह मानना है कि नक्सलियों को मारने के लिए बाकी लोगों पर ज्यादती करने की कोई जरूरत नहीं है, और न ही यह न्यायसंगत है कि पुलिसिया कामयाबी पाने वाले को ज्यादती करने की छूट दे दी जाए। राज्य सरकार को आज उसके साथ योजना मंडल में काम करने वाले भूतपूर्व मुख्य सचिव सुनील कुमार सरीखे किसी अधिकारी का इस्तेमाल करके नक्सलियों से बातचीत का सिलसिला शुरू करना चाहिए। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले बस्तर में एक कलेक्टर का अपहरण हुआ था, तब उनके साथ बातचीत करने वाले सरकारी लोगों में सुनील कुमार भी थे। उनको आदिवासी मामलों की समझ भी है, और वे पहले ऐसी समझौता और शांति की बात कर भी चुके हैं। उनके जैसे कुछ और लोग भी हो सकते हैं, और छत्तीसगढ़ सरकार को ऐसी बातचीत की पहल करनी चाहिए। बंदूकों का मोर्चा चलते रह सकता है, लेकिन उसकी लागत बहुत अधिक आ रही है, रूपयों के खर्च में भी, और बेकसूर आदिवासियों के अधिकारों की शक्ल में भी।

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