टाटा के मुखिया की बर्खास्तगी से निकलने वाले सबक

संपादकीय
26 अक्टूबर 2016
भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक, टाटा को परिवार से बाहर का एक आदमी संभाल रहा था, लेकिन उसके तौरतरीकों से खफा होकर टाटा के डायरेक्टरों ने एक मिनट में उसे बाहर कर दिया, और पिछले मुखिया रतन टाटा को चार महीनों के लिए वापिस बुलाकर कंपनी संभालने का जिम्मा दिया है। रतन टाटा इस कंपनी के संस्थापक परिवार के थे, और कंपनी के शेयर होल्डर भी थे। वे अपनी मर्जी से कुछ समय पहले रिटायर हुए थे, और घर बैठकर अपनी पूंजी को नए-नए कारोबारियों के साथ लगा रहे थे, और समाजसेवा के कुछ काम कर रहे थे। उनकी जगह साइरस मिस्त्री नाम के जिस नौजवान को यह विशाल साम्राज्य दिया गया था, वह कारोबार को भी शायद ठीक से नहीं संभाल पाया था, और कंपनी से जुड़े हुए समाजसेवा के काम भी वह शायद ठीक से नहीं देख पा रहा था।
अब देश के निजी क्षेत्र के इस एक सबसे बड़े ओहदे को संभाल रहे आदमी को जिस तरह पलभर में निकाल कर बाहर कर दिया गया है, उसे देखते हुए सोशल मीडिया पर यह मजाक किया जा रहा है कि सुरक्षित तो सरकारी नौकरी ही होती है, बाकी कोई नौकरी सुरक्षित नहीं रहती। अब इतना बड़ा तो ओहदा देश में अधिक संख्या में नहीं हो सकता, लेकिन इससे छोटे-छोटे पदों पर बैठे हुए लोग भी एक सबक ले सकते हैं कि आज की बाजार व्यवस्था में कोई भी कुर्सी ऐसी सुरक्षित नहीं रहती कि उस पर बैठे हुए लोग काम ठीक से न करते हुए भी अपनी नौकरी बचा सकें। यह बात छोटी-छोटी कुर्सियों पर भी लागू होती है, और सरकार से परे भी हर जगह इसलिए लागू होती है कि मजदूर और कर्मचारी कानून भी निकम्मेपन को नहीं बचा सकते। यह निकम्मापन टाटा के इस अफसर के संदर्भ में नहीं कहा जा रहा है, लेकिन जितने तरह की उम्मीदें किसी से कंपनी करती है, या मालिक करता है, उसे पूरा करना ही नौकरी को बचा सकता है।
दुनिया में जो कामयाब और उदार अर्थव्यवस्थाएं हैं, वे किसी तरह की सुरक्षा कर्मचारियों को नहीं देती हैं, और अमरीका जैसे देश में लोगों को बस दराज खाली करके निकलने जितना वक्त मिलता है। भारत में भी लोगों के सामने यह मिसाल बेहतर काम करने के लिए एक प्रेरणा की तरह काम आनी चाहिए। काम अच्छा होने पर लोग कम उम्र में भी आगे बढ़ सकते हैं, और काम अच्छा न होने पर कोई भी नौकरी कायम भी नहीं रहती। टाटा में हुए इस ताजा फेरबदल की बाकी जानकारी आने में कुछ दिन का वक्त लगेगा, लेकिन यह बात सोचने के लायक है कि समाजसेवा में कंपनी की भूमिका को ठीक से ना निभाना भी कुर्सी जाने की वजह हो सकता है। 

1 टिप्पणी:

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति मन्मथनाथ गुप्त और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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