सोशल मीडिया से पाखंड का भांडा फूट रहा है...

संपादकीय
24 अक्टूबर 2016
हिन्दुस्तान में आज उग्र राष्ट्रवाद के चलते हुए जिस तरह से पाकिस्तान और चीन के सामानों और इंसानों के बहिष्कार के फतवे चल रहे हैं, उनमें सोशल मीडिया की मेहरबानी से भांडाफोड़ भी होते चल रहा है। मुंबई में एक कागजी शेर राज ठाकरे ने फतवा जारी करके पाकिस्तानी कलाकार वाली एक मुंबईया फिल्म के बहिष्कार का नारा दिया, तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने अपनी लोकतांत्रिक और संवैधानिक जिम्मेदारी भूलकर राज ठाकरे और फिल्म उद्योग के बीच बिचौलिया बनकर यह समझौता कराया कि इस फिल्म का निर्माता सैनिक कल्याण कोष में पांच करोड़ दान देगा। लेकिन इसके बाद एक बड़ी जायज प्रतिक्रिया भूतपूर्व सैनिकों से लेकर शिवसेना के उद्धव ठाकरे तक से आई कि ऐसी फिरौती के अंदाज में वसूली गई रकम की जरूरत हिन्दुस्तान के सैनिकों को नहीं है।
दूसरी तरफ बाजार में सामानों के बहिष्कार का नाटक भी पूरी तरह से उजागर हो रहा है। जो बाबा रामदेव चीनी सामानों के बहिष्कार का फतवा दे रहे हैं, उनकी खुद की ट्वीट चीन में बने हुए मोबाइल फोन से पोस्ट हो रही है। दूसरी तरफ उनकी कंपनी जो आयुर्वेद दवाएं बेचती है, उनमें मुल्तानी मिट्टी भी शामिल है जो कि पाकिस्तान के मुल्तान की मिट्टी है। और जिन पार्टियों के लोग लगातार ऐसे बहिष्कार की बात कर रहे हैं, उनमें से भाजपा के राज वाले महाराष्ट्र और गुजरात ने अभी-अभी चीनी कंपनियों के साथ दसियों हजार करोड़ रूपए के अनुबंध किए हैं, और हैरानी और हिकारत की बात यह है कि सड़क किनारे दस-बीस रूपए के चीनी सामान बेचने वाले फेरीवालों के सामानों का बहिष्कार किया जा रहा है। लोगों को इस बात की जानकारी कम है कि नरेन्द्र मोदी और नवाज शरीफ इन दोनों के एक सरीखे करीब उद्योगपति सजन जिंदल ने इन दोनों के बीच बातचीत और दोस्ती करवाई, और सजन जिंदल सहित अदानी-अंबानी जैसे उद्योगपति पाकिस्तान के साथ हजारों करोड़ का कारोबार कर रहे हैं। तो बहिष्कार के फतवे महज छोटे लोगों के लिए हैं, और ऐसे दिखावे के लिए हैं जिनसे हिन्दुस्तान के मक्कार लोग अपनी राष्ट्रभक्ति और अपने राष्ट्रप्रेम के सुबूत बैनरों की तरह हवा में लहरा सकें।
आज जब किसी राजनीतिक दल के नेता ऐसे बहिष्कार के फतवे दें, तो उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि देश के बाकी कारोबार का हिसाब भी सामने रखें। छोटे लोगों के पेट पर लात मारना, और खरबपतियों के कारोबार को जारी रखना, यह कहां का देशप्रेम है? सोशल मीडिया की मेहरबानी से लोगों का ऐसा पाखंड उजागर होते चल रहा है। देश के भीतर के मुद्दों पर भी यह बात बार-बार उजागर हुई कि किस तरह गाय को बचाने के नाम पर इंसानों के कत्ल की वकालत करने वाले नेता गाय काटने और गोश्त बेचने वाले कारखानों में भागीदार हैं, उनसे करोड़ों का चंदा लेते हैं। यह एक अच्छी बात है कि सोशल मीडिया से भारत के बेजुबान लोगों को एक नया अधिकार मिला है, और देश-विदेश के ऐसे पाखंड का भांडा फूट रहा है।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति ब्लॉग बुलेटिन - कर्नल डा॰ लक्ष्मी सहगल की १०२ वीं जयंती में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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