आतंक के खिलाफ दुनिया के सबसे बड़े आतंकी की नसीहत

संपादकीय
27 अक्टूबर 2016
अमरीकी विदेश मंत्रालय ने अभी एक मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि दक्षिण एशिया में आतंकवाद से निपटने के लिए मिलजुलकर काम करने की जरूरत है। यह बात कहने और सुनने में अच्छी लगती है, और यह बात दक्षिण एशिया से परे भी दुनिया के तमाम देशों पर लागू होती है। लेकिन अमरीका का कहा हुआ और उसका किया हुआ, इन दोनों में बड़ा फर्क रहता है। खुद अमरीका दुनिया के अनगिनत देशों में अपनी खुफिया एजेंसी सीआईए के मार्फत गृहयुद्ध छिड़वाते आया है, तख्तापलट करवाते आया है, और इराक के मामले में उसने हद ही पार कर दी थी जब उसने सीआईए के गढ़े हुए झूठे किस्सों को सुबूत की तरह पेश करके जनसंहार के हथियारों को खत्म करने के नाम पर इराक पर फौजी हमला किया, और लाखों लोगों को मार डाला। इस पूरी कार्रवाई के बाद वहां से एक हथियार भी बरामद नहीं हुआ है। इसलिए यह मानना गलत है कि आतंकी सिर्फ कोई संगठन या गिरोह होते हैं, दुनिया में अमरीका सरीखी सरकार अपने आपमें आतंकी संगठन है, और वह हथियारों के बिना तो सारे वक्त आर्थिक प्रतिबंधों की नाकेबंदी से आतंक फैलाती है, गरीब मुल्कों से उनका छीनती है, और लोकतंत्र लाने के नाम पर देशों को तबाह करके वहां अपनी पि_ू तानाशाह सरकारें बिठाती है। अमरीका का इतिहास इस बात का गवाह है कि उसने कहीं तालिबानों को बढ़ावा दिया, तो कहीं किसी और आतंकी संगठन को। आज अमरीका पाकिस्तान और भारत जैसे देशों के सिलसिले में मसीहाई अंदाज में यह नसीहत देता है कि आतंक के खिलाफ मिलजुलकर काम करने की जरूरत है, तो यह एक बड़े पाखंड के अलावा और कुछ नहीं है।
दरअसल अमरीका अपनी कारोबारी और फौजी नीयत के चलते हुए दक्षिण एशिया के इस इलाके में जिस तरह से पाकिस्तान में तानाशाही, फौजी मनमानी, और आतंकियों को बढ़ावा देते आया है, और एक कमजोर लोकतंत्र को अपने पर आश्रित मुल्क बनाकर रखते आया है, उसके चलते ही इस इलाके में आतंक पनपा है। भारत और पाकिस्तान के रिश्ते शायद इतने खराब न हुए होते, अगर पाकिस्तान के पास अमरीका से आई हुई बहुत बड़ी आर्थिक मदद न होती। अगर महज अपने पैसों से पाकिस्तान को फौजी और आतंकी तैयारी करनी होती, तो उसके लोग भूखे मर गए होते। इसलिए अमरीका के लिए नसीहत देने के लिए ज्यादा आसान बात हो सकती थी, पाकिस्तान की फौजी और आतंकी नीयत और हरकत पर रोक लगाना। और ऐसा भी नहीं है कि हम यहां हिन्दुस्तान में बैठकर यह बात कह रहे हैं, खुद अमरीकी संसद में समय-समय पर कई लोग इस बात को उठाते आए हैं कि पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद रोकी जाए। लेकिन अमरीका की एक मजबूरी यह भी है कि अगर वह पाकिस्तान को बेआसरा, बेसहारा छोड़ दे, तो पाकिस्तान पल भर में चीन की गोद में जाकर बैठ जाएगा, और यह बात अमरीका की विस्तारवादी फौजी नीति और नीयत के खिलाफ जाएगी। इसलिए अमरीका इस इलाके में आतंक फैलने देने की कीमत पर भी पाकिस्तान को पाल रहा है, और बाकी लोगों को नसीहत दे रहा है कि वे लोग मिलजुलकर आतंक से लड़ें।
आज दुनिया में संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था महज बहस और कागजी फैसलों का दफ्तर बनकर रह गई है, और जिस अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र के लिए अपनी जमीन पर जगह दी थी, वह अमरीका इस अंतरराष्ट्रीय संस्था को एक पांवपोंछने की तरह मानता है, और इसके दर्जन भर बयानों के बावजूद उसके खिलाफ जाकर अमरीका ने इराक पर हमला किया था। दुनिया चाहे लोकतांत्रिक रूप से कितनी भी विकसित होने की खुशफहमी न पाल ले, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और फैसलों में एक पुरानी कहावत ही लागू होती है कि जिसकी लाठी, उसकी भैंस। इसलिए अमरीका दुनिया भर में आतंक को बढ़ावा देकर भी यह नसीहत बांट रहा है कि लोग आतंक के खिलाफ मिलजुलकर लड़ें।

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