नई दीवाली के बहाने, पुरानी सलाह फिर से

संपादकीय
20 अक्टूबर 2016
आज हिन्दुस्तान का तकरीबन पूरा ही हिस्सा एक बड़े त्योहार दीवाली की तैयारियों में लगा है, घरों की साफ-सफाई, रंग-रोगन किए जा रहे हैं। इसके कुछ दिन पहले ही गांधी जयंती पर दो अक्टूबर को देश भर में स्वच्छता अभियान एक बार फिर शुरू हुआ। सड़कों के किनारे झाड़ू लिए हुए नेता और अफसर तस्वीरें खिंचवाकर छपवा भी चुके हैं, और उसके बाद अब शहरी इलाके फिर से घूरे जैसे दिखने लगे हैं। ऐसे में सार्वजनिक जगहों से परे, निजी जिंदगी में भी एक सफाई की गुंजाइश बनती है और इसके बारे में लोगों को सोचना चाहिए। हम हर बरस इन्हीं दिनों इस मुद्दे पर लिखते हैं, और हो सकता है कि कुछ लोगों पर उसका असर भी होता है।
मध्यम वर्ग और उससे ऊपर के तबकों में, घरों में बहुत से सामान ऐसे रहते हैं जो कि कचरा नहीं रहते, खराब नहीं रहते, लेकिन वे बेकार पड़े रहते हैं, या बेकाम रहते हैं। चीजों का मोह ऐसा रहता है कि लोग कई बार बच्चों के झूले, उनको घुमाने की गाडिय़ां, अगली पीढ़ी तक सम्हालकर रख लेते हैं। यही हाल कपड़ों और जूतों का रहता है, नए सामान आते जाते हैं, और पुरानों की बिदाई कभी नहीं हो पाती। संपन्नता जितनी अधिक रहती है, घरों में कबाड़ उसी अनुपात में बढ़ते चलता है। घर पर कोई साइकिल चलाने वाले नहीं रह जाते, लेकिन जंग खाती साइकिल रह जाती है। लेकिन बड़े सामानों से परे, बहुत से छोटे सामान भी रहते हैं। दवाइयां बची रह जाती हैं, बदले हुए नंबरों के नए चश्मे आ जाते हैं, और पुराने चश्मे पड़े रहते हैं। ऐसे अनगिनत सामान रहते हैं जिनको कि दूसरे जरूरतमंद लोग इस्तेमाल कर सकते हैं।
कई बरस पहले हमने इसी जगह पर 'दस का दम' नाम का एक ऐसा अभियान सुझाया था कि जिसके तहत उत्साही लोग दस-दस के समूह बनाएं, और अपने आसपास के लोगों के घरों से फालतू सामान इकट्ठा करके उसे जरूरतमंदों तक पहुंचाने का काम करें। हमने यह भी सुझाया था कि जिस तरह नेटवर्क मार्केटिंग के नाम पर झांसा देने वाली कंपनियां अपनी चेन बढ़ाती चलती हैं, उसी तरह नेक काम का सिलसिला भी फैलते चल सकता है, और उत्साही लोगों में से हर कोई अपने साथ ऐसे दस लोगों को जोड़ सकते हैं, जो कि आगे वैसे ही दस-दस उत्साही लोगों को जोडऩे के लिए तैयार हों। हमने यह बात कई बरस पहले लिखी थी, और अभी सफाई अभियान के समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ठीक इसी तरह का काम किया, और उन्होंने देश के नौ प्रमुख लोगों के नाम लिए, और उन्हें सफाई अभियान को आगे बढ़ाने के लिए जिम्मा दिया। इसके बाद ये प्रमुख लोग अपने आसपास के और लोगों के नाम ले रहे हैं, और यह सिलसिला उसी तरह आगे बढ़ रहा है।
सालाना सफाई के त्यौहार दीवाली के मौके पर हम इस सोच को फिर याद दिला रहे हैं कि धरती पर नए सामानों का बोझ घटाने के लिए, घरों से कबाड़ का बोझ कम करने के लिए, और जरूरतमंद तबके की मदद करने के लिए इस तरह का 'दस का दम' अभियान लोगों को आगे बढ़ाना चाहिए, और यह याद रखना चाहिए कि जिंदगी में जब हम अच्छे काम करते हैं, तो उससे एक ऐसी ताकत भी मिलती है कि तन और मन बाकी कामों को भी बेहतर कर सकते हैं। अमरीका जैसे पूंजीवादी देश में भी किसी कंपनी का मुखिया बनाने के पहले इस बात को देखा जाता है कि ऐसे लोग सामाजिक सरोकारों के काम कर चुके हैं या नहीं। वहां के सबसे कामयाब लोगों में से एक, बिल गेट्स अभी पूरी दुनिया में घूम-घूमकर खरबपतियों का हौसला बढ़ा रहे हैं कि वे अपनी पूंजी का कम से कम आधा हिस्सा समाज सेवा के लिए दें।
हम अपने आसपास ऐसे बहुत से लोगों को देखते हैं जो कि बिना किसी मतलबपरस्ती के, दूसरों के भले के लिए कुछ न कुछ करते रहते हैं। यह एक अलग बात है कि भले लोग खबरों में कम आते हैं, और मीडिया जुर्म की खबरों से भरे रहता है। लेकिन अच्छा काम करने के लिए खबरों में जगह पाने की कोई जरूरत नहीं रहती। लोग घरों से कबाड़ निकालकर समाज के कमजोर तबके तक बांटने का सिलसिला शुरू करें, तो उन्हें देखकर हर किसी को यह याद पडऩे लगेगा कि वे अपने घर से कौन सा कबाड़ कम कर सकते हैं। और सामानों के इस तरह दो-चार बार इस्तेमाल से ही धरती के साधनों का बचाव होगा, और धरती बच सकेगी।

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