कल के दिन क्या सुप्रीम कोर्ट विधायकों की राय भी जानेगा और सीएम का नाम घोषित करेगा

संपादकीय
6 अक्टूबर 2016
तमिलनाडू हाईकोर्ट ने कल राज्य सरकार को एक नोटिस जारी करके कहा कि मुख्यमंत्री जयललिता की सेहत की जानकारी का बुलेटिन जारी किया जाए। वे पिछले कई दिनों से अस्पताल में भर्ती हैं और उनकी कोई खबर जनता को नहीं है। हिन्दुस्तान में नेताओं को अपनी सेहत की जानकारी छुपाने की आदत है। दुनिया के कई देश ऐसे हैं जहां पर सरकार में बैठे हुए नेताओं को अपनी सेहत की जानकारी जनता को देनी पड़ती है। और जो सरकारें जनता के टैक्स के पैसों पर चलती हैं, उनकी एक जवाबदेही जनता के प्रति बनती भी है। लेकिन आज की बात महज जनता को मिलने वाली जानकारी नहीं है, उससे परे की भी है।
तमिलनाडू में आज यह सवाल खड़ा हो रहा है कि अगर जयललिता सरकार चलाने की हालत में नहीं रहती हैं, या कि जैसा कि प्रकृति का नियम है, वे अगर किसी दिन नहीं रहती हैं, तो उनका वारिस कौन होगा। अभी तमिलनाडू से जो खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक उन्होंने किसी मंत्री या नेता का नाम लिखकर लिफाफे में बंद रखा है कि उनकी जगह अगर किसी को सीएम बनना हो, तो वह कौन हो। लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले जब उन्हें अदालती फैसले के चलते कुर्सी छोडऩी पड़ी थी, तो उनके एक करीबी सहयोगी को मुख्यमंत्री मनोनीत किया गया था, और उसने सिंहासन पर जयललिता के खड़ाऊ रखकर नीचे फर्श पर बैठकर सरकार चलाने के अंदाज में काम किया था, और जिस दिन अदालती रोक हटी, फिर जयललिता मुख्यमंत्री बन गईं। अब सवाल यह उठता है कि किसी धार्मिक या आध्यात्मिक संगठन की तरह अगर पार्टी की नेता अपनी मर्जी से वारिस भी तय करके जाती है, तो फिर भारत के इस लोकतांत्रिक ढांचे का क्या मतलब है, या कि यह ढांचा आखिर लोकतंत्र के नाम का कैसा ढकोसला करता है?
और यह बात महज जयललिता की नहीं है, एक नेता या एक कुनबे के राज वाली कांग्रेस सहित दर्जन भर से अधिक पार्टियों का यही हाल है। कांग्रेस में सोनिया परिवार की मर्जी से परे की कोई कल्पना भी कोई नहीं कर सकते। इसी तरह पिछले कुछ हफ्तों में उत्तरप्रदेश की राजनीति में मुलायम कुनबे का जिस तरह का अलोकतांत्रिक नाटक जनता ने देखा है, वह सबके सामने है। पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी अपनी पार्टी के लिए दुर्गा माता की तरह हैं, और उधर देश के दूसरे सिरे पर कश्मीर में एक कुनबे की तीसरी पीढ़ी, और दूसरे कुनबे की दूसरी पीढ़ी के बीच लोकतंत्र पिस रहा है। ऐसे में लगता है कि भारत के संविधान में क्या ऐसे फेरबदल होने चाहिए कि अमरीकी राष्ट्रपति की तरह दो कार्यकाल से अधिक वक्त किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को न मिले? और क्या पार्टियों के ढांचे में चुनाव आयोग के ऐसे नियम बनने चाहिए कि एक पार्टी के मुखिया के ओहदे पर एक व्यक्ति कितने समय तक रहे? या फिर अगर देश को और अधिक सुधार की जरूरत है, तो यह भी देखा जाए कि क्या बाल ठाकरे के परिवार से परे शिवसेना कुछ है? नवीन पटनायक से परे उनकी पार्टी कुछ है? और क्या आयोग की शर्तों को पूरा करने के लिए इन तमाम पार्टियों में चुनाव के नाम पर एक नाटक नहीं होता है?
भारत की जनता में लोकतंत्र के लिए सम्मान बहुत कम है। वह कुनबों को चुनती है और ढोती है, वह भ्रष्ट लोगों को चुनती है, और उनको अपना नेता मानने में गर्व महसूस करती है। उसे चुनाव में भ्रष्ट आचरण से परहेज नहीं है, उसे जेल की सजा काट रहे लोगों को चुनने से परहेज नहीं है, वह बाहुबलियों को चुन लेती है, डकैतों को चुन लेती है, बलात्कारियों को चुन लेती है। तो अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत की संसदीय चुनाव प्रणाली सचमुच अच्छी है, या इसमें किसी तरह के सुधार की जरूरत है? क्या चुनाव में उम्मीदवार बनने, और राजनीतिक दलों में किसी ओहदे पर आने के लिए जुर्म से परे रहने की शर्तों को और कड़ा किया जाना चाहिए? हम जानते हैं कि आज इस मुद्दे को छेड़ते हुए हमारे पास जवाब कम हैं, सवाल अधिक हैं। और एक दिन ऐसा आ सकता है कि बीसीसीआई पर सुप्रीम कोर्ट को जिस तरह की सख्ती करनी पड़ रही है, उस तरह की सख्ती पार्टियों के चुनाव करवाने में भी करनी पड़े, और सुप्रीम कोर्ट का कोई जज बैठकर विधायकों की अलग-अलग राय जाने, और मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के नाम की घोषणा करे। आगे-आगे देखें होता है क्या।

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