सरकार हो या अखबार, सभी नजरियों की भागीदारी जरूरी..

संपादकीय
29 अक्टूबर 2016
मध्यप्रदेश के मंदसौर की एक खबर है कि वहां सरकारी कॉलेज में दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं को सरकार की एक योजना के तहत पीठ के जो बैग बांटे गए, उन पर पीछे एसटी-एससी योजना के तहत छपा हुआ है। जब इस पर हंगामा हुआ तो प्रिंसिपल का कहना था कि अगर किसी को इससे आपत्ति है तो वे बैग पर से इसे मिटवा देंगे। ऐसा ही हाल गरीब बस्तियों में कई जगह घरों के बाहर दीवारों पर दिखता है जहां सरकार मकानों पर गरीबी की रेखा के नीचे, या जाति का जिक्र लिखवा देती है। समाज और सरकार में जगह-जगह ऐसी कई बातें नजर आती हैं, और उनसे यह लगता है कि ताकत और अहमियत के बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों को भी कुछ समझ पाने की जरूरत बाकी है।
यह लिखने का मकसद कहीं भी दूसरों की आलोचना करना नहीं है, खुद मीडिया में समझ की कमी की ऐसी हालत है कि उसकी ऊंची कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को सामाजिक हकीकत का अंदाज भी नहीं रहता। भारत के काफी बड़े हिस्से के, कम से कम हिन्दी मीडिया को देखते हुए ऐसा लगता है कि अखबारों में लिखने का हक रखने वाले अखबारनवीसों के बीच सवर्णों का बोलबाला है। बहुत ही कम पत्रकार अल्पसंख्यक तबकों से आते हैं, या कि दलित-आदिवासी रहते हैं। संपादकों के नाम भी देखें तो शायद ही कोई ऐसे तबकों में से आया हुआ हो। नतीजा यह होता है कि जब सामाजिक मुद्दों पर बातचीत होती है, तो सबसे दबे-कुचले लोगों की बात कहने वाले लोग वहां पर नहीं रहते। और हिन्दुस्तान के ऐसे हाल को जब अमरीका या ब्रिटेन के मीडिया से देखें, तो फर्क समझ आता है कि किस तरह पश्चिम के प्रतिष्ठित अखबार या टीवी समाचार चैनलों में काम करने वाले प्रेस या मीडियाकर्मियों को उनके धर्म, या उनके रंग के आधार पर भी चुना जाता है ताकि संपादक मंडल में हर नजरिए की मौजूदगी हो, और हर किस्म के तजुर्बे वहां सामने आ सकें।
कुछ ऐसी ही नौबत सरकारों में रहती है जहां फैसले लेने वाले ऊंचे तबकों में कई ऐसे मौके रहते हैं जब कोई दलित-आदिवासी नहीं रहते, या अल्पसंख्यक नहीं रहते, या जाति या धर्म से परे की भी बात करें, तो गरीबों के मुद्दों की समझ रखने वाले लोग ऐसे फैसलों की कुर्सियों पर नहीं रहते। नतीजा यह होता है कि करोड़पतियों और अरबपतियों से भर चली संसद और विधानसभाओं से लेकर मंत्रियों और अफसरों तक के बीच कुछ नजरिए गायब रहते हैं। जब गाय के बारे में फैसला लिया जाता है, तो गाय की पूजा करने वाले लोग तो उन टेबिलों पर रहते हैं, लेकिन गाय के मरने के बाद उसे ठिकाने लगाने वाले तबके, और उससे जुड़े दूसरे रोजगारों की समझ रखने वाले कोई लोग ऐसे ताकतवर फैसलों के वक्त नहीं रहते। ऐसे फैसले ले लिए जाते हैं, और इनके बीच देश की सामाजिक हकीकत के इतिहास के जानकार भी नहीं रहते, या रहते भी हैं, तो वे इतिहास के साथ खड़े रहने का हौसला नहीं रखते। नतीजा यह होता है कि कुछ चुनिंदा ताकतवर तबकों के लोग अपनी पसंद को एक काल्पनिक इतिहास मानकर फैसले ले लेते हैं, और अपने से असहमति रखने वाले कमजोर लोगों के सिर पर थोप देते हैं।
धीरे-धीरे सरकार और राजनीति, संसद और अदालत, मीडिया और बाकी कारोबार, इन सभी जगहों के सीमित संपन्न तबकों के लोग मिलकर एक किस्म का नया तथाकथित लोकतांत्रिक शासक वर्ग बन जाते हैं, और बाकी कमजोर बहुसंख्यक लोगों के अधिकारों की अपने नजरिए से व्याख्या करने लगते हैं। यह नौबत कुछ उसी तरह की है जैसी आज अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में दुनिया के एक सबसे कुख्यात उम्मीदवार साबित हो चुके रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रम्प ने खड़ी कर दी है। परले दर्जे की मूर्खता के साथ जब दौलत का अहंकार जुड़कर मैदान में उतरता है, तो वह एक डोनाल्ड ट्रम्प बना पाता है। हिन्दुस्तान में भी देश-प्रदेश के अनगिनत फैसले ऐसे ही अज्ञान के साथ लिए जा रहे हैं, और दूसरों पर थोपे जा रहे हैं। हमारा ख्याल है कि एक जिम्मेदार अखबार से लेकर एक जिम्मेदार सरकार तक हर कहीं फैसले लेने में समाज के सभी तबकों, पृष्ठभूमियों की भागीदारी होनी चाहिए, और जहां पर ऐसी जाहिर हिस्सेदारी निभाने के लिए लोग मौजूद न हों, वहां पर सरकार, समाज, या अखबार को कुछ थिंकटैंक बनाकर अपने खुद के शिक्षण-प्रशिक्षण का इंतजाम करना चाहिए, अपनी खुद की परिपक्वता की कोशिश करनी चाहिए। दिक्कत यही होती है कि शहरी, संपन्न, शिक्षित, सवर्ण, और सक्षम तबकों का अहंकार उन्हें यह एहसास नहीं होने देता कि उन्हें भी कुछ जानने और सीखने की जरूरत है। अपने आपके सर्वज्ञ होने की खुशफहमी लोगों को अपनी समझ का दायरा बढ़ाने नहीं देती, और ऐसे अहंकार को पूरा समाज भुगतता है। मंदसौर के जिस सरकारी कॉलेज ने एसटी-एससी लिखे हुए ऐसे बैग तैयार करवाए हैं, वहां के प्राचार्य को निश्चित ही इस सामाजिक हकीकत की समझ नहीं होगी कि लोगों की पीठ पर उनकी जात की तख्ती टांग देने से वे किस तरह के सामाजिक भेदभाव का शिकार और अधिक होते चलेंगे।

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