लोकतंत्र में बातचीत सबसे सस्ता हथियार और औजार

संपादकीय
28 अक्टूबर 2016
भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री और भाजपा के एक वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा के साथ देश के कुछ प्रमुख लोग अभी कश्मीर गए और वहां करीब दो दर्जन प्रमुख लोगों, तबकों से बात करके यह तलाशने की कोशिश की कि कश्मीर में कैसे अमन-चैन लौट सकता है। उन्होंने यह साफ कर दिया था कि यह उनकी निजी पहल है और उनके पास पार्टी या केन्द्र सरकार का कहा हुआ कुछ नहीं है, और यह एक गैरसरकारी पहल है। जिन लोगों ने कश्मीर को ध्यान से देखना जारी रखा है, उन्हें यह देखकर खुशी हुई होगी कि वहां के जिन अलगाववादियों से बात करने में केन्द्रीय गृहमंत्री ने अपने कश्मीर प्रवास के दौरान परहेज किया था, और जिन अलगाववादियों ने राजनाथ सिंह के साथ गए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के गैरसरकारी, गैरभाजपाई सदस्यों से भी बात करने से इंकार कर दिया था, उन अलगाववादियों से भी यशवंत सिन्हा वाले प्रतिनिधिमंडल की बातचीत हुई। और यह बात उभरकर सामने आई कि अलगाववादी कश्मीर-समस्या का एक अपरिहार्य हिस्सा हैं, और उनसे बात किए बिना समाधान की पूरी कोशिश नहीं हो सकती। दूसरी बात यह भी उभरकर सामने आई कि बातचीत बिना किसी शर्त के ही हो सकती है।
हम दूर कश्मीर से हटकर थोड़ा करीब आएं तो बस्तर के बारे में अभी सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को यह सुझाया कि वह नक्सलियों से बातचीत करें। ऐसी शांतिवार्ता की यह सलाह कोई आदेश तो नहीं हो सकती, लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट की बात वजनदार रहती है, और बस्तर के बहुत से मोर्चों को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत में इतने किस्म के मुकदमे चल रहे हैं कि राज्य सरकार भी शायद सुप्रीम कोर्ट से उसके अधिकार क्षेत्र को लेकर बहस करने के बजाय बातचीत की एक और कोशिश को बेहतर समझे, और वही लोकतंत्र के लिए बेहतर भी होगा। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश आने के हफ्ते-दस दिन पहले ही हमने इसी जगह संपादकीय में यह बात राज्य सरकार को सुझाई थी, और ऐसे मध्यस्थ के रूप में हमने एक पिछले मुख्य सचिव सुनील कुमार का नाम भी लिखा था जो कि बस्तर के एक कलेक्टर के अपहरण के बाद रिहाई की समझौता-वार्ता में शामिल रह चुके हैं।
कश्मीर हो या बस्तर हो, बातचीत के बिना लोकतंत्र का कोई गुजारा नहीं हो सकता। ब्रिटेन में उत्तरी आयरलैंड का सशस्त्र आंदोलन एक सदी से भी अधिक वक्त से चले आ रहा था। आए दिन इसमें कत्ल होते थे, और धमाके होते थे। वह सशस्त्र आंदोलन राजनीतिक विचारधारा वाला भी था। और जब कई दौर की शांतिवार्ताएं असफल साबित हो चुकी थीं, तो अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन बरस 2000 में उत्तरी आयरलैंड पहुंचे और सभी तबकों को बिठाकर मध्यस्थता की, उस वक्त समझौते के बाद हथियार डाले गए, और तब कायम हुई शांति आज तक चली आ रही है। इसलिए समझौते में हथियार रखे-रखे भी वार्ता होती है, दोनों तबकों को अपने पिछले कड़े रूख को छोड़कर कुछ-कुछ कदम आगे बढऩा पड़ता है, ऐसे मध्यस्थ स्वीकार करने पड़ते हैं जो कि दोनों पक्षों को मान्य हों, और जब नीयत अमनवापिसी की हो, तो फिर अहंकार को परे रखकर बातचीत करके अमन की कोशिश की जानी चाहिए और वैसी कोशिश ही कामयाब भी होती है। पिछली कई वार्ताओं की असफलता को देखकर निराश होकर नहीं बैठना चाहिए, और पूरी शांति कायम होने तक बातचीत जारी रखनी चाहिए। हमारा यह मानना है कि बातचीत के पहले कोई शर्त नहीं होनी चाहिए, और किसी मुद्दे से जुड़े हुए तमाम लोगों से बिना किसी परहेज के बातचीत होनी चाहिए। अविभाजित मध्यप्रदेश का इतिहास गवाह है कि अर्जुन सिंह ने डाकुओं से बात करके उनका आत्मसमर्पण करवाया था, और मध्यप्रदेश-उत्तरप्रदेश सीमा के करीब दशकों से आतंक बने हुए डाकू घर बैठ गए थे। अब उस वक्त कोई ऐसी शर्त रखी जाती कि पहले हथियार डाले जाएं, फिर बातचीत शुरू होगी, तो वह बात किसी किनारे पहुंचती ही नहीं। और ऐसी तमाम बातचीत की अधिक जिम्मेदारी उन लोकतांत्रिक सरकारों की होती है जो कि लोकतंत्र के आधार पर चुनकर आईं हैं, जिन्होंने लोकतंत्र की शपथ ली है, और जिनका लोकतंत्र पर भरोसा है। ऐसी सरकारों की जीत तो उसी दिन हो जाती है, जब ये सरकारें लोकतंत्र पर भरोसा न रखने वाले लोगों, अलगाववादी लोगों, हिंसक और हथियारबंद आंदोलन चलाने वाले लोगों को बातचीत की मेज पर ले आती हैं। इस जीत के बाद की समझौते की जीत तो छोटी होती है। इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने जो सुझाया है, या निर्देश दिया है, हम उसे सही मानते हैं, और कश्मीर से लेकर बस्तर तक, उत्तर-पूर्व से लेकर पाकिस्तान तक, देश के भीतर और बाहर, बातचीत की हर कोशिश होनी चाहिए क्योंकि तमाम हथियारों और बुलेटप्रूफ जैकेटों के रहते हुए भी, लोकतंत्र में बातचीत सबसे सस्ता हथियार और औजार है।

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