सरकारी नौकरी और विचारों की आजादी के दायरे...

संपादकीय
9 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ में एक और आईएएस अधिकारी की फेसबुक पोस्ट को लेकर सरकार परेशानी में घिरी है, और इस नौजवान अफसर को जिले की तैनाती से हटाकर मंत्रालय लाकर बिठा दिया गया है। ऐसे मामले बहुत ज्यादा नहीं हैं, लेकिन बीच-बीच में आते रहते हैं। खासकर बस्तर के पानी में ऐसा कुछ दिखता है कि वहां तैनात अफसर अधिक बेकाबू हो जाते हैं। कभी कोई कलेक्टर, तो कभी कोई दूसरा अफसर। और फिर पुलिस के वहां के आला अफसर तो सोशल मीडिया सहित बाकी मीडिया के कैमरों के सामने भी एक अलग स्वायत्तशासी बस्तर साबित करते दिखते हैं। ऐसे में राज्य सरकार बार-बार परेशानी में घिरती है, और अब आज राज्य के आईएएस अफसरों के संगठन ने अपने सदस्यों को गलतियों और गलत कामों से रोकने के लिए एक मार्गदर्शक मंडल बनाया है।
भारत में शासकीय अधिकारियों के जो सेवा नियम हैं, वे उन्हें राजनीति में हिस्सा लेने से रोकते हैं, और सरकार की छवि को खराब करने वाली किसी भी बात से रोकते हैं। इसके लिए बहुत विस्तार से किसी नियम का इंतजाम नहीं किया गया है, और सेवा शर्तों में लिखी गई एक लाईन ही बहुत से मामलों को रोकने के लिए काफी है, और सरकार उसके आधार पर किसी बेकसूर के खिलाफ भी कार्रवाई कर सकती है। सेवा शर्तों में लिखा गया है कि ऐसा आचरण जो कि शासकीय सेवक को शोभा न देता हो, अनबिकमिंग ऑफ एन ऑफिसर। अब यह बात इस पर भी लागू हो सकती है कि सार्वजनिक जगह पर कोई अफसर शराब पी ले, या कि किसी को गाली दे दे। सरकार चाहे तो इसे भी शासकीय सेवक के आचरण के खिलाफ मान सकती है, और कार्रवाई कर सकती है। लेकिन दूसरी तरफ बहुत से ऐसे मामले हैं जो कि सरकार की आलोचना के दायरे में नहीं आते, लेकिन सरकार के लिए असुविधा के होते हैं।
ताजा मामला बस्तर के एक नौजवान एक आईएएस अफसर का है जिसने फेसबुक पर दो दिन पहले भाजपा के प्रेरणास्रोत दीनदयाल उपाध्याय की उपलब्धियों और उनके योगदान पर गंभीर सवाल उठाए, और सवाल पूछने की तर्ज पर लिखा कि अगर किसी की जानकारी में उनका कोई योगदान हो तो बताए। अब यह बात रायपुर से लेकर दिल्ली तक की सरकारों को नागवार गुजरना तय है क्योंकि भाजपा की सारी सरकारें दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा पर काम कर रही हैं, और घोषित रूप से उन्हें मार्गदर्शक मानकर चल रही हैं। लोकतंत्र में चुनाव जीतकर आने वाली हर सरकार को यह हक रहता है कि वह अपनी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर अपनी प्राथमिकताएं तय करे, और अपने आदरणीय लोगों की विचारधारा पर अमल करे। भाजपा ऐसा करके कोई अनोखा काम नहीं कर रही है। कोई पार्टी नेहरू-गांधी को मानती है, कोई लोहिया को, और कोई पार्टी देश के बाहर के माक्र्स को भी मानती है।
ऐसे में भाजपा शासन के लिए काम करने वाले एक अफसर ने दीनदयाल उपाध्याय पर सवाल खड़े करके हो सकता है कि अपनी अभिव्यक्ति की आजादी के दायरे में ही काम किया हो, लेकिन यह काम जाहिर तौर पर सरकार की नीतियों के खिलाफ था, सरकार की आलोचना के बराबर था, और इस नाते वह उम्मीद एक शासकीय सेवक से नहीं की जा सकती। हो सकता है कि इस पोस्ट के बाद जताए गए खेद के बाद भी सरकार को आगे कोई कार्रवाई जरूरी लगे, और यह कार्रवाई कानूनी न होकर महज प्रशासनिक हो सकती है। हो सकता है कि अदालत में जाकर यह अफसर अपने लिखे को अपना कानूनी अधिकार साबित भी कर दे, लेकिन इससे यह सवाल जरूर उठेगा कि शासकीय अधिकारियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का किस हद तक और कैसा इस्तेमाल करना चाहिए। हमारा यह मानना है कि ऐसे सवाल उठाकर इस अधिकारी ने जो सार्वजनिक असुविधा अपनी सरकार के लिए खड़ी की है, उससे बचा जाना चाहिए था।

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