उत्तरप्रदेश में सपा राजनीति एक नई नौजवान करवट...

संपादकीय
23 अक्टूबर 2016
उत्तरप्रदेश में सामंती मालिकाना हक की तरह, समाजवाद के नाम पर चलाई जा रही पार्टी और सरकार झेल रही है अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी दरार। ऐसा लग रहा है कि मुलायम सिंह और उनके बेटे के बीच यह पार्टी ऊपर से नीचे तक पूरी तरह दो फांक होने जा रही है, और यह शायद भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा दलीय विभाजन होगा जो कि बाप-बेटे को एक-दूसरे के सामने खड़ा कर देगा। हालांकि अभी इस लड़ाई में कई और बातें आना बाकी है, लेकिन अपने मौजूदा मतभेदों की वजह से भी आज यह मुद्दा लिखने लायक है।
दरअसल भारतीय लोकतंत्र में समाजवाद के नाम पर जिस तरह का सामंतवाद चलता है, उसकी दो सबसे बड़ी मिसालें उत्तरप्रदेश और बिहार के ये दो बड़े यादव कुनबे हैं जो कि अब समधियाना भी बन चुके हैं। जब ऐसे बड़े-बड़े परिवार अपने सारे विस्तार के साथ एक ही पार्टी, एक ही सरकार, और एक ही प्रदेश पर इस तरह लद जाते हैं कि किसी को सांस लेने के लिए भी अलग से जगह न मिले, तो ऐसे तनाव और ऐसी खींचतान अनहोनी नहीं कही जा सकती। फिर यह भी है कि मुलायम सिंह की राजनीति किसी ईमानदारी के लिए नहीं जानी जाती। अनुपातहीन सम्पत्ति के मामले उनके कुनबे पर चलते रहे हैं, और उत्तरप्रदेश में जातिवाद, भ्रष्टाचार, सत्ता की मनमानी, इन सब में मुलायम सिंह की परले दर्जे की दखल सुनाई पड़ती है। ऐसे में एक नई पीढ़ी का, विदेश में पढ़कर लौटा नौजवान अगर पार्टी और सरकार के तौर-तरीकों को थोड़ा सा बदलने की कोशिश करता है, तो एक स्वाभाविक टकराव होना बड़ी स्वाभाविक बात है। और समाजवादी पार्टी में आज कुछ उसी तरह की हलचल हो रही है जैसी कि धरती के नीचे लाखों बरस पहले की चट्टानी प्लेटों के खिसकने से भूकंप की शक्ल में होती है।
उत्तरप्रदेश के सामने खड़े चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का भविष्य अभी असमंजस में दिख रहा था। रीता बहुगुणा जैसे जिन नेताओं ने पार्टी को पूरी तरह से डुबाकर रख दिया था, उन्हें किसी चैंपियनशिप की ट्रॉफी की तरह पार्टी में लाकर, सजाकर भाजपा अपनी दुविधा का सुबूत दे रही थी। ऐसे में सबसे बड़ी समाजवादी पार्टी में इस तरह का दो फांक विभाजन भाजपा के लिए बड़े मजे का हो सकता है, लेकिन सिर्फ एक खतरा ऐसे में बाकी दिखता है कि अगर समाजवादी पार्टी का अखिलेश वाला हिस्सा और कांग्रेस पार्टी मिलकर कोई गठबंधन बनाएं, तो भाजपा के सामने एक नई परेशानी खड़ी हो सकती है। उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह की राजनीति अगर इस तरह की एक नौजवान करवट लेती है, तो हो सकता है कि आगे चलकर प्रदेश के लिए वह एक अच्छी बात हो। हम किसी की ईमानदारी और बेईमानी के बारे में यहां अटकलबाजी करना नहीं चाहते, लेकिन उत्तरप्रदेश को करीब से देखने वाले बहुत से अखबारनवीस यह लिखते हैं कि अखिलेश एक बेहतर मुख्यमंत्री हैं, और शायद कम बेईमान हैं, या शायद कुछ ईमानदार हैं। अगर ऐसी बात होती है तो फिर एक सामंती, जातिवादी, और भ्रष्ट पीढ़ी का राजनीति के हाशिए पर चले जाना ही बेहतर होगा।
उत्तरप्रदेश की राजनीति पूरे उत्तर भारत या पूरे हिन्दी भाषी इलाके को प्रभावित करने वाली राजनीति रहती है, और सांसदों की संख्या के हिसाब से भी यह प्रदेश देश में सबसे बड़ा प्रदेश है जिसकी वजह से संसद में भी इस राज्य की पसंद देश की पसंद बनने की संभावना रखती है। ऐसे में एक नई पीढ़ी अगर राजनीति में आगे बढ़ रही है, तो पारिवारिक टकराव के बावजूद इसके कुछ अच्छे नतीजे हो सकते हैं। फिलहाल यह लिखना समय के पहले लिखने की तरह है, और हो सकता है कि आने वाले हफ्तों में बाप-बेटे एक बार फिर एक साथ हो जाएं। अब उत्तरप्रदेश में कल तक जो रीता बहुगुणा मोदी और अमित शाह के खिलाफ जहरीली और तेजाबी ट्वीट करती थीं, वे आज भाजपा का दुपट्टा पहनकर बड़े गर्व के साथ एक नई पारी शुरू कर रही हैं। तो जिस राजनीति में ऐसे अजीब हमबिस्तर होते हों, वहां पर मुलायम और अखिलेश तो फिर भी अब तक एक ही पार्टी के बाप-बेटे हैं।

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