हॉर्न प्लीज की जगह नो हॉर्न की जरूरत

संपादकीय
3 अक्टूबर 2016
एक मजेदार खबर यह है कि ट्रकों के पीछे हॉर्न प्लीज क्यों लिखा होता है? इसके अलग-अलग कई मायने हो सकते हैं, लेकिन हिन्दुस्तान में यह बात बड़ी साफ है कि ट्रैफिक हॉर्न से तय होता है। अगर पीछे से कोई हॉर्न बजाते न आए तो आगे चलने वाले मुडऩे का संकेत भी नहीं देते। और बिना संकेत दिए मुडऩे वाले से कोई शिकायत करे, तो उसे आंख दिखाई जाती है कि पीछे से आ रहे थे तो हॉर्न क्यों नहीं बजाया। भारत में सबसे अधिक असभ्यता का प्रदर्शन सड़कों पर ही होता है, और वहां हर कोई अपने हक और दूसरों की जिम्मेदारी को ही देखते हुए चलते हैं, या कि गाड़ी चलाते हैं। जो लोग नियमों को मानते हुए चलना चाहते हैं उनके लिए मन में इस हसरत के सिवाय और कोई रास्ता नहीं बचता कि वे किसी और देश में पैदा हुए होते तो अच्छा होता।
लेकिन फिलहाल यह बात करें कि गाडिय़ों के पीछे हॉर्न प्लीज लिखा होने का क्या नतीजा होता है। सड़कों पर जब लोग लगातार ऐसा लिखा हुआ पढ़ते चलते हैं, तो उनके दिमाग में हॉर्न बजाने की बात बैठ भी जाती है। और इसके बाद जरूरत रहे, या कि न रहे, उनके हाथ हॉर्न को दबाते चलते हैं। एक मनोवैज्ञानिक असर लोगों की सोच को बदलकर रख देता है, और हॉर्न बजाने का यह उकसावा पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ते चलता है क्योंकि मां-बाप के साथ चलते हुए बच्चे उनको बिना जरूरत हॉर्न बजाते देखकर वही सीखते चलते हैं। किसी भी सभ्य देश को यह सीखना और समझना चाहिए कि बिना कहे हुए समाज में जो बुरे संदेश जाते हैं, उनको कैसे रोका जाए। वैसे तो भारत में इसको रोकने के लिए जो संदेश लिखे जाते हैं, उनका भी असर दिखता नहीं है, और जहां भी थूकने या पेशाब करने के खिलाफ लिखा जाता है, वहीं पहुंचकर लोगों को ऐसी हरकत सूझती है। नतीजा यह होता है कि इस देश में आने वाले पर्यटक ऐतिहासिक महत्व की जगहों पर जाकर भी बहती हुई पेशाब और दीवारों पर पीक को देखकर कांप जाते हैं।
चीन में कुछ बरस पहले तक लोगों को खखारकर थूकने की बड़ी बुरी आदत थी और सड़कों के किनारे लोग ऐसा करते चलते थे। फिर जब चीन का विदेश व्यापार बढ़ा, अंतरराष्ट्रीय संबंध बढ़े, तो कारोबार को ध्यान में रखते हुए चीन की सरकार ने अपने स्कूल-कॉलेज से ही अंग्रेजी के साथ-साथ ऐसी तहजीब देकर लोगों को निकालना देकर शुरू किया कि वे दुनिया के दूसरे देशों में जाकर भी देश का नाम न डुबाएं। जो हिन्दुस्तानी बाहर जाते हैं, उन्हें कई महीने यह समझने में लग जाता है कि ऐसा हॉर्न बजाने पर दुनिया के सभी सभ्य देशों में बड़ा भारी जुर्माना हो सकता है। भारत में लोगों को तमीज सिखाने की जरूरत है, क्योंकि अब बढ़ते हुए शोर की वजह से लोगों की मानसिक सेहत भी खराब होने लगी है, और ऐसे प्रदूषण का एक बड़ा कारण सड़कों पर गैरजरूरी हॉर्न भी है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें