सोशल मीडिया से छाती पर से हट जाने वाला वजन...

संपादकीय
8 अक्टूबर 2016
इंसानों और जानवरों, सभी को कुछ तरह की गलतफहमी होती है। कुछ लोगों को जब यह शक रहता है कि उनकी तबियत ठीक नहीं हो रही है, तो उन्हें काम की दवाईयों के साथ-साथ बिना दवाई वाले ऐसे कैप्सूल भी दिए जाते हैं कि उनके दिल-दिमाग को यह तसल्ली मिले कि उनका इलाज हो रहा है। इसे प्लेसिबो असर कहते हैं जो कि बिना दवाई के भी असर करता है। जानवरों के साथ भी ऐसा होता है और विकसित देशों में उनकी भी मनोचिकित्सा होती है, हिन्दुस्तान में तो खैर इंसानों को भी मनोचिकित्सा नसीब नहीं है। लेकिन ऐसी झूठी तसल्ली बहुत से लोगों को इलाज से परे की बातों में भी मिलती है।
कई लोगों को कसरत के वीडियो देखने, और फिटनेस के बारे में पढऩे से यह तसल्ली होने लगती है कि वे अपनी सेहत के प्रति जागरूक हैं। बहुत से लोगों को क्रिकेट या किसी और खेल का प्रसारण देखते हुए यह तसल्ली होने लगती है कि वे खेलों में हिस्सा ले रहे हैं। और इन दिनों भारत में बहुत से लोगों को सोशल मीडिया पर देशभक्ति के बारे में लिखते हुए या पड़ोस के दुश्मन माने जा रहे देश के खिलाफ लिखते हुए यह तसल्ली होने लगती है कि वे अपने देश का भला कर रहे हैं। हालांकि यह अपने आपको धोखा देकर एक खुशफहमी में रहने की बात है कि वे सचमुच कुछ कर रहे हैं। बहुत से लोग गरीब और गरीबी के बारे में सोशल मीडिया में लिखकर अपनी यह सामाजिक जवाबदेही पूरी कर लेते हैं कि वे गरीबों की फिक्र करते हैं। कुछ-कुछ ऐसा ही वे लोग भी करते हैं जो रात-रात भर जागकर किसी धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होते हैं, और जिन्हें लगता है कि वे धर्मालु हैं। ऐसे भी लोग रहते हैं जो करोड़ों रूपए की काली कमाई करके कुछ लाख का दान किसी धर्म स्थान को दे देते हैं, और वे परोपकारी कहलाने लगते हैं।
कुछ तो धर्म जैसी बातें लोगों को ऐसी सहूलियत दिला देती हैं, और कुछ अब सोशल मीडिया लोगों को ऐसा मौका दे देता है। एक तरफ तो जिस तरह चर्च में कन्फेशन चेंबर में जाकर लोग अपने पाप मान लेते थे, और माफी पा लेते थे, कुछ उसी तरह अपनी गलतियों को लोग सोशल मीडिया पर मान लेते हैं, और फिर यह मान लेते हैं कि वे उन गलतियों के जुर्म से उबर गए हैं। यह सिलसिला ऐसी सहूलियत न रहने के मुकाबले अधिक खतरनाक है। जब लोगों को इस तरह लिखने और पोस्ट करने की सुविधा नहीं थी, तो उनके गलत काम कम से कम कुछ वक्त तक तो उनकी छाती पर वजन की तरह सवार रहते थे। लेकिन अब तो पल भर में आत्मा ड्राईक्लीन होकर निकल आती है, अगले दाग-धब्बों के लिए एकदम तैयार होकर।
पिछले कुछ बरसों में ही ऐसी सामाजिक प्रतिक्रियाओं के सोशल मीडिया का विस्तार एक धमाके की तरह हुआ है, और इससे इंसानों की मानसिकता पर क्या असर पड़ा है, लोगों के दिल-दिमाग पर क्या फर्क पड़ा है, इसका ठीक-ठीक अंदाज भी अभी समाजशास्त्री नहीं लगा पाए हैं। आने वाले बरसों में हो सकता है कि इसका अंदाज लग सके।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सोशल मीडिया से हर व्यक्ति पत्रकार बन रहा है और अब कोई खबर दब नहीं सकती। जन जागरण और सूचना क्रांति की और मजबूत कदम है, जो थम नहीं सकते।।

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  2. सोशल मीडिया से हर व्यक्ति पत्रकार बन रहा है और अब कोई खबर दब नहीं सकती। जन जागरण और सूचना क्रांति की और मजबूत कदम है, जो थम नहीं सकते।।

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