देश के भड़काऊ माहौल में नेहरू की कमी खलती है

संपादकीय
5 अक्टूबर 2016
देश में कई जगहों पर दुर्गा और महिषासुर की कहानी को लेकर तनाव हो रहा है। कुछ दिन पहले बस्तर में एक सीपीआई भूतपूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने महिषासुर की महिमा में कुछ लिखा तो उसे लेकर हिन्दू समाज के कुछ लोगों ने पुलिस में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचने की पुलिस रपट दर्ज कराई। आज एक और जिले मुंगेली में किसी के सोशल मीडिया पर लिखे हुए को लेकर तनाव खड़ा हुआ है, और वहां आगजनी हो रही है। दुर्गा और महिषासुर से जुड़ी हुई जो कहानियां हैं, उनमें ये बातें पहली बार सामने नहीं आ रही हैं, ये दशकों से किताबों में दर्ज हैं, और इन्हें लेकर हिन्दुओं और आदिवासियों के बीच एक मतभेद चलते भी आया है। लेकिन अब बदली हुई हवा में जहां हर कोई बुरा मानने को तैयार बैठे दिखते हैं, वहां ऐसे तनाव खड़े हो रहे हैं।
किसी देश में समाज के भीतर दूसरों के लिए, या कि असहमति के लिए एक सहनशीलता का बड़ा महत्व होता है। लोकतंत्र सहनशीलता के बिना चलना नामुमकिन रहता है क्योंकि कई तबकों के अलग-अलग किस्म के संस्कार रहते हैं, रीति-रिवाज रहते हैं, उनकी मान्यताएं अलग-अलग रहती हैं, और उनके बीच किसी हिंसक टकराव के बजाय असहमत रहने पर एक सहमति जरूरी होती है। अगर ऐसा न हो तो विविधता खत्म ही हो जाए, बहुमत का ही राज होने लगे। बस्तर में जहां एक आदिवासी नेता मनीष कुंजाम की अपनी आदिवासी-मान्यताओं के खिलाफ हिन्दुओं ने रिपोर्ट लिखाई है, और मनीष कुंजाम ने यह दोहराया है कि ये बातें कोई नई नहीं हैं, और बरसों से चली आ रही आदिवासी-मान्यताओं के मुताबिक ही उन्होंने लिखा है। लेकिन आज जरा-जरा सी बात पर असहमति को हिंसा में बदलना चलन हो गया है।
हर देश में समाज में एक वैज्ञानिक सोच को विकसित करना भी जरूरी रहता है। बहुत से धर्मों के भीतर अपनी खुद की कहानियों में ऐसी बातें लिखी रहती हैं कि जिन्हें आज कोई बाहरी व्यक्ति कहे, तो लोग उबल पड़ते हैं। जैसा कि आज ताजा इतिहास को लेकर हो रहा है, लोग किसी तरह की अप्रिय बात को सुनना नहीं चाहते, यह मानना भी नहीं चाहते कि उनके इतिहास में कोई अप्रिय बात रही थी, उसी तरह लोग धार्मिक मान्यताओं को लेकर भी एक कट्टरता दिखा रहे हैं, और यह महज हिन्दू धर्म के साथ नहीं है, सभी धर्मों के साथ कमोबेश ऐसी नौबत आ रही है। इसकी वजह यह है कि आज समाज में राजनीति से परे के सामाजिक नेताओं का शून्य हो गया है। और राजनीतिक नेताओं को हर नौबत में किसी न किसी तबके को नाराज करने या खुश करने में अपना एक फायदा दिखता है। फिर वह चाहे भारत-पाक सरहद के फौजी तनाव की बात हो, या फिर वह किसी धर्म या जाति की बात हो। आज सच कहना बड़ा मुश्किल हो गया है, क्योंकि सच को बर्दाश्त करना लोगों को अपना अपमान लगने लगा है।
देश में ऐसा भड़काऊ वातावरण अलग-अलग प्रदेशों में, अलग-अलग धर्म और जाति के लोगों में, अलग-अलग पेशे के लोगों में बढ़ते चल रहा है। और ऐसे ही मौके पर जवाहर लाल नेहरू सरीखे नेताओं की कमी खलती है जिन्होंने नास्तिक रहते हुए भी पूरे देश का सम्मान पाया था, और जनता में वैज्ञानिक समझबूझ को विकसित करने का ऐतिहासिक काम किया था।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें