सुप्रीम कोर्ट ने उन्माद के हाथों दे दिया एक कानूनी हथियार

संपादकीय
30 नवंबर 2016


सुप्रीम कोर्ट ने आज एक फैसले में सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने के पहले राष्ट्रगान अनिवार्य रूप से बजाने, और तिरंगे को परदे पर दिखाने का आदेश दिया है। देश के बहुत से लोगों की यह मांग बरसों से चली आ रही थी, और छत्तीसगढ़ में राज्य शासन ने अपने आदेश से ही बरसों पहले इसे लागू कर दिया था। राष्ट्रगान को लेकर राष्ट्रवादियों का उन्माद इस तरह हावी है कि कुछ महीने पहले मुंबई में एक सिनेमाघर में फिल्म देखने पहुंचे पहियों की कुर्सी पर चलने वाले एक विकलांग (दिव्यांग) के खड़े न हो पाने पर दर्शकों में से कई ने उसे पीटकर धर दिया था। यह अलग बात है कि देशभर में यह पुराना अनुभव है कि जब राष्ट्रगान चलते रहता है, तब सिनेमाघरोंं में लोग आना-जाना करते रहते हैं।
दरअसल सार्वजनिक जीवन में कानून बनाकर या अनिवार्य रूप से जब राष्ट्रीय प्रतीक चिन्हों को लागू किया जाता है, तो उनसे बड़े आक्रामक विवाद शुरू होते हैं, और मामलों को अदालत तक घसीटा जाता है, या कानून हाथ में लेकर लोगों को पीटा जाता है। भारत में किसी खिलाड़ी के पैर अगर झंडे की तरफ हैं, और वह मुस्लिम है, तो उसे गद्दार साबित करने में देर नहीं लगती। या किसी पश्चिमी देश में वहां के रिवाज के मुताबिक अगर देश के झंडे जैसा केक बनाकर किसी समारोह में काटा जाए, तो उसे लेकर भी बवाल खड़ा हो जाता है। कहीं झंडा फटा हुआ रहे, या कहीं पर राजचिन्ह को लेकर कोई कार्टून बना दिया जाए, तो भी यही हाल होता है।
ऐसे उत्तेजना से भरे हुए राष्ट्रवादी देश में सार्वजनिक जीवन से राष्ट्र के ऐसे प्रतीक चिन्हों को सीमित ही कर देना चाहिए जो कि लोगों में तनाव खड़ा कर सकते हैं। अब जैसे हम छत्तीसगढ़ में देखते हैं कि राज्यपाल के किसी भी कार्यक्रम के पहले, और कार्यक्रम के बाद राष्ट्रगान बजाने के लिए पुलिस बैंड एक बस पर लदकर पहुंचता है, और उसका रात-दिन का काम ही राज्यपाल के लिए बैंड बजाने के लिए रहता है। आज जब सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया है, तो सोशल मीडिया पर बहुत से जागरूक और समझदार लोगों ने तुरंत यह सवाल खड़ा किया है कि क्या सुप्रीम कोर्ट अपनी कार्रवाई शुरू और खत्म करने के पहले राष्ट्रगान गाता-बजाता है?
आज हिन्दुस्तान में समझदारी की बात करना बड़ी आसानी से देशद्रोह का दर्जा पा सकता है। इसी देश में जब असहिष्णुता को लेकर चारों तरफ हिंसा चल रही थी, और फिल्म अभिनेता आमिर खान ने बातचीत में यह कहा था कि इस हिंसा से सहमी हुई उनकी पत्नी को लगता है कि इस देश में रहा जाए, या न रहा जाए, तो देश के उन्मादी लोगों ने इस हिन्दू महिला को तुरंत ही पाकिस्तान भेज देने की मांग कर दी थी। लेकिन अब जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में यह कहा कि कोई उनकी हत्या भी कर सकते हैं, तो इस पर किसी ने उन्हें देश के हिंसक माहौल पर टिप्पणी करने के जुर्म में देशनिकाला नहीं दिया। जब देश के माहौल में उन्माद इतना अधिक फैला हुआ हो, तो सार्वजनिक जगहों पर धर्म के प्रतीक घटाने चाहिए, धर्म का प्रदर्शन घटाना चाहिए, और राजचिन्ह, राजप्रतीक, और राजगौरव के सारे प्रतीकों को सीमित कर देना चाहिए। आज सुप्रीम कोर्ट के आदेश से देश में यह माहौल बन जाएगा कि सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के दौरान कोई खड़े न हों, या खड़े न हो सकें, तो उन पर हमला करना कानूनी मान लिया जाएगा। ऐसे फैसले देश के सम्मान के नहीं हैं, देश में उन्माद के हाथों एक कानूनी हथियार दे देने सरीखे हैं।

किसी भी लोकतंत्र में औसतन निर्वाचित कट्टरता के पांच बरस

संपादकीय
29 नवंबर 2016


अमरीका में अभी एक विमान में सफर करते हुए लोगों के बीच तनातनी हुई क्योंकि निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों ने हिलेरी क्लिंटन के समर्थकों को गाली दे दी। ऐसा पिछले कई दिनों से चल रहा है, और दूसरी तरफ ट्रंप के विरोधी वहां चुनावी नतीजे आने के बाद कई दिनों तक लगातार सड़कों पर प्रदर्शन करते रहे, और ट्रंप के दफ्तर की इमारत के सामने भी जमकर प्रदर्शन हुए। अमरीका की जनता का एक बड़ा बहुमत इस बात से हक्का-बक्का है कि मिलीजुली संस्कृतियों वाले इस देश में ट्रंप जैसा नफरतजीवी कैसे जीतकर आ गया। कमोबेश ऐसा ही हाल ब्रिटेन में हुआ जहां पर यूरोपीय यूनियन से अलग होने के लिए हुए जनमत संग्रह में जनता के बहुमत ने ब्रेक्सिट के पक्ष में वोट डाला, और वह ब्रिटिश सरकार पर एक बंधनकारी जनमत था कि वह यूरोपीय यूनियन से अलग हो जाए। इसके कई मुद्दों में से सबसे बड़ा और तात्कालिक ज्वलंत मुद्दा यह था कि योरप में पहुंच रहे अनगिनत शरणार्थियों में से कई हजार को ब्रिटेन में भी शरण देनी थी, और यूरोपीय यूनियन की ऐसी बातें ब्रिटेन की जनता के एक बहुमत को मंजूर नहीं थी।
अब इन दो देशों के अलावा जर्मनी और फ्रांस में भी संकीर्णतावादी, नस्लवाद के समर्थक लोग, या मिलीजुली संस्कृतियों के विरोधी लोग लोकप्रियता पाते दिख रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि दुनिया का माहौल एक बार फिर दकियानूसी हो रहा है, और आज पश्चिम में जो दिख रहा है, वह दो बरस पहले भारत में इस देश की एक संकीर्णतावादी समझी जाने वाली भारतीय जनता पार्टी की जीत से शुरू हुआ सिलसिला दिख रहा है। भारत में भी इस जीत के बाद मोदी समर्थकों, या हिन्दुत्ववादियों, या राष्ट्रवादियों ने लगातार सार्वजनिक जीवन में जिस तरह का तनाव खड़ा किया है, उससे इस देश की विविधता पर भी बड़ी आंच आई है। कहीं पहरावे को लेकर, तो कहीं साहित्य और फिल्म को लेकर, कहीं इतिहास की किताबों को लेकर, तो कहीं पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर, और सबसे अधिक तो गोमांस को लेकर इस देश में सार्वजनिक जीवन में जैसी आक्रामक उत्तेजना फैलाई गई, कुछ वैसी ही उत्तेजना ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन में दिखी, ट्रंप की जीत के बाद अमरीका में दिख रही है, और जर्मनी-फ्रांस कतार में खड़े हुए दिख ही रहे हैं।
लोकतंत्र में जिन लोगों की गहरी आस्था है, और जिन लोगों ने दुनिया के लोकतंत्र के इतिहास को दो-चार चुनावों से अधिक लंबे दौर में देखा हुआ है, उनका यह मानना है कि कट्टरपंथ के ऐसे सैलाब आते-जाते रहते हैं, और ऐसे हर सैलाब के बाद उन देशों के लोकतंत्र को मजबूती ही मिलती है, और अस्थाई रूप से जो नुकसान होता है, वह लंबे समय तक कायम नहीं रहता। भारत में भी लोग यही उम्मीद करते हैं कि आज देश में विविधतावादी संस्कृति के खिलाफ जो माहौल बना हुआ है, उसे खत्म करने का काम या तो मौजूदा मोदी सरकार करे, या फिर अगले चुनाव में यह एक मुद्दा रहे, और अधिक विविधतावादी कोई गठबंधन, कोई सरकार सत्ता में आए। जो लोग विश्व इतिहास को पढ़ते हैं, वे लोग अलग-अलग देशों में ऐसे फेरबदल के बारे में अधिक सोच सकते हैं, और अधिक बता सकते हैं। फिलहाल दुनिया में कट्टरता का जो सैलाब आ रहा है, वह तमाम उदार लोगों के लिए फिक्र की बात है, और किसी भी देश के लोकतंत्र में औसतन पांच बरस के लिए तो निर्वाचित कट्टरता रहती ही है।

ट्रंप के लिए हवन करने वाले अब रोजगार का घाटा गिनें

संपादकीय
28 नवंबर 2016


कुछ महीनों में दिल्ली और भारत के कुछ शहरों से ऐसी बहुत सी तस्वीरें आई थीं कि अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत के लिए कुछ हिन्दू संगठन सार्वजनिक रूप से हवन कर रहे थे, और पोस्टर-बैनर लेकर उनकी जीत की कामना कर रहे थे। ये संगठन जाहिर और घोषित रूप से साम्प्रदायिक संगठन थे, और उनकी इस पहल के पीछे ट्रंप की यह घोषणा थी कि अगर वे राष्ट्रपति बनेंगे तो अमरीका में मुस्लिमों का घुसना बंद कर देंगे। अब ट्रंप तो राष्ट्रपति बन गए हैं, और उनके पहले के तेजाबी-चुनावी बयान धीरे-धीरे तेजी खोते जा रहे हंै, और कुर्सी तक पहुंचने के कई हफ्ते पहले ही वे अपनी पहले की कही हुई बातों की धार घटाते चल रहे हैं। लेकिन अमरीका की जिस संकीर्णतावादी जनता ने ट्रंप को बहुमत से जिताया है, वह सिर्फ मुस्लिमों के खिलाफ ट्रंप को वोट नहीं दे रही थी, वह प्रवासी कामगारों के खिलाफ भी थी, है, और उसने उस वजह से भी ट्रंप को वोट दिया था क्योंकि उन्होंने यह बार-बार यह घोषणा की थी कि वे अमरीका के रोजगार अमरीकियों के लिए वापिस उपलब्ध कराएंगे, और दूसरे देशों से आकर अमरीका में काम करने वाले मजदूरों और कामगारों के लिए कड़े प्रतिबंध लागू करेंगे।
नतीजा यह हुआ है कि अभी वहां के नए प्रतिबंधों के जो आसार दिख रहे हैं, उन्हें लेकर पहला अंदाज यह सामने आया है कि वहां काम कर रहे हिन्दुस्तानियों में से पौन लाख से अधिक लोग काम खो सकते हैं। इसका नतीजा भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा, क्योंकि ऐसे लोग कमाई करके उसका खासा हिस्सा भारत में वापिस लाते थे, और वहां जाने पर वे अपने आसपास के और लोगों को भी पढऩे के लिए या काम करने के लिए वहां बुलाने की कोशिश करते थे। आज खबर यह है कि भारत की जो कंपनियां अमरीका में काम कर रही हैं, वे सस्ते भारतीय कर्मचारियों को काम का वीजा दिलाकर अमरीका ले जाने के बजाय अब वहीं के लोगों को रोजगार देना शुरू कर चुकी हैं। हो सकता है कि इसका पूरा असर देखने में साल-छह महीने का समय लग जाए, लेकिन जो हवन करने वाले लोग हैं, उन्हें यह जानकार बहुत खुशी नहीं होगी कि भारत से अमरीका जाकर काम करने वाले और अब रोजगार खोने वाले लोगों में से अधिकतर लोग गैरमुस्लिम ही हैं।
कट्टरता और धर्मांधता, नस्लवाद और जातिवाद, ये सब पहली नजर में अपनी नफरत की ताकत से बहुत से लोगों को जोड़ लेते हैं, लेकिन यह एक पुरानी कहानी के मुताबिक शेर की सवारी जैसा होता है, जिस पर चढऩा तो आसान रहता है, लेकिन जिस पर से उतरना मुश्किल रहता है, और लोग जब उतरते हैं तो शेर उन्हें चट कर सकता है। ट्रंप जिस तरह एक घोर आक्रामक अमरीकी राष्ट्रवाद की लहरों पर सवार होकर व्हाईट हाऊस तक पहुंच गया है, वे लहरें हिन्दुस्तान जैसे बहुत से देशों के लिए सुनामी की लहरों जैसी साबित हो सकती हैं। ट्रंप दुनिया पर जिस तरह का तीसरा विश्वयुद्ध थोप सकता है, वह भी भारत को कई तरह से भारी पड़ सकता है। आज भारत की अर्थव्यवस्था जिस तरह के सस्ते मिल रहे डीजल-पेट्रोल के सहारे चल रही है, तीसरे विश्वयुद्ध से अगर पेट्रोलियम खतरे में पड़ जाएगा, तो भारत के लोगों का खाना भी मुश्किल हो जाएगा। इसके अलावा अमरीका के घरेलू हित में अपनी तंगदिली और अपने तंगनजरिए से काम करने वाला ऐसा नासमझ राष्ट्रपति दुनिया पर तरह-तरह के आर्थिक प्रतिबंध भी लाद सकता है, और हो सकता है कि एक दिन ऐसा आए कि हिन्दुस्तान के ऐसे हवनकारी लोग हवन का सामान भी अमरीकी पेटेंट के रास्ते किसी अमरीकी कंपनी से खरीदने के लिए मजबूर हो जाएं।
नफरत की बुनियाद पर जो लोग एक साथ जुटते हैं, वे आपस में एक-दूसरे का भला लंबे समय तक नहीं चाह सकते क्योंकि नफरत का मिजाज ही दुश्मन तलाशना होता है। पहले वह किसी दूसरे देश या दूसरे धर्म को दुश्मन मानकर चलता है, और फिर वक्त आने पर अपने साथ के लोगों को भी खाने लगता है। हम उम्मीद करते हैं कि भारत को ट्रंप से होने वाले खतरे और नुकसान को देखते हुए उसके हिमायती हवन करने वाले लोगों को भी अक्ल आने का एक मौका आएगा, हालांकि वह भारत के अमनपसंद लोगों के लिए खासा महंगा पड़ेगा।

गोवा के चुनाव प्रचार में प्रतिरक्षा मंत्री पर्रिकर की गैरजरूरी भड़काऊ बातें

संपादकीय
27 नवंबर 2016


भारत या पाकिस्तान जैसे देशों में जब कोई चुनाव होते हैं, तो एक-दूसरे पर निशानेबाजी कुछ अधिक होती है, और अक्सर गैरजरूरी होती है। इसी तरह जब राष्ट्रीय स्तर के कोई नेता अपने खुद के प्रदेश में चुनाव अभियान पर निकलते हैं, तो वे राष्ट्रीय स्तर के मामलों को अपने प्रदेश की जनता पर थोप देते हैं। बंगाल में बांग्लादेश का मुद्दा आ जाता है, और यही मुद्दा असम में भी आ जाता है। तमिलनाडू में श्रीलंका के तमिलों का मुद्दा आ जाता है, और आज गोवा के चुनाव प्रचार में पाकिस्तान का मुद्दा जोरों से हावी है। अब लोग यह सोच सकते हैं कि पाकिस्तानी सरहद से दूर बसे हुए गोवा का पाकिस्तान से क्या लेना-देना? तो जवाब यह है कि भारत के प्रतिरक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर गोवा से ही आते हैं, और आज उनके पास अपने प्रदेश में राज्य के चुनाव को लेकर कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, इसलिए वे पाकिस्तान पर ऐसा जुबानी हमला कर रहे हैं कि मानो सरहद पर शहादत देते हुए खड़े हैं।
दरअसल भारतीय जनता पार्टी के पास गोवा में मुद्दों की कुछ कमी है। वहां के भाजपा मुख्यमंत्री गोमांस पर किसी भी तरह की रोक के सख्त खिलाफ हैं और बार-बार कह चुके हैं कि गोवा में गोमांस पर कोई रोक नहीं लगेगी। और यह घोषणा भाजपा की पूरे देश के लिए की गई घोषणा के ठीक खिलाफ है। दूसरी तरफ नोटबंदी को लेकर पूरे देश में मोदी सरकार से जो भी नाराजगी गरीब जनता की है, उससे नोटबंदी का मुद्दा भी चुनाव का आकर्षक मुद्दा नहीं रह गया है। ऐसे में मनोहर पर्रिकर को कोई भी लुभावना भाषण देने में दिक्कत होना स्वाभाविक है, और ऐसे में वे अगर अपने प्रदेश की जनता को याद दिलाना चाहते हैं कि वे देश के सबसे महत्वपूर्ण मंत्रियों में से एक हैं, और देश की हिफाजत उनके हवाले है, तो उन्हें पाकिस्तान पर हमला करना एक जायज मुद्दा लग रहा है।
अब पणजी की एक चुनावी सभा में मनोहर पर्रिकर ने कल यह घोषणा की कि वे अपनी बुलेट प्रूफ कार छोड़ रहे हैं, और दुश्मनों में अगर हिम्मत है तो वे उन्हें मारकर दिखाएं। पाकिस्तान और वहां से आने वाले आतंकियों की चर्चा करते हुए प्रतिरक्षा मंत्री ने कहा कि अब से वे बिना बुलेट प्रूफ कार में चलेंगे, और दुश्मन में अगर हिम्मत है तो उन्हें गोली मारकर दिखाएं, और ऐसा चाहने वालों को दिल्ली तक जिंदा नहीं पहुंचने दिया जाएगा। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि भारत युद्ध नहीं चाहता है लेकिन उसे उकसाया गया तो वह दुश्मन की आंखें निकालकर उसके हाथ में रख देगा। उन्होंने कहा कि गोवा के लोग दुनिया को बता सकते हैं कि उन्होंने केन्द्र में एक ऐसे शख्स को भेजा था जिसने दुश्मन के गाल पर करारा तमाचा जड़ा।
ये सारी की सारी बातें निहायत गैरजरूरी भी हैं, और भारत-पाकिस्तान के संबंध खराब करने वाली भी हैं। आज इन दोनों देशों के बीच चाहे जितना भी तनाव हो, यह बात तो अपनी जगह बनी ही रहेगी कि तनाव के बीच से अमन का रास्ता भी निकलता है, और बेवजह भड़काऊ बातें करके तनाव को बढ़ाना समझदारी नहीं है। फिर एक बात यह भी है कि भारत की सरकारी व्यवस्था को जो लोग जरा भी समझते हैं, वे जानते हैं कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री की हिफाजत उनकी मर्जी से नहीं चलती। इसका इंतजाम खुफिया एजेंसियों के अंदाज पर टिका रहता है कि किसे कितना खतरा है, और सुरक्षा एजेंसियां तमाम महत्वपूर्ण लोगों का इंतजाम अपनी मर्जी से करती हैं। ऐसे में भारत के प्रतिरक्षा मंत्री की ऐसी एकतरफा घोषणा एक चुनावी नारे से अधिक कुछ नहीं है, और कल तक जो आदमी अपनी सादगी और सज्जनता के लिए खबरों में रहता था, वह भी आज चुनाव के चलते भड़काऊ बातें करने, और गैरजिम्मेदारी दिखाने में फंस गया है।
पिछले बरसों में हमने लगातार यह देखा है कि भारत या पाकिस्तान के चुनाव एक-दूसरे देश के खिलाफ नफरत की बातों से भर जाते हैं, और यह सिलसिला दोनों ही तरफ खत्म होना चाहिए।

जब तक नोटबंदी की धूल बैठेगी तब तक सबसे गरीब...

संपादकीय
26 नवंबर 2016


आज भारत की आम जनता को एक बड़ी सामाजिक समझ की जरूरत है। नोटबंदी ने उसकी जिंदगी और उसके रोज के तौर-तरीकों को इतनी बुरी तरह हिलाकर रख दिया है कि गरीब जनता के पांव अगले शायद एक-दो बरस तक मजबूती से वापिस टिक नहीं पाएंगे। रोज की मजदूरी का नुकसान एक बात है, अपनी बेबसी से देश पर भरोसा हिल जाना एक दूसरी बात है कि पैसे रहते हुए भी लोग उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे। लेकिन एक और बात है जिस पर समाज के लोगों को सोचने की जरूरत है। बहुत गरीब से लेकर गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों तक घर चलाने वाली महिला अपने पास कुछ रकम बचाकर रखने की आदी रहती है ताकि मुसीबत के वक्त घर चलाया जा सके। आज नोटबंदी के चक्कर में उसकी सारी बचत उजागर हो चुकी है, और देश में करोड़ों ऐसी महिलाएं होंगी जो कि अपने पति का उलाहना भी झेल रही होंगी कि उसने छुपाकर नोट रखे हुए थे। परिवार के भीतर का यह तनाव रातों-रात खत्म नहीं होगा, और न ही एक बार उजागर हो चुकी बचत वापिस बच सकेगी। यह बहुत बड़ा सामाजिक खतरा है कि सामने आ गई ऐसी बचत आनन-फानन खत्म हो जाए।
एक दूसरा खतरा यह है कि बहुत से गरीबों के खातों में कुछ कालेधन वालों ने पैसे जमा कर दिए हैं, और आने वाले दिनों में वे तरह-तरह से इसे सफेद करके निकालना चाहेंगे। और यह भी हो सकता है कि ऐसे करोड़ों जन-धन खाते, या कि दूसरे गरीब बैंक खाते रखने वाले लोग इनमें से कुछ पैसा खर्च भी कर दें, और बाद में उन्हें दिक्कत जाए कि वे इसे चुकाएंगे कैसे। एक अलग दिक्कत यह है कि बहुत से संस्थानों ने, कारखानों और कारोबारों ने अपने कर्मचारियों को पुराने नोटों में कई-कई महीने की तनख्वाह एडवांस में दे दी है। आज देश में अधिकतर कर्मचारी ऐसे हैं जिनका घर उनकी महीने की कमाई से नहीं चलता। अब आज एकदम से कई महीनों की तनख्वाह एडवांस में पा लेना तो आसान है, लेकिन आने वाले महीनों में घर खर्च कैसे चलेगा? अनायास आई हुई रकम रफ्तार से खर्च हो जाती है, और बाद में बहुत दिक्कत खड़ी होती है।
हर दिन हिन्दुस्तान में करोड़ों मजदूर और रोज का काम करने वाले फेरीवाले, फुटपाथी व्यापारी ऐसे हैं जिनकी मजदूरी या जिनका धंधा नोटबंदी से बुरी तरह मार खा चुका है। इनका नुकसान तो रोज के रोज हो रहा है, और इनमें से बहुत से ऐसे होंगे जो कि कर्ज से दबे होंगे, जिन्होंने किस्तों पर सामान ले लिए होंगे, और अब कमाई ठप्प हो जाने के बाद ये उसे चुकाएंगे कैसे? आज ही एक रिपोर्ट आई है कि पैसों की कमी की वजह से लोग निजी अस्पतालों में जा नहीं रहे हैं, जहां पर पुराने नोट मंजूर भी नहीं हो रहे हैं, और ऐसे अस्पतालों की कमर भी टूट रही है कि वे अपने कर्ज की किस्त कैसे चुकाएं? बहुत से ऐसे बुजुर्ग लोग रहते हैं जो खुले बाजार में अपनी बचत को ब्याज पर देकर रखते हैं, और बैंक से कुछ अधिक ब्याज पाते हैं। अब आज बाजार में ऐसी रकम पर ब्याज कई जगहों पर एकदम से टूट गया है, और ऐसे बुजुर्ग लोगों का घर चलना मुश्किल होने जा रहा है।
कालाधन खत्म तो होना चाहिए, लेकिन यह लोगों को खत्म करने की कीमत पर नहीं होना चाहिए। आज नोटबंदी के बाद से देश के बड़े लोगों में कोई हाहाकार नहीं है। वे तमाम लोग अपने एक करोड़ के कालेधन के नोटों की जगह 75 लाख तक के नए नोट जुटा चुके हैं। उनका और कोई नुकसान नहीं हुआ है, और रूपए में चवन्नी का यह नुकसान झेलने की उनकी ताकत है। लेकिन बाकी लोगों में जो सबसे गरीब लोग हैं, उनकी पेट पर जो लात पड़ी है, उसका दर्द, उसके जख्म अगले एक-दो बरस तक नहीं जा पाएंगे। और जो लोग यह सोच रहे हैं कि नोटबंदी के बाद अब प्लास्टिक मनी का चलन बढ़ेगा, तो देश में आज शिक्षा और तकनीक की समझ की कमी इतनी है कि लोग आज भी ई-ठगी के शिकार हो रहे हैं, और जैसे-जैसे लोग इस पर अधिक आश्रित होंगे, वे अधिक खतरे में भी पड़ेंगे। कुल मिलाकर जब तक नोटबंदी की धूल जमीन पर बैठेगी, तब तक सबसे गरीब फेंफड़े इतने थक चुके होंगे कि उनकी जिंदगी एक-दो बरस तो कम हो ही चुकी होगी।

नगदी वेतन की रियायत सिर्फ सरकारी कर्मचारियों को कैसे?

संपादकीय
25 नवंबर 2016


नोटबंदी को लेकर केन्द्र सरकार के कुछ फैसले, और उसके आदेश परेशान करने वाले हैं क्योंकि वे देश में बराबरी के, समानता के अधिकार के खिलाफ जाते दिख रहे हैं। पहले दिन से ही यह इंतजाम था कि सरकारी अस्पतालों में इलाज का भुगतान पुराने नोटों से किया जा सकेगा, लेकिन निजी अस्पतालों में मरीजों को यह छूट नहीं दी गई थी। पेट्रोल पंपों को छूट दी गई थी कि वे ग्राहकों से पुराने नोट ले सकते हैं, ऐसा इसलिए भी जरूरी था कि लोगों की गाडिय़ां न थम जाएं, क्योंकि ऐसा होने पर एक किस्म से जिंदगी ही थम जाएगी। लेकिन दूध, डबल रोटी, अनाज या सब्जी जैसी चीजें जो कि पेट्रोल के मुकाबले भी अधिक जरूरी थीं, उन्हें छूट नहीं दी गई थी, और आज भी नहीं दी गई है।
इसके बाद एक और आदेश आया कि केन्द्र सरकार अपने कर्मचारियों को इस महीने की तनख्वाह में से दस-दस हजार रूपए नगद देगी, और देश भर में फैले उसके कर्मचारी थोड़ी सी राहत पाएंगे। अब सवाल यह उठता है कि एक सरकारी कर्मचारी को मिलने वाले वेतन के एक हिस्से को तो नगद दिया जाएगा, और सरकारी कर्मचारियों के पास तो अनिवार्य रूप से बैंक खाता भी है, लेकिन देश के असंगठित क्षेत्र के अधिकतर कर्मचारियों के पास न तो बैंक खाते हैं, न ही उनकी तनख्वाह केन्द्र सरकार के कर्मचारियों जितनी है, वे लोग क्या करेंगे? आज छत्तीसगढ़ सरकार का भी यह आदेश आया है कि वह अपने कर्मचारियों को इस महीने की तनख्वाह में से दस-दस हजार रूपए नए नोटों में देगी, अब राज्य सरकार ने किस तरह केन्द्र सरकार से यह रियायत पाई है, यह तो साफ नहीं है, लेकिन यह राज्य कर्मचारियों के लिए एक राहत की बात जरूर होगी। अब फिर यह सवाल उठता है कि केन्द्र और राज्य शासन के कर्मचारियों से परे के लोग अगर बैंक से ऐसी छूट नहीं पाते हैं, तो यह तो भारतीय संविधान के तहत उनको मिले समानता के अधिकार के ठीक खिलाफ बात लगती है। यह नागरिक के बुनियादी अधिकारों में भेदभाव है, और गैरसरकारी तबके को भी ऐसी ही और इतनी ही राहत का अधिकार है। भारत की आबादी को सरकारी और गैरसरकारी दो तबकों में बांटकर उनके साथ ऐसा फर्क करना असंवैधानिक है।
एक और बात यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी के अपने राष्ट्र के नाम संदेश में बड़ा साफ-साफ कहा था कि पांच सौ और हजार रूपयों के पुराने नोटों को 10 नवंबर से 30 दिसंबर तक किसी भी बैंक या चुनिंदा डाकघर से बदला जा सकेगा। कल केन्द्र सरकार ने इस व्यवस्था को भी बदल दिया है, और नोटों की बदली पर कल आधी रात से ही पूरी रोक लग गई है। ऐसी बहुत सी बातें हैं जो कि सरकार के हिस्से में खामियां गिनाती हैं, और गैरबराबरी भी। भारत की आबादी का एक बहुत बड़ा और सबसे कमजोर तबका ऐसा भी है जो कि बेघर है, बंजारा है, जो फुटपाथों और रेल्वे स्टेशनों पर जीने वाले बच्चों का है, और जिनके पास बैंक खाते नहीं है, किसी तरह की पहचान नहीं है, आधार कार्ड नहीं है, और उनके पास भी मेहनत और मुसीबत से बचाए हुए नोट हैं। केन्द्र सरकार की अब तक की सारी योजना, रोजाना बदलने वाले सारे नियम मिलकर भी ऐसे सबसे कमजोर करोड़ों गरीबों के लिए कोई रास्ता लेकर नहीं आए हैं, और अब बीती आधी रात से नोटों की बदली भी बंद हो चुकी है, तो ऐसे लोग खुले बाजार में अपनी बचत को औने-पौने में बेचने या बदलने के अलावा और क्या कर सकेंगे?
अच्छी नीयत से बनाई गई कोई नीति भी अपने अमल में अगर इतनी अमानवीय है कि वह सरकारी और गैरसरकारी तबकों में इतना बड़ा फर्क करती है, जिसमें समाज के सबसे कमजोर करोड़ों लोगों के लिए कोई इंतजाम नहीं है, तो यह एक जनकल्याणकारी सरकार का कार्यक्रम नहीं हो सकता, और ऐसा करके यह सरकार एक कटघरे में तो आ ही जाती है। नोटबंदी पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है और कई राज्यों के हाईकोर्ट भी यह सुन रहे हैं, ऐसे में जाहिर है कि कोई न कोई व्यक्ति सरकारी और गैरसरकारी तबकों के बीच केन्द्र सरकार के भेदभाव के मामले को उठाएंगे, और इस पर जवाब देना सरकार को मुश्किल होगा। 

देशभक्त रात-दिन चौकन्ने और देशद्रोहियों की तलाश

संपादकीय
24 नवंबर 2016


भारत की विविधता में बहुत से ऐसे मौके रहते हैं जब अरबपतियों से भरी हुई संसद और विधानसभाओं की समझ में देश के गरीबों की हालत नहीं दिखती। इसी तरह समाज में अलग-अलग तबके रहते हैं जिनमें एक-दूसरे के बारे में समझ की बड़ी कमी रहती है। कहने के लिए लोग फ्रांस की किसी राजकुमारी की कहानी बताते हैं जिसने कहा था कि अगर लोगों के पास खाने को रोटी नहीं है, तो वे लोग केक क्यों नहीं खाते? कुछ वैसी ही समझ भारत के भी बहुत से लोगों में दूसरे तबके के, दूसरे धर्म के, दूसरी जातियों के लोगों के बारे में है। इन दिनों देश में नोटबंदी को लेकर जिस तरह की वोटबंदी और लामबंदी चल रही है, वह देखने लायक है। बहुत से लोगों को यह लग रहा है कि नोटबंदी देशभक्ति का एक बड़ा पैमाना है, और जो लोग इन कतारों में खड़े रहने की तकलीफ को झेल नहीं सकते, वे देश की सरहद पर खड़े हुए सैनिकों से किसी हिफाजत को पाने के हकदार भी नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ आमतौर पर देशभक्ति और देशद्रोह का मुद्दा उठाने वाली शिवसेना के मुखिया उद्धव ठाकरे ने लोगों को झिड़का है और कहा है कि नोटों की कतारों से किसी की देशभक्ति को जोड़कर देखना गलत बात है।
आज देश की जनता का एक बकबकी तबका सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी से हर घंटे अपनी देशभक्ति साबित करता है। और जब अपने आपको देशभक्त बताना हो, तो ऐसा तभी मुमकिन है जब किसी दूसरे तबके को देशद्रोही और गद्दार साबित किया जाए। जब तक ऐसा कोई पैमाना सामने नहीं होगा, लोग अपने आपको अपने हाथों तिलक लगाकर शहीद का दर्जा भला कैसे दे सकते हैं। नतीजा यह है कि बात-बात में देश के साथ वफादारी को साबित करने की जरूरत पड़ रही है, और कुछ घरों में नौबत ऐसी बिगड़ गई है कि पत्नी अगर पति को सुबह की चौथी चाय बनाकर देने में कुछ भुनभुनाए, तो वह देशद्रोही करार दी जा रही है।
दरअसल देश के मध्यमवर्गीय तबके में देश के सबसे गरीब तबके की हालत, जरूरत, और उसकी नौबत को लेकर समझ भी नहीं है, और समझने की कोई हसरत भी नहीं है। क्योंकि अपने से गरीब की बेबसी को समझने का मतलब अपने मन के सुख-चैन को खोने के बराबर होता है। इसलिए जो लोग नोटों की कमी से, अपनी ही बचत के नोटों के बदल न पाने की वजह से मर रहे हैं या खुदकुशी कर रहे हैं, वे लोग गद्दार कहला रहे हैं, और उन मौतों पर हमदर्दी दिखाने या आंसू बहाने वाले लोग भी देशद्रोही का दर्जा पा रहे हैं। आज हिन्दुस्तान की हवा एक भयानक आक्रामक राष्ट्रवाद की उत्तेजना से ऐसी भरी हुई है कि हर बात को देश के प्रति प्रेम या नफरत करार देने पर लोग आमादा हैं, और अगर कोई विकलांग (दिव्यांग) पहियों वाली कुर्सी पर सिनेमाघर में है, और राष्ट्रगान के वक्त उठकर खड़े होने के लिए उसके पास पैरों में ताकत नहीं है, तो बाकी दर्शकों की मार खाने के लिए उसके पास सिर, मुंह, और बाकी बदन तो है ही। ऐसी उत्तेजना लोगों की तकलीफों को अनदेखा करके एक झूठी तस्वीर देखना और दिखाना चाहती है। ऐसी उत्तेजना यह सुनना भी नहीं चाहती कि कालेधन के खिलाफ की जा रही कार्रवाई में बुनियादी कमी और खामी है, और महज नीयत से सरकार की कोई कार्रवाई सही या गलत नहीं कही जा सकती, अमल की जिम्मेदारी के बिना सरकार का कोई काम नहीं आंका जा सकता। इस बुनियादी जरूरत को अनदेखा करके, देश की बहुत गरीब आधी आबादी की रोज की जिंदा रहने की बेबसी को अनदेखा करके लोग जब लंबी कतारों को बड़ी देशभक्ति मान लेते हैं, और दर्द से कराहने वालों को देश का गद्दार मान लेते हैं, तो यह नुकसान हिन्दुस्तान का कुछ हफ्तों या महीनों का नुकसान नहीं है, यह राष्ट्रवाद महज आक्रामक राष्ट्रवाद नहीं है, यह आत्मघाती राष्ट्रवाद में तब्दील होते जा रहा है। राष्ट्रवाद को हमेशा ही कोई दुश्मन नसीब नहीं होता, उसे हमले का मौका भी हमेशा नहीं मिलता, और ऐसे में ठलहा बैठा राष्ट्रवाद अपने आसपास छोटे-छोटे दुश्मन उसी तरह तलाश या गढ़ लेता है, जिस तरह दशहरे पर हर गली-मोहल्ले में बच्चे एक-एक रावण खड़ा कर लेते हैं, जलाकर तसल्ली पाने के लिए। इसी तरह हिन्दुस्तान में आज उत्तेजित जनता अपनी देशभक्ति को साबित करने के लिए सुबह से रात तक यह देखती रहती है कि और किसे देशद्रोही करार दिया जा सकता है। यह सिलसिला हिन्दुस्तान को इक्कीसवीं सदी से वापिस घसीटकर अठारहवीं सदी की लोकतांत्रिक समझ की ओर ले जा रहा है, जहां पर पत्नी को अपने आपको पतिव्रता साबित करने के लिए मृत पति की चिता पर सती होना पड़ता था। आज सरकार की किसी भयंकर गलती पर भी दर्द से, जख्म से कोई कराहे, तो वह कराह पाकिस्तान जिंदाबाद मानी जा रही है, और जनता की समझ का यह नुकसान किसी एक सरकार के आने या जाने से आता या जाता नहीं है। यह नुकसान बहुत बड़ा है, और पता नहीं भारतीय लोकतंत्र, भारतीय समाज इस नुकसान से कब और कैसे उबरेगा।

मप्र के कलेक्टर का एक अलोकतांत्रिक आदेश...

संपादकीय
23 नवंबर 2016


मध्यप्रदेश के इंदौर में कलेक्टर ने एक आदेश निकाला है कि सोशल मीडिया पर या वॉट्सऐप पर नोटबंदी के बारे में आलोचना करने पर या गलत जानकारी फैलाने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। बहुत लंबे इस आदेश में भारत के संविधान की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलते हुए तरह-तरह का प्रतिबंध लगाया गया है, और अदालत में यह एक दिन भी नहीं टिक पाएगा। लेकिन मध्यप्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण समझे जाने वाले जिले के कलेक्टर की यह सोच भयानक है, और सोच के साथ-साथ भारत की संवैधानिक व्यवस्था की उसकी समझ बहुत दयनीय है। कलेक्टर ने अपने आदेश में सोशल मीडिया पर नोटबंदी से संबंधित किसी भी तरह की आलोचना पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस आदेश में पुराने नोटों के बारे में किसी भी तरह की टिप्पणी, नोटों के बदले जाने में होने वाली परेशानी तथा सरकार की आलोचना को दंडनीय अपराध बताया गया है।
अभी कुछ महीनों से देश में असहिष्णुता खबरों और चर्चा से किसी तरह बाहर हुई थी। लेकिन ऐसे आदेश एक बार फिर सरकार या अफसर की सेंसरशिप की सोच, या इमरजेंसी जैसे हालात वाली बात को बढ़ावा देते हैं। हमारा ख्याल है कि इसके पहले कि कोई अदालत कलेक्टर के इस आदेश को खारिज करे, मध्यप्रदेश सरकार को खुद होकर इसे खारिज करना चाहिए, और प्रदेश के बाकी अफसरों को भी नसीहत देनी चाहिए कि नोटबंदी को राष्ट्रवाद, और उसके विरोध को राष्ट्रद्रोह मानने की बेवकूफ तंगदिली से बचें। दरअसल ऐसी सोच उन नेताओं के बयानों से उपजती और पनपती है जिनको लोकतंत्र पर जरा भी भरोसा नहीं है। जब वे बढ़-चढ़कर ऐसा कहते हैं, और ऐसा कहने वालों में संविधान की शपथ लेने वाले मंत्री-मुख्यमंत्री जैसे लोग भी रहते हैं, तो उनके मातहत लोग यही जुबान बोलने लगते हैं, उन्हीं की बातों को आगे बढ़ाते हैं, और उनसे अधिक वफादार होकर दिखाते हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले दिनों भोपाल जेल से सिमी के विचाराधीन कैदियों के फरार होने और मारे जाने को लेकर दिए गए अपने बयानों में उन्हें बार-बार आतंकी और आतंकवादी कहा था, जबकि वे आतंक के आरोपों से गुजर रहे थे, और उनके मामले में अदालती फैसला बाकी ही था। जब प्रदेश का शासकीय मुखिया ही विचाराधीन कैदियों को मुजरिम साबित करने लगे, तो यह सोच मातहत लोगों के लिए एक मार्गदर्शन हो जाती है, और उनको नोटबंदी की आलोचना देश से गद्दारी लगने लगती है, और वे आदेश निकालकर इसे दंडनीय अपराध घोषित करने लगते हैं।
दरअसल भारतीय प्रशासनिक सेवा में आ जाने से ही लोगों के भीतर लोकतंत्र की बुनियादी समझ नहीं आ जाती, और न ही उनमें इंसानियत अनिवार्य रूप से खुद होकर आ जाती है। हम नहीं जानते कि इन अफसरों के लंबे प्रशिक्षण में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवाधिकार, जैसी बातें सिखाई जाती हैं या नहीं, लेकिन अपने राजनीतिक मुखिया का चेहरा देखकर बहुत से लोग अलोकतांत्रिक बर्ताव करने लगते हैं। इंदौर कलेक्टर का यह आदेश एक मिसाल कायम कर सकता है, और इसके लिए जनसंगठनों को तुरंत ही सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल करनी चाहिए। हमारा पूरा अंदाज है कि अदालत से ऐसे अफसर को कड़ी फटकार मिलेगी, और वह देश के बाकी अफसरों के लिए एक सबक भी होगी।

व्यापम भ्रष्टाचार के राज रामनरेश यादव के साथ ही पंचतत्व में विलीन..

संपादकीय
22 नवंबर 2016

मध्यप्रदेश के राज्यपाल रहकर रिटायर हुए रामनरेश यादव का उनके गृह प्रदेश में आज निधन हो गया। उन पर मध्यप्रदेश के इतिहास के सबसे कुख्यात और सबसे बड़े व्यापम घोटाले में शामिल होने के आरोप लगे थे, और राजभवन की दीवारों के पार पुलिस के जाने पर लगी हुई संवैधानिक रोक के चलते हुए उनकी गर्दन तक पुलिस के हाथ नहीं पहुंच पाए। उनके पहले उनके बेटे की मौत हुई जो कि व्यापम घोटाले में रिश्वत लेने के आरोप से घिरा हुआ था। इस तरह इन दो मौतों के बाद भ्रष्टाचार में मध्यप्रदेश राजभवन की हिस्सेदारी और उसकी भूमिका की कहानी दफन सी हो गई है। लेकिन इस बारे में सोचा जाना चाहिए कि राजभवन जैसी संवैधानिक संस्था पर काबिज लोग अगर भ्रष्टाचार के बड़े जाहिर और साफ-साफ आरोपों के बावजूद बचने के लिए किसी पेशेवर मुजरिम की तरह संवैधानिक रियायतों की आड़ लेते हैं, तो सरकार को क्या करना चाहिए, और जनता को क्या करना चाहिए?
हमारा यह मानना है कि निर्वाचित नेता तो फिर भी अपनी हरकतों, करतूतों, और अपने जुर्मों के लिए जनता के प्रति जवाबदेह रहते हैं, और पांच बरस बाद जनता की अदालत में जाकर खड़े होते हैं। उन्हें अदालती कटघरे से, या कि पुलिस जांच से कोई रियायत इसलिए नहीं मिलती है कि वे किसी कुर्सी पर हैं। लेकिन राज्यपाल की कुर्सी को ऐसी रियायत हासिल है, और उसका बेजा इस्तेमाल अकेले रामनरेश यादव के परिवार ने किया हो, ऐसा भी नहीं है। लोगों को याद होगा कि झारखंड के राज्यपाल रहते हुए सरदार बूटा सिंह के बेटों ने जिस तरह का धंधा उस राज्य में चला रखा था, वह शर्म से डूब मरने लायक बात थी, लेकिन वह पूरा कुनबा बेशर्मी के रिकॉर्ड कायम करते रहा। फिर बुजुर्ग नेता नारायण दत्त तिवारी ने एक अलग किस्म का नैतिक भ्रष्टाचार कायम किया जब अविभाजित आंध्र के राजभवन से उनके कई सेक्स-वीडियो निकलकर बाहर आए, पूरे वक्त वे एक अघोषित संतान के दायर किए गए मुकदमे को भी झेलते रहे, और आखिर में जाकर उस संतान को उन्हें अपना मानना पड़ा। 
यह सिलसिला बहुत भयानक है जब सतही स्तर के लोग, भ्रष्ट और अनैतिक जीवन वाले लोग किसी संवैधानिक पद पर पहुंच जाते हैं, और वहां की रियायत पाकर राज्य की पूरी ताकत का बेजा इस्तेमाल करते हैं। कभी-कभी राष्ट्रपति की कुर्सी पर भी ऐसे लोग पहुंचे हैं जिनके परिवारों ने राष्ट्रपति भवन का तरह-तरह से बेजा इस्तेमाल किया है। हमारा मानना है कि ऐसे लोगों के खिलाफ जनहित याचिका लेकर कुछ जनसंगठनों को अदालत तक जाना चाहिए। हो सकता है कि उनके खिलाफ कोई मामला साबित भी न हो सके, लेकिन अदालत में लोगों के ऐसे भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ होना भी छोटी बात नहीं रहती है। अदालत में गवाही के रूप में भी बहुत सी बातें सामने रखी जा सकती हैं, और देश के जागरूक जनसंगठनों को संवैधानिक संस्थाओं पर ऐसी निगरानी रखनी भी चाहिए।

भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में एकतरफा फैसलों वाले पीएम

संपादकीय
21 नवम्बर 2016  
भारत में नोटबंदी को लेकर अब तक आम लोगों की जिंदगी तबाह चली आ रही है, और इससे जुड़े हुए पहलुओं पर जब सोचते हैं तो कुछ और बातें समझ पड़ती हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इतना बड़ा फैसला लेते हुए, और लागू करते हुए अपने मंत्रिमंडल को भी भरोसे में नहीं लिया। जबकि उनकी पार्टी सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया है, और एनडीए में बहुत सी और पार्टियां भी शामिल है, जिनमें से एक बड़ी सबसे पुरानी साथी अकाली दल भी है, जिसके पंजाब के मुख्यमंत्री ने हैरानी जाहिर की है कि नोटबंदी से होने वाली दिक्कतों पर केन्द्रीय वित्तमंत्री उनकी बात सुनने को तैयार नहीं हैं। और यह फसल का मौसम है, पंजाब कृषि प्रधान राज्य है, और वहां पर चुनाव सामने खड़े हैं। प्रधानमंत्री के इस फैसले पर जिस तरह अमल हो रहा है, उसे लेकर भाजपा की एक दूसरी सबसे पुरानी साथी शिवसेना भी खफा है, और दबी जुबान से भाजपा के ऊपर से लेकर नीचे तक के नेता फिक्रमंद हैं कि नोटबंदी से फायदा चाहे जिसका भी हो, चाहे देश की अर्थव्यवस्था का हो, आज तो देश की तकरीबन पूरी आबादी जिस तरह सुख-चैन खो बैठी है, जिस तरह से अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है, कारोबार ठप्प हो गया है, उसे देखते हुए यह तो जाहिर है कि यह बहुत बड़ा नुकसान कभी भी पूरा नहीं हो पाएगा, क्योंकि रोज कमाने-खाने वाले लोग अपनी मजदूरी का मौका रोज खोते जा रहे हैं। 
अब यह बात भी खुलकर सामने आ रही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी के इतने दिन बाद भी अपने मंत्रिमंडल के सामने इसका खुलासा नहीं किया है, और दूसरी तरफ अभी जारी संसद सत्र में उन्हें बुलाने की मांग बार-बार की जा रही है, और यह लिखे जाने तक तो वे संसद में गए नहीं थे। ये तमाम बातें कुछ परेशान करती हैं, और यह भी सुझाती है कि देश के व्यापक महत्व के मुद्दों पर विपक्ष को भरोसे में लेना तो दूर रहा, प्रधानमंत्री ने अपनी ही पार्टी के नेताओं को, अपने ही मंत्रिमंडल के लोगों को फैसले की घोषणा के बाद भी भरोसे में नहीं लिया है। यह लोकतंत्र में एक व्यक्ति के फैसले लेने की एक ऐसी नौबत है जिसमें उस फैसले के असर को ढोने का जिम्मा पूरे देश पर आ रहा है। और यह एनडीए और भाजपा के भीतर एक असंतुलित शक्ति केन्द्र का सुबूत भी है कि आज देश को हिलाकर रख देने वाले एक फैसले को कुल तीन लोग मिलकर ले लेते हैं, और न लेने के पहले, न लेने के बाद वे किसी के लिए जवाबदेह हैं। आज तो दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में है न सिर्फ विपक्ष के साथ बात करके, बल्कि हथियारबंद आंदोलनकारियों के साथ भी शांतिवार्ता करके किसी नतीजे पर पहुंचने का रिवाज है, लेकिन नरेन्द्र मोदी के साथ एक यह दिक्कत खुलकर सामने आ रही है कि वे एकतरफा भाषण के मौकों पर तो बहुत सहज रहते हैं, लेकिन विचार-विमर्श के मौकों पर वे संसद के भीतर भी बहस में हिस्सा नहीं लेते, सवालों के जवाब नहीं देते, और सिर्फ बयान देने के लिए वे कभी-कभी संसद में आते हैं। उनका यह रूख मीडिया के साथ बातचीत में भी दिखता है जब वे या तो इंटरव्यू देते नहीं हैं, या फिर उनके इंटरव्यू देख-सुनकर यह समझ पड़ता है कि सबसे तल्ख सवालों को न पूछने की शर्त पर ही वह इंटरव्यू दिया गया है। 
यह बात जरूर है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहली बार ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकार की अगुवाई कर रहे हैं, और पार्टी पर काबू पा सके हैं। लेकिन भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में सड़क से लेकर संसद तक, और मीडिया से लेकर विपक्ष तक के सवालों के जवाब देकर ही वे सम्मान पा सकते हैं, और अपने मन की लंबी-लंबी बातों को माईक और रेडियो पर कहते हुए उन्हें यह भी करना होगा कि वे लोगों की छोटी-छोटी बातों को सुनें, और और अपने पसंदीदा सवालों से परे, अपने को नापसंद सवालों के जवाब भी देना सीखें। आज की नौबत न तो लोकतंत्र के लिए अच्छी है, और न ही मोदी के खुद के लंबे राजनीतिक भविष्य के लिए अच्छी है। नोटबंदी एक ऐसा मौका हो सकता था जब वे बाकी लोगों के साथ मिलकर देश को भरोसे में लेते, लेकिन वे ऐसा कर नहीं पाए। 

परोसा गया सच, पूरा सच मानने के ही हकदार लोग

संपादकीय
20 नवंबर 2016

देश में आज बहुत से मुद्दों की जिंदगी बस कुछ-कुछ महीनों की चल रही है। कभी सरहद पर हिन्दुस्तानी फौज की एक शहादत भी हफ्तों तक मीडिया में छाई रहती है, और देश की आबादी को देशभक्त और गद्दार ऐसे दो तबकों में बांटने का काम करती है। कभी गाय ऐसा मुद्दा बनती है कि कुछ महीनों तक हर तरफ लोग गाय को मारने के शक में मारे जाते हैं, पिटते हैं, और फिर एकाएक गाय का मुद्दा गायब हो जाता है, और वह महज घूरों पर खाकर जीने के लिए छोड़ दी जाती है। कभी कश्मीर खबरों में आता है तो लगता है कि देश में वही एक मुद्दा है, और फिर महीने-दो महीने में कश्मीर के कोई नामलेवा नहीं बचते। कुछ ऐसा ही नोटों के साथ हो सकता था, और हो सकता है कि केन्द्र सरकार ने नोटबंदी की तकलीफ की जिंदगी कुछ हफ्तों की ही आंकी हो, लेकिन यह मामला लंबा चलते दिख रहा है। 
बहुत से लोगों का यह भी मानना रहता है कि राजनीतिक पार्टियां या सरकारें इस तैयारी में रहती हैं कि उनके लिए किसी बड़ी दिक्कत या असुविधा की कोई खबर अचानक आ जाने पर मीडिया के पहले पन्ने से, या टीवी के प्राईम टाईम से उसे पीछे हटाने के लिए कौन सी खबर झोंकी जा सकती है। हो सकता है ऐसा होता भी हो, और हमारे पास ऐसे कोई सुबूत तो हैं नहीं कि मीडिया को परोक्ष रूप से इस तरह मोड़ देने का काम कोई करते हों, लेकिन बहुत से लोगों का यह मानना है कि ऐसा नियमित रूप से होते ही रहता है। लोगों को याद होगा कि जब उपप्रधानमंत्री देवीलाल ने प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह से बगावत करके जब किसान रैली का आयोजन किया था, और वे खबरों में छा गए थे, ऐन उसी समय वी.पी. सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट जारी की थी। मीडिया का कोई-कोई हिस्सा भी ऐसा होता है जो कि किसी सरकार या पार्टी की मदद करने के लिए ऐसी गढ़ी गई घटना, या थोपी हुई खबर को आगे बढ़ाकर खबरों को मोड़ देने का काम करता है। 
अब इस बात पर चर्चा का कुल मकसद इतना ही है कि पाठकों को यह अंदाज रहे कि उनके सामने खबरों और घटनाओं का, समाचारों और विचारों का जो सैलाब आता है, वह समंदर के कुदरती सैलाब की तरह न होकर कई बार मानवनिर्मित, गढ़ा हुआ सैलाब भी रहता है। और नमकीन समंदरी पानी आंखों में भरकर कुछ वक्त के लिए और कुछ भी दिखाना बंद कर देता है। ये ही ऐसे मौके रहते हैं जब मीडिया के मालिकों के कारोबारी हित एक बड़ी भूमिका निभाते हैं। बहुत से ऐसे मीडिया-कारोबार हैं जहां मीडिया वाला हिस्सा कारोबारी के बाकी हिस्से के मुकाबले पासंग भी नहीं बैठता, यानी एक फीसदी भी नहीं रहता। ऐसे में जाहिर है कि कारोबार के बाकी हित मीडिया के समाचार-विचार पर तो हावी होते ही हैं, वे पाठकों या दर्शकों को झांसा देने के काम में राजनीतिक या सरकारी साजिश के पूरे हिस्सेदार हो जाते हैं। दुनिया में जगह-जगह इसीलिए इस बात को बेहतर माना जाता है कि मीडिया कारोबार के साथ दूसरे कारोबार जुड़े हुए न रहें, लेकिन उदार अर्थव्यवस्था में ऐसी रोकटोक मुमकिन नहीं होती, और कुख्यात अंतरराष्ट्रीय, बहुराष्ट्रीय मीडिया मालिक रूपर्ट मर्डोक के तौर-तरीकों के चलते हुए पश्चिम की सुधारवादी जुबान में मर्डोकीकरण, या मर्डोकाइजेशन जैसा एक शब्द सामने आया है। अब गाली देने के लिए पश्चिम की किसी मिसाल के बिना काम न चले, ऐसा भी नहीं है, खुद भारत के भीतर मीडिया के बहुत से बड़े-बड़े कारोबारी राजनीति, सरकार, और साजिशों में बड़े खिलाड़ी की हैसियत से शामिल होते हैं। और ऐसे ही लोग इस बात में भी मददगार होते हैं कि कब किन घटनाओं को धकेलकर दर्शक-पाठक की आंखों से परे कर दिया जाए, कब झूठे सर्वे से एक भ्रमजाल गढ़कर पेश कर दिया जाए। और जब तक भारत के दर्शक या पाठक रियायती अखबार या रियायती चैनल के मोह में पड़े रहेंगे, उन्हें महज परोसे गए सच को पूरा सच मानने के अलावा और कोई हक हासिल नहीं होगा।

अमरीका, जर्मनी, और भारत

संपादकीय
19 नवंबर 2016


पाकिस्तान में अभी एक चट्टान पर बनी हुई बुद्ध की बहुत पुरानी प्रतिमा का जीर्णोद्धार किया गया है, इसे तालिबानों ने तबाह कर दिया था, क्योंकि उनके मुताबिक इस्लाम बुतपरस्ती के खिलाफ है। अब स्वात घाटी में माहौल सरकार के काबू में आया, तो पुरातत्व के जानकार लोगों ने इस पुरानी एतिहासिक प्रतिमा को फिर से शक्ल दी। लेकिन तालिबानी सोच और तबाही का एक छोटा सा दौर भी ऐसी तबाही कर सकता है जो कि बाद में कभी मरम्मत से पुरानी शक्ल में वापिस आ सके, और कभी न भी आ सके। आज अमरीका में निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लेकर एक ऐसी ही दहशत फैली हुई है कि वे अपने एक कार्यकाल में ही अमरीकी मूल्यों की इतनी तबाही कर सकते हैं, कि उन्हें वापिस सुधारना पता नहीं मुमकिन हो पाएगा या नहीं, या हो भी पाएगा तो पता नहीं किस हद तक। 

लोकतंत्र में ऐसे दौर आते-जाते रहते हैं जब लगता है कि तबाही कभी सुधारी नहीं जा सकेगी। लोगों को याद होगा कि अभी पौन सदी पहले ही जर्मनी में हिटलर जनता के बहुमत से चुनकर संसद में आया था, और उस वक्त ऐसा लगता था कि अपनी फौजी ताकत के भरोसे वह पूरी दुनिया में राज करने लगेगा, उसने दसियों लाख यहूदियों का कत्ल करवाया, अपने देश में सोच से लेकर कला तक, सबको कुचल डाला, लेकिन वक्त ने उसे ऐसा कुचला कि जर्मनी आज तक हिटलर की कलंकित शर्मिंदगी से उबर नहीं पाया है। और आज के जर्मनी की हालत यह है कि वह योरप के तमाम देशों में इस बात में सबसे आगे है कि खाड़ी के देशों से वहां पहुंचते मुस्लिम शरणार्थियों को जगह दे। हालत यह है कि इन शरणार्थियों को बहुत अधिक जगह देते-देते सरकार आलोचना का शिकार भी हो रही है, लेकिन अपनी उदार और लोकतांत्रिक, और अंतरराष्ट्रवादी सोच पर कायम है। दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप ने अपने बहुत ही जहर भरे हुए, नफरत पर टिके, साम्प्रदायिक चुनाव प्रचार में यह भी कहा था कि वे मुस्लिमों का अमरीका में आना रोक देंगे। और राष्ट्रपति चुने जाने के बाद भी उन्होंने कहा है कि जो प्रवासी लोग बिना पूरे कानूनी कागजात के अमरीका में हैं, ऐसे दस-बीस-तीस लाख लोगों को भी वे बाहर निकाल देंगे। उनकी इस सोच के खिलाफ अमरीका के उदारवादी लोग, वहां के विश्वविद्यालयों के छात्र इस बात की तैयारी कर रहे हैं कि विश्वविद्यालयों की जमीन को ऐसे लोगों को शरण देने के लिए खोल दिया जाए। 
भारत में भी आज एक सीमित तबके के तौर-तरीकों को लेकर अल्पसंख्यकों से लेकर दलितों और आदिवासियों तक में भारी दहशत फैली हुई है। बहुत से लोगों को लगता है कि मोदी सरकार आने के बाद गोमांस से लेकर बाकी तमाम बातों तक जो एक बहुत ही हमलावर सनातनी या ब्राम्हणवादी सोच देश पर लादी जा रही है, उससे देश के सामाजिक ताने-बाने का जो नुकसान होने जा रहा है, उसकी भरपाई कभी नहीं हो पाएगी। बहुत से लोग अमरीका और भारत की तुलना कर रहे हैं, बहुत से लोग जर्मनी से भारत की तुलना करते ही हैं, और अभी अमरीका में एक शिक्षक को काम से हटा दिया गया है जिसने कि डोनाल्ड ट्रंप के तौर-तरीकों की तुलना हिटलर के तौर-तरीकों से की थी। यह सिलसिला कभी बंद नहीं हो सकता, क्योंकि इतिहास तो हमेशा ही मिसालों के लिए मौजूद रहता है, और ताकतवर लोगों की कार्रवाई लोगों को सोचने के लिए मजबूर करती ही है। आज भारत में जिस तरह से सबसे कमजोर और सबसे गरीब तबके पर नोटबंदी की मार पड़ रही है, उससे भी यह बात लगती है कि सत्ता पर बैठे हुए लोगों की, सत्तारूढ़ पार्टी के लोगों की उंगलियां गरीबों की नब्ज पर बिल्कुल भी नहीं रह गई हैं। 

दुनिया का इतिहास ऐसे कई दौर देख चुका है, और बहुत से देश अलोकतांत्रिक ताकतों से उबर भी पाते हैं, जैसे कि हिन्दुस्तान आपातकाल से उबरा ही था। लेकिन लोग अपने हमलावर तेवरों का इस्तेमाल करते हुए यह भूल जाते हैं कि इतिहास ऐसे बहुत से लोगों से भरा पड़ा है जो अपनी ताकत के दिनों में अपने को खुदा मानने की गलती कर बैठे थे। अमरीका हो, जर्मनी हो, या भारत का लोकतंत्र, इन सबका इतिहास लोकतंत्र पर लौटकर आने का है, और इन तमाम जगहों पर सत्ता पर जो लोग आते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि इतिहास में कोई भी ताकत के बेजा इस्तेमाल के साथ हमेशा कायम नहीं रह पाते।

द डे ऑफ्टर के लिए हर कोई तैयारी कर रखे

संपादकीय
18 नवम्बर 2016  
नोटों पर सुलग रहे देश में अब जनता को यह भी सोचना होगा कि सरकार की कार्रवाई से परे, और नोटों के मौजूदा अकाल के गुजर जाने पर भी वह अपना क्या इंतजाम रखे। हम पिछले कई दिनों में सरकार की कमियों पर चर्चा कर चुके हैं, आज कुछ चर्चा जनता के हिस्से की जरूरी है कि ऐसा फिर होने पर उसे किस तरह से तैयार रहना चाहिए। लेकिन यह तो सरकार की लाई हुई नौबत है, हमारे पाठकों को याद होगा कि हम देश पर किसी साइबर हमले की आशंका की चर्चा करते हुए कई बार इसी जगह लिख चुके हैं कि सरकारों को ऐसा होने पर किन-किन बातों के लिए तैयार होना चाहिए। ऐसे हमले किसी देश की बैंकिंग पर, उसके ट्रेन और प्लेन के रिजर्वेशन पर, उसके क्रेडिट कार्ड कंपनियों पर एक साथ हो सकते हैं, और उसका असर भी या तो अभी की नोटबंदी जैसा होगा, या फिर इससे भी और बुरा होगा। और आज दुनिया में एक-दूसरे देशों पर जैसे साइबर हमले होते हैं, उन्हें देखते हुए हम ऐसी किसी नौबत को नामुमकिन बिल्कुल भी नहीं मानते।
भारत की सरकार को भी इस बारे में सोचना चाहिए, क्योंकि आज नोटबंदी को लेकर यह बात साफ है कि सरकार की समझ और उसकी तैयारी दोनों में कमजोरी का एक कड़ा मुकाबला हुआ है, और उसकी शिकार देश की जनता हुई है। दूसरी तरफ जनता ने भी कभी ऐसी नौबत की कल्पना नहीं की थी, और आबादी के शायद चार फीसदी लोगों के पास ही क्रेडिट कार्ड है जिससे कि खरीददारी हो सकती है, बहुत से लोगों के पास एटीएम कार्ड हैं, लेकिन वे उससे खरीददारी के आदी नहीं हैं, और सरकार का इंतजाम बुरी तरह से और पूरी तरह से नाकाफी था। अब अगर किसी दूसरे देश या हिन्दुस्तान के भीतर के किसी आतंकी संगठन के साइबर हमले से अगर बैंक, रेल, विमान, और क्रेडिट कार्ड के सारे ऑनलाईन इंतजाम एक साथ ठप्प कर दिए जाएं, तो देश में गृहयुद्ध जैसी नौबत आ सकती है। लोग खाने-पीने के सामान के लिए पूरे देश में लूटपाट को मजबूर हो सकते हैं, जैसा कि अभी मध्यप्रदेश में एक-दो जगह सामने आया। और ऐसे किसी भी जरूरतमंद को मुजरिम कहना भी जायज नहीं होगा। दूसरी तरफ सोने या शेयर में पूंजीनिवेश, घर की आलमारी या लॉकर में नगदी रखना भी बड़ी हिफाजत का काम नहीं होगा। लेकिन लोगों को कुछ न कुछ सोचकर रखना चाहिए। दिक्कत यह है कि आबादी का अधिकतर हिस्सा ऐसा है जो पाई-पाई को खर्च करके ही दाना-दाना जुटा पाता है, और उसके पास यह ताकत नहीं है कि वह घर पर अधिक नगदी रख सके।
लेकिन जिस तरह से दुनिया में बहुत सी फिल्में बनी हैं जिनमें परमाणु युद्ध के अगले दिन क्या होगा, या किसी और हादसे के अगले दिन क्या होगा, उसी तरह हिन्दुस्तान की जनता को भी ऐसी, द डे ऑफ्टर, नौबत के लिए सोचना चाहिए। कम से कम लोगों को जरूरत की दवाईयां हफ्ते-दस दिन के लिए रखनी चाहिए, गाडिय़ों में पेट्रोल-डीजल भराकर रखने की आदत डालनी चाहिए, राशन कम से कम कुछ दिनों का तो रखना ही चाहिए, और नगदी भी घर या बैंक के लॉकर में कम से कम एक पखवाड़े जिंदा रहने लायक रखना चाहिए, और छोटे नोटों में रखना चाहिए जिसके कि बंद होने का खतरा कम होगा।
इस नोटबंदी से पूरे देश में लोगों का सरकार पर से, बैंकों के इंतजाम पर से, अपने पैसों की ताकत पर से, और अपनी खुद की क्षमता पर से भरोसा बहुत बुरी तरह टूटा है। बहुत कमजोर लोग बहुत बुरी तरह हिल गए हैं, और इससे उबरकर फिर से आत्मविश्वास के साथ खड़ा होना आसान भी नहीं रहेगा। लेकिन दुनिया तो दुनिया है, वह चलती ही रहती है, और कोई नौबत इससे भी अधिक बुरी आ सकती है, और समाज के बाकी लोग कैसे बेरहम हो सकते हैं, यह कल आन्ध्र के एक अस्पताल में दिख गया है जब एक गरीब औरत सरकारी अस्पताल के भीतर अपने विकलांग बीमार पति को रैम्प पर घसीटकर ऊपर की मंजिल पर ले जा रही है, और आसपास के लोग तमाशबीन खड़े हुए देख रहे हैं। इसलिए लोगों को खुद ही इस सरकार, या अगली किसी सरकार के, या किसी दुश्मन देश के, या किसी आतंकी संगठन के डिजिटल और साइबर हमले की सोचकर जिंदा रहने का जुगाड़ करके रखना चाहिए।

नोटबंदी की तारीखों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया है सरकार ने...

संपादकीय
17 नवम्बर 2016  
न चाहते हुए भी आज फिर देश में मची हुई तबाही को लेकर फिर एक बार लिखना पड़ रहा है। किसी एक मुद्दे पर न तो इतना लिखना ठीक है, और न ही कोई इतना पढ़ ही सकते, लेकिन यह देश में शायद पहला ऐसा मौका है जो लोगों की जिंदगी कुछ दिनों या हफ्तों के लिए इस तरह और इस हद तक तबाह हुई है। मोदी सरकार का नोटबंदी का फैसला देश के सबसे कमजोर लोगों से लेकर मध्यमवर्गीय लोगों तक इतना भारी पड़ रहा है कि उसका अंदाज तमाम खबरों के बावजूद लगाना बड़ा मुश्किल है। और सरकार हालात पर पल-पल नजर रखते हुए अपने नियमों में हर दिन कुछ न कुछ फेरबदल कर रही है, ताकि जनता की दिक्कत कुछ कम हो, लेकिन देश की बैंकिंग क्षमता इतनी सीमित है, और आबादी का अधिकतर हिस्सा नगदी लेन-देन पर इस कदर टिका हुआ है, कि शहरी योजनाकारों और नीति-निर्धारकों की तैयारी किसी काम नहीं आई। दर्जनों लोग बैंकों की कतारों में मर चुके हैं, पूरी-पूरी सर्द रात बच्चों को लिए हुए महिलाएं कतारों में हैं, लोग आत्महत्याएं कर रहे हैं, और बिना इलाज वक्त गुजार रहे लोगों के आकड़े तो खबरों में आ भी नहीं सकते। लेकिन इसके साथ-साथ आज न दिखने वाला, और आंकड़ों में न आने वाला एक बहुत बड़ा नुकसान और हो रहा है, शादियों के इस मौसम में काम पाने वाले कारीगरों और मजदूरों का धंधा खत्म हो गया है, जो कि देश में करोड़ों की संख्या में हैं, इसके साथ-साथ दसियों करोड़ खेतिहर मजदूर खेत से लेकर मंडी तक से बाहर हैं क्योंकि देने को मजदूरी नहीं है, या मजदूर परिवार बैंकों के बाहर पड़े हुए हैं।
अब इन तमाम बातों को देखकर लगता है कि केन्द्र सरकार ने जनता पर इस भयानक हमले की तैयारी करते हुए मौसम और तारीखों को देखा तक नहीं। शादियों के महूरत बड़ी आसानी से कैलेंडर और पंचांग से देखे जा सकते थे, और भारत के खेत-खलिहानों और मंडी के मौसम की जानकारी तो केन्द्र सरकार के पास हमेशा से रहती ही है। इन दो बड़ी बातों को अनदेखा करके इस वक्त का यह हमला सरकार की बहुत ही कम समझबूझ का एक बड़ा सुबूत है। दूसरी तरफ यह बात भी समझ से परे है कि जब देश के कोई एटीएम नए आकार के नोटों के लिए तकनीकी रूप से तैयार नहीं थे, तब या तो नोट ही पुराने आकार में छप जाते, या बिना किसी हल्ले के एटीएम में एक और आकार जोड़ा जा सकता था। इसके अलावा किसी भी काबिल सरकार से यह उम्मीद भी की जाती है कि अगर इतने बड़े पैमाने पर कोई कार्रवाई होनी थी, तो बैंकों के मौजूदा ढांचे की सीमित क्षमता से परे भी किसी और तरह की समानांतर व्यवस्था सरकार करती, फिर चाहे वह पुलिस थानों पर नोटों की बदली करती, या किसी और विकल्प का इंतजाम करती।
आज की इस कार्रवाई में उन लोगों की कोई जगह नहीं है जिनके पास किसी तरह की पहचान नहीं है, जिनके पास बैंक खाते नहीं हैं, या कि जो लोग बैंकों तक जाने की ताकत नहीं रखते हैं। ऐसे लोग भी करोड़ों में हैं जिनमें बहुत गरीब, विकलांग, फुटपाथी बच्चे, मानसिक विचलित बेघर लोग, और दूसरे प्रदेशों में मजदूरी कर रहे बिना आईडी वाले लोग शामिल हैं। इनके लिए सरकार की योजना में कोई जगह नहीं है, और ये वे लोग हैं जो सबसे ही नाजुक हालात में हैं, जिनके लिए कोई सहारा नहीं है। हमको यह भी हैरानी है कि पिछले बरस दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनने का दावा करने वाली भाजपा ने भी अपने नेता नरेन्द्र मोदी के इस ऐतिहासिक फैसले की दिक्कतों से जनता को उबारने के लिए अपने सदस्यों से कुछ नहीं कहा है। होना तो यह चाहिए था कि अपने नेता के फैसले से गरीब जनता पर आ रही दिक्कत को दूर करने के लिए भाजपा-सदस्यों को झोंक दिया जाता। अगर ऐसा भी होता, तो भी लोगों की तकलीफ और शिकायत कुछ कम होती, कुछ दूर होती। आज तो देश के करोड़ों लोगों के उत्पादक घंटे खत्म हो रहे हैं, जो रोजगार रोज के हैं, उनकी कमाई और मजदूरी की संभावना उस दिन के डूबने के साथ ही डूब रही है, और सच तो यह है कि देश में कालेधन को नोटों की शक्ल में रखने वाले लोग आज भी बेफिक्र हैं कि वे किसी और के नाम से बैंकों में पैसा डालकर निकाल लेंगे, और तीन चौथाई रकम तो बची ही रहेगी। लेकिन इस पूरे दौर में गरीब की तकलीफ, और उसकी यह बेबसी कि उसके पास अपनी रकम रहते हुए भी आज वह भिखारी की तरह बैंकों के सामने खड़ा है, एक-एक दुकानदार के सामने रहम मांग रहा है, अस्पतालों के सामने रो-पीट रहा है, यह बहुत ही भयानक है। हम नहीं जानते कि इस नौबत से निकलने के लिए मोदी सरकार के पास कोई एग्जिट-स्ट्रेटेजी है या नहीं, लेकिन यह बात तय है कि केन्द्र सरकार, और मोदी के सहयोगियों में देश की आधी गरीब आबादी के बारे में अंदाज बहुत ही कम और कमजोर है। ठीक ऐसे में जले पर नमक छिड़कने के लिए ये खबरें आ रही हैं कि विजय माल्या जैसे खरबपति दिवालिया के हजारों करोड़ के कर्ज को बैंक बट्टे-खाते में डाल रहा है। पता नहीं इतने गरीबों की इतनी तकलीफ भरी आह का क्या असर होगा?

केन्द्र की अपार बेफिक्री उसी के लिए आत्मघाती हो सकती है...

संपादकीय
16 नवम्बर 2016  
संसद में कांग्रेस सहित बाकी विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने नोटों की बदली को लेकर मोदी सरकार पर तगड़ा हमला बोला है, और शिवसेना से लेकर ममता बैनर्जी तक राष्ट्रपति से जाकर शिकायत करने में एक साथ रहे। पिछले हफ्ते भर में हजार-पांच सौ के नोट बंद होने से देश का माहौल लगातार इतना खराब और इतना तनावपूर्ण हो गया है कि इस फैसले की उपयोगिता, उसके फायदे से कहीं अधिक उसका नुकसान देखने में आ रहा है। बैंकों में कितने नोट जमा हुए, और बाकी बचे हुए नोटों को कालाधन मान लेने के आंकड़े तो गिना जाएंगे, लेकिन इस दौरान आम लोगों की रोजी-रोटी जिस बुरी तरह छिन गई है, लोग जिस तरह कतार में लगे-लगे मर गए हैं, जिस तरह आत्महत्या कर रहे हैं, जिस तरह शादियां टल गई हैं, इलाज थम गया है, और लाशों को अस्पताल से छुड़ाना मुश्किल हो रहा है, उसे आंकड़ों में गिनना मुमकिन नहीं रहेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस नोट बदली को देशभक्ति से जोड़ लिया है, और लोगों से उनके पचास दिन मांगे हैं। इस देश में कालेधन वाले लोग एक फीसदी से भी कम हैं, लेकिन बचे निन्यानबे फीसदी लोगों में से अधिकतर ऐसे हैं जो पचास दिन की दिक्कत तो दूर, पांच दिन की दिक्कत भी झेलने की ताकत नहीं रखते। ऐसे लोगों को नोट बदलने के लिए, और बैंकों से मिले बड़े-बड़े नोटों से जिंदगी चलाने के लिए आज जिस तकलीफ से गुजरना पड़ रहा है, वह राष्ट्रीय उत्पादकता के आंकड़ों में अगर गिनी जा सकती, तो वह कालेधन के घटने के फायदों से कहीं अधिक होतीं। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी और इस फैसले में उनके सहयोगियों को जमीनी हकीकत का अंदाज नहीं है कि देश की अधिकतर जनता किस तरह दाने-दाने के लिए संघर्ष करती है, और ऐसे में कमाने के उसके कई-कई दिन अगर खत्म कर दिए जा रहे हैं, तो वह गरीब का बहुत बड़ा नुकसान है। और ये दिन महज बैंकों के सामने कतार में बर्बाद हो रहे दिन नहीं हैं, आज पूरे देश के बाजार-कारोबार को जो लकवा मार गया है, धंधे चौपट हो गए हैं, मजदूर खाली बैठे हैं, सामान सड़ रहे हैं, फसल कट नहीं पा रही है, लोग औने-पौने में अपने नोटों से लेकर सामान तक को देने को बेबस हैं, यह सब देश का बहुत बड़ा नुकसान है, और ये आंकड़े अडानी-अंबानी की बेलैंस-शीट की तरह दिखने वाले नहीं हैं।
इस फैसले को जितने खराब तरीके से केन्द्र सरकार ने लागू किया है, और जितनी खराब तैयारी इसके लिए थी, वह भी हक्का-बक्का करने वाली है। महज भावना की बातें करके और जनता को देशभक्ति की चुनौती देकर सरकार अपनी नाकामयाबी की जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। और संसद में आज कांग्रेस के आनंद शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से यह सवाल भी किया है कि उन्होंने नोटों के बारे में दिए जा रहे अपने सार्वजनिक भाषण में जिस तरह अपनी जान पर खतरा गिनाया है, उन्हें देश को उसकी भी जानकारी देनी चाहिए। यह सवाल भी एक जायज सवाल है, और भारत के प्रधानमंत्री ऐसी गंभीर बात को महज जिक्र करके नहीं छोड़ सकते, उन्हें इसका खुलासा भी करना चाहिए।
आज एक दिक्कत यह हो गई है कि मोदी समर्थक बहुत से लोग सोशल मीडिया पर इतने अधिक सक्रिय हैं, और मोदी के हर फैसले के हर बारीक पहलू तक वे इस तरह समर्थन का कीर्तन-मंजीरा बजाने लगते हैं, कि तर्क खो जाते हैं, इंसाफ की बात भी नहीं उठ पाती है। और ऐसे हो-हल्ले में यह सामने मुश्किल से आ पाता है कि जनता किस तरह की तकलीफ से गुजर रही है। सोशल मीडिया पर तर्कहीन तरीके से जो तबका ऐसे हमलावर अंदाज में हावी होता है, वह जनता की नब्ज पाने की संभावना खो बैठता है। हमको लगता है कि मोदी को अपने समर्थकों के ट्वीट और उनकी फेसबुक पोस्ट से परे भी जमीनी हकीकत को जानने की कोशिश करनी चाहिए। गोमांस को लेकर, देश के दलितों को लेकर, देश के छात्रों को लेकर, और अब गरीबों के गिने-चुने नोटों को लेकर केन्द्र सरकार की जो अपार बेफिक्री दिखती है, वह खुद उसी के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है। और किसी के लिए न सही, अपने आपके लिए मोदी और उनके साथियों को आम जनता की तकलीफों, उनके जख्मों के बारे में मालूम करना चाहिए।

झूठ फैलाते सोशल मीडिया से खड़े हुए बड़े खतरे...

संपादकीय
15 नवम्बर 2016  
भारत में सोशल मीडिया नए किस्म का खतरा खड़ा कर रहा है, और बहुत से लोग उसे मीडिया के एक विकल्प के रूप में इस्तेमाल करके खुद भी खतरे में घिर रहे हैं, और बाकी लोगों को भी खतरे में डाल रहे हैं। सूरत के एक हीरा कारोबारी के बारे में कल से खबरें तैर रही हैं कि उसने छह हजार करोड़ रूपए के नोट बैंक में जमा कराए हैं, और उस पर वह दो सौ फीसदी जुर्माना भी देने को तैयार है। सामान्य समझबूझ के लोग भी यह हिसाब लगा सकते हैं कि कोई रकम जमा कराकर उस पर दो सौ फीसदी जुर्माना देने से बेहतर यह होगा कि उसे जलाकर हाथ ताप लिए जाएं, और एक इतिहास भी रच दिया जाए। यह झूठी खबर जंगल की आग की तरह सोशल मीडिया पर खबर बनाकर फैलाई गई, और जिस कारोबारी का नाम दिया गया वह पहले से जाना-पहचाना इसलिए भी था कि उसने नरेन्द्र मोदी का एक पहना हुआ सूट नीलामी में करोड़ों में खरीदा था। आज सुबह एक विश्वसनीय समाचार चैनल के कैमरे पर इस कारोबारी ने इस खबर को झूठा बताया और कहा कि उसने एक रूपया भी जमा नहीं करवाया है। लेकिन इसके बाद भी कई घंटे तक बड़े-बड़े अखबार अपनी वेबसाइटों पर इस खबर को पोस्ट करते रहे।
आज के वक्त में जब तक सच अपने जूते के तस्मे भी नहीं बांध पाता है, चटपटा झूठ पूरी दुनिया की सैर करके लौट आता है। एक दिक्कत यह हो गई है कि सोशल मीडिया नाम के इस नए जानवर के नाम में मीडिया शब्द जुड़ गया है और लोग इसे एक किस्म का मीडिया मान बैठे हैं। जबकि एक वक्त, टीवी आने के पहले मीडिया का मतलब प्रेस हुआ करता था, और कागज पर छपे हुए शब्द बड़ी जिम्मेदारी से छापे जाते थे, उनकी विश्वसनीयता रहती थी, और अखबार अपने छापे हुए के प्रति जवाबदेह भी रहते थे। इसके बाद रेडियो और टीवी आए, और उन पर खबरें हवा में तैरती लोगों तक पहुंचती थीं, और पल भर में हवा में घुल जाती थीं। नतीजा यह होता था कि इस मीडिया की जवाबदेही अखबार के मुकाबले कम होती गई। और अब तो सोशल मीडिया नाम के इस नए जानवर का न कोई डीएनए है, न इसके कोई फिंगर प्रिंट हैं, और न ही इसका कोई चेहरा है। नतीजा यह होता है कि इस पर सबसे गैरजिम्मेदार खबर, या सबसे चटपटा झूठ सबसे तेजी से आगे बढ़ाया जाता है, और अब तो इंटरनेट और फोन की टेक्नालॉजी लोगों को सहूलियत बढ़ाते चल रही है, और पल भर में लोग अपने फोन से झूठ को सैकड़ों लोगों तक बढ़ा सकते हैं, और जंगल की आग की तरह अफवाह एक हकीकत बनकर लोगों तक पहुंचती रहती है।
फिर यह भी है कि चटपटे झूठ का मजा लेने वाले कमअक्ल, जागरूकताविहीन लोगों को सच को परखने की नसीहत देना चाट के ठेले पर बेस्वाद खिचड़ी खाने की राय देने जैसा है। अमरीका में राष्ट्रपति का चुनाव जीतने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने भी यह कहा कि उनकी जीत में सोशल मीडिया का बड़ा हाथ रहा है। भारत में भी नरेन्द्र मोदी की पार्टी अपने सारे सांसदों और विधायकों से सोशल मीडिया पर मौजूदगी बढ़ाने और सक्रियता बढ़ाने को कहते आ रही है। खुद प्रधानमंत्री हर कुछ मिनट में कहीं न कहीं अपनी मौजूदगी दर्ज कराते चलते हैं। ऐसे वक्त में भारत में झूठ और नफरत पर आधारित तस्वीरें, लिखा हुआ, या वीडियो बड़ी रफ्तार से फैल रहे हैं, और जिम्मेदार लोग जब तक किसी एक झूठ को उजागर करते हैं, वह झूठ तो चारों तरफ फैल ही चुका रहता है, कई नए झूठ दौड़ शुरू कर चुके रहते हैं। भारत का आईटी कानून एक तरफ तो जरा-जरा सी राजनीतिक बातों पर जुर्म दर्ज करते चल रहा है, लेकिन लगातार साम्प्रदायिकता, हिंसा, और नफरत फैलाने वाले लोगों पर कोई कार्रवाई होते दिखती नहीं है। हमारा मानना है कि सोशल मीडिया एक नए किस्म की अराजकता का हथियार बन चुका है, और आगे भी बने रहेगा, लेकिन जिम्मेदार तबके को झूठ का भांडाफोड़ करने के लिए कुछ वक्त जरूर निकालना पड़ेगा, वरना दुनिया झूठ पर ही चलने लगेगी।

गृहमंत्री के सहायक पर कानून लागू नहीं होता?

संपादकीय
14 नवम्बर 2016  
छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री रामसेवक पैकरा के बहुत ताकतवर निजी सहायक को अफसरों के एक वॉट्सऐप ग्रुप पर बहुत से अश्लील वीडियो पोस्ट करते पाया गया, और उन्हें चेतावनी देकर उस ग्रुप से हटाया गया है। शुरू में ही इस पर प्रक्रिया मांगने पर किसी अखबार से उन्होंने इसे अपनी चूक कहा, और फिर बाद में अपने टैब के चोरी हो जाने की रिपोर्ट लिखाने की बात कही। यह समझना सहज है कि जुर्म हो जाने के बाद जुर्म के सुबूत चोरी हो जाने की रिपोर्ट लिखा देना पुलिस का पुराना मिजाज रहता है, और गृहमंत्री के निजी सहायक का पूरा वास्ता ही रात-दिन पुलिस से पड़ता है, इसलिए यह आसान रास्ता चुनना स्वाभाविक ही था।
अब सवाल यह है कि एक फेसबुक पोस्ट, या एक वॉट्सऐप संदेश को देकर अगर प्रदेश में अब तक दर्जनों या सैकड़ों गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, या जुर्म कायम हो चुके हैं, तो फिर सुबूतों वाला यह मामला उससे अलग कैसे है? और अगर गृहमंत्री का निजी सहायक ही ऐसी अश्लीलता फैलाकर देश के बहुत ही कड़े आईटी कानून को तोड़ रहा है और उसके खिलाफ कोई रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हो रही है, तो ऐसे प्रदेश की पुलिस पर जनता का क्या भरोसा रहेगा? लोगों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले एक दूसरे मंत्री के बेटे ने त्यौहार के मौके पर हो रहे सार्वजनिक अश्लील या वयस्क डांस के बीच पहुंचकर अपने अंगरक्षक से गोलियां चलवाईं थीं, और वह मामला भी रफा-दफा हो गया। इसके अलावा भी छत्तीसगढ़ में बहुत से ऐसे मामले हुए हैं जिनमें आम और खास के लिए अलग-अलग कानून सामने आया है। सत्ता से जुड़े हुए नेताओं, या बड़े अफसरों के खिलाफ न आईटी कानून लगता, और न ही ट्रैफिक के नियम लगते। दूसरी तरफ आम जनता के बीच के नासमझ लोग भी अगर चूक से कुछ कर बैठते हैं, तो वे मामला-मुकदमा झेलते हैं, या लंबा जुर्माना पटाते हैं। एक हेलमेट न लगाने पर एक मध्यमवर्गीय को भी पांच सौ रूपए का जुर्माना पटाना पड़ता है, दूसरी तरफ सत्ता से जुड़े हुए लोग अपनी गाडिय़ों पर नाजायज तरीके से लालबत्ती और सायरन लगाकर दहशत फैलाते हुए घूमते हैं, और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। हेलमेट न लगाने वाला महज अपनी जिंदगी को खतरे में डालता है, न कि दूसरों को परेशान करता है। लेकिन ताकतवर तबका गाडिय़ों से आतंक फैलाता है, नंबर प्लेट लगाए बिना घूमता है, और पकड़े जाने पर पुलिस को पीटकर भी चले जाता है।
सत्ता के साथ ऐसी ही दिक्कतें कार्यकाल खत्म होने के बाद चुनाव में अपना असर दिखाती हैं। कई प्रदेशों में चुनावी नतीजों के बाद कहा जाता है कि एंटीइंकमबेंसी का असर दिखा और सत्तारूढ़ पार्टी हार गई। ऐसा इसलिए होता है कि लगातार पांच बरस की सत्ता सत्तारूढ़ पार्टी के लोगों को बददिमाग कर देती है, और उन्हें ऐसा एहसास कराने लगती है कि वे कानून से ऊपर हैं। नतीजा यह होता है कि इस मजे के चलते पांच साल आम जनता इसे देख-देखकर थकी हुई रहती है, और वह चुनाव के वक्त अपनी भड़ास निकालती है। छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ पार्टी इस बात पर गौर करे।

सरहद से परे आज देशभक्ति दिखाने का एक बड़ा मौका

विशेष संपादकीय
13 नवम्बर 2016  
पिछले एक-दो बरस से भारत में देशभक्ति और राष्ट्रवाद की बातें प्रचलन में बहुत अधिक हैं। बात-बात में लोग एक-दूसरे की देशभक्ति और गद्दारी तय करने लगे हैं, यहां तक कि जिन्हें सूर्य नमस्कार पसंद नहीं, वे भी पाकिस्तान जाने के फतवे पाने लगे हैं। ऐसे तमाम फतवेबाज सरहद पर पाकिस्तान से दो-दो हाथ कर लेने की ललकार-फुफकार के बिना दिन पूरा नहीं करते। ऐसे तमाम लोग जो कागजों पर लिखकर या सोशल मीडिया में पोस्ट करते हर कुछ घंटों में अपने-आपको शहीद का दर्जा देते हैं, उनके लिए महानता का एक मौका अनायास आ गया है।
आज देश भर में सबसे गरीब, सबसे बेसहारा, सबसे लाचार लोग बैंकों के सामने कतारों में रातें गुजार रहे हैं, दम तोड़ रहे हैं, खुदकुशी कर रहे हैं, अपने बीमार बच्चे के इलाज के लिए अस्पतालों के सामने बिलख रहे हैं, अपने मरे हुओं की लाशें अस्पताल से वापिस पाने के लिए जूझ रहे हैं, इसलिए कि केन्द्र सरकार ने बिना तैयारी पुराने नोट बंद कर दिए। अभी टीवी के परदे पर एक औरत रोते दिख रही थी जो आठ महीने के बच्चे को लिए आठ घंटे से बैंक के सामने खड़ी थी। पूरा देश ऐसे नजारों से भरा पड़ा है और ये भी वे हैं जहां तक मीडिया के कैमरे पहुंच रहे हैं। एक खबर यह भी है कि देश के सैंतालीस फीसदी लोगों के बैंक खाते हैं ही नहीं। अनगिनत खबरें हैं कि केन्द्र सरकार की रोजगार योजनाओं की मजदूरी लोगों को महीनों से नहीं मिली है। जाहिर है कि सबसे कमजोर आज सबसे मुसीबत में है।
ऐसे में कांग्रेस के राहुल गांधी ने अपनी पार्टी के लोगों से कहा है कि वे बैंकों और एटीएम की कतारों में लगे बुजुर्गों, कमजोर लोगों की मदद करें। ऐसे में वे तमाम लोग जो पाकिस्तानियों के सिर काटकर लाना चाहते हैं, जिनकी रग-रग में देशभक्ति फड़क रही है उनके सामने देशभक्ति साबित करने का एक अनोखा मौका आया है। फिलहाल वे पाकिस्तानी सरहद छोड़कर पास के बैंक या एटीएम जाकर किसी की मदद कर सकते हैं। उनकी जगह कतार में खड़े हो सकते हैं, पानी पिला सकते हैं, लोगों को बिस्किट जैसा कुछ खिला सकते हैं, उनका मोबाइल दस-बीस रूपये से चार्ज करवा सकते हैं। कुछ लोग अस्पताल जाकर दवा-फीस के भुगतान में मदद कर सकते हैं, कुछ लोग ऐसे गरीबों की मदद कर सकते हैं जो बिना बैंक खातों वाले हैं, फुटपाथी बच्चे या भिखारी, या कुछ रोगी-लावारिस, विक्षिप्त लोग, वे कहां जाएंगे?
जिन लोगों को नवरात्रि या दूसरे मौकों पर भंडारे चलाना अच्छा लगता है, तीर्थयात्रियों को पानी पिलाना अच्छा लगता है, उनके लिए भी एक मौका है सच्ची सेवा का, सच्चे तीर्थ का। जिन लोगों के रोज मंदिर-मस्जिद, गुरूद्वारा जाना अच्छा लगता है या हर इतवार चर्च जाना उनके लिए भी एक मौका है कि वे बैंक, एटीएम जाकर ईश्वर को खुश कर सकें। जो लोग उपदेशकों की बातें सुनने में पूरे-पूरे दिन गुजार देते हैं, उनको भी चाहिए कि सुने हुए प्रवचन, उपदेश पर अमल करने के लिए वक्त गुजारें, कतारों में लगे लोगों की मदद करके।
आज मोदी सरकार की तारीफ करने या उसे कोसने से परे यह जरूरी है कि इंसान, इंसान की मदद करें। जो लोग आज अपने शहर-गांव के लोगों की मदद नहीं कर सकते वे पाकिस्तानियों से क्या खाकर लडऩे जाएंगे? आज देखना है कि देश की कितनी पार्टियां, कितने धार्मिक, आध्यात्मिक या सांस्कृतिक संगठन अपने लोगों को जनता की मदद में झोंकते हैं। 

अफवाहों के लिए नाजुक इस देश में वैज्ञानिक सोच जरूरी

संपादकीय
12 नवम्बर 2016  
उत्तरप्रदेश में कल ऐसी अफवाह फैली कि नमक ढाई सौ रूपए किलो हो रहा है, और बात की बात में लोग मनमाने दामों पर नमक बेचने लगे, और खरीदने लगे। किसी जगह तो किसी दुकान के लूट लेने की भी खबर है। और यह नोटों को लेकर देश में चल रही दहशत के बीच की अफवाह का असर है। दरअसल हुआ यह है कि जिस तरह ये नोट बंद हुए हैं, उन्हें लेकर जनता के मन में तरह-तरह की आशंकाएं पैदा हो गई हैं, और लोग कहीं सोने की तरफ बढ़ रहे हैं, तो किसी तरह से अपने नोट बदलकर फिर नोटों से परे किसी और जगह अपनी जमा पूंजी लगाने की सोच रहे हैं। यह फैसला देश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा रहा, और जनता के लिए हिला देने वाला रहा, खासकर आम जनता के लिए। इसलिए ऐसे माहौल में किसी भी तरह की अफवाह तेजी से विश्वसनीयता पा लेती है।
लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले इस देश में गणेश प्रतिमाओं के दूध पीने की अफवाह फैली थी, और लोग अपने सरकारी दफ्तर या कारोबार को छोड़कर लोटे-गिलास में दूध लेकर मंदिरों और लोगों के घरों की प्रतिमाओं तक पहुंच रहे थे। कई बार ऐसा लगता है कि भारत जैसे लोकतंत्र में अंधविश्वास की जो पकड़ है, जितनी साम्प्रदायिकता है, या जितनी अंधभक्ति है, उसमें कोई भी अफवाह फैलाना बड़ा आसान काम है, और नमक के रेट बढऩे की अफवाह तो फिर भी ठीक है, अगर किसी साम्प्रदायिकता की, किसी राष्ट्रवादी हिंसा की अफवाह फैलाई जाएगी, तो क्या होगा? हमारे पाठकों को याद होगा कि हम बीच-बीच में देश में वैज्ञानिक सोच, और तर्कसंगत बातों के महत्व पर लिखते हैं। ऐसा जरूरी इसलिए है कि धर्म से लेकर आध्यात्म तक, और राजनीति से लेकर किसी जाति के संगठन तक, जहां-जहां लोगों का विश्वास लोकतंत्र और तर्क से परे किसी पर भी होता है, तो वह कभी भी आपा खोकर हिंसक हो सकता है, और ऐसा हमने जगह-जगह गुरुओं के मामले में देखा हुआ भी है। बरसों से बलात्कार के मामले में जेल में बंद आसाराम को आज भी जब पेशी पर लाया जाता है, तो उसके भक्तगण अदालत के बाहर भीड़ लगा लेते हैं। छत्तीसगढ़ में जगह-जगह सरकारी स्कूलों में कहीं आसाराम की किताबें खपाने की कोशिश करते हैं, तो कहीं उसके पोस्टर लगाकर जुलूस निकालते हैं। अगर लोगों के बीच लोकतंत्र के प्रति आस्था होती, तो ऐसा नहीं होता।
नमक की अफवाह आज देश की अर्थव्यवस्था पर लोगों के हिल गए भरोसे का एक संकेत और सुबूत है। केन्द्र सरकार को इस भरोसे को दुबारा कायम करने के लिए खासी मेहनत करनी पड़ेगी। आज तो जगह-जगह लोग सदमे में मर रहे हैं, या आत्महत्या कर रहे हैं। और इनसे परे भी अनगिनत ऐसे लोग हैं जो अपनी रोज की मजदूरी-कमाई को छोड़कर बैंकों के सामने खड़े हैं। ऐसी दिमागी हालत में जब लोगों के नोट बदल भी जाएंगे, तो एक बहुत बड़ा खतरा देश में यह रहेगा कि बैंकों और नोटों पर से लोगों का भरोसा घटा हुआ रहेगा, और वे पूंजी निवेश या बचत के कई ऐसे रास्ते ढूंढने लगेंगे जिसमें उनकी जमा रकम के डूबने का खतरा और अधिक रहेगा। यह सिलसिला थामने के लिए केवल बाजार में विश्वास लौटना जरूरी नहीं है, सभी तरह की वैज्ञानिक सोच को जनता में लाना जरूरी है, और यह बात महज जुमलों से हो नहीं पाएगी।

नोटों की यह बदली, नीयत की बदली नहीं दिखती है..

संपादकीय
11 नवम्बर 2016  
नोटों को बदलने का मोदी सरकार का फैसला अब धीरे-धीरे लोगों की अधिक आलोचना का शिकार हो रहा है। आम जनता को बहुत ही दिक्कतें हो रही हैं, और  किसी भी शहर-कस्बे की कोई ऐसी सड़क नहीं है जहां बैंकों के सामने, डाकघर या एटीएम के सामने लंबी-लंबी कतारें न लगी हों। और ये वे तमाम लोग हैं जिन्हें कुल चार हजार रूपए निकालने की या बदलने की छूट है। लोगों को लग रहा है कि करोड़ों लोगों को अपनी रोज की मजदूरी छोड़कर, अपना कामकाज छोड़कर अगर कुछ हजार रूपए बदलने के लिए पूरा-पूरा दिन खराब करना पड़ रहा है, तो केन्द्र सरकार को इसका कोई दूसरा रास्ता सोचना चाहिए था। दूसरी तरफ अर्थशास्त्रियों और जानकार लोगों की यह बात भी सामने आ रही है कि देश में कालाधन शायद कुल तीन फीसदी ही नोटों की शक्ल में है, बाकी कालाधन दूसरी चीजों में लगा हुआ है। ऐसे में आम जनता को बड़ी दिक्कत देकर अगर इस तीन फीसदी कालेधन का एक बड़ा छोटा सा हिस्सा ही हासिल किया जा सकेगा, तो यह पूरी मशक्कत ही फिजूल की साबित होगी।
आज बाजार की चर्चा यह है कि लोग अपने कालेधन के पुराने नोटों को नए नोटों में बदलने के रास्ते निकाल रहे हैं, और वे रास्ते निकल भी जा रहे हैं। एक आशंका यह है कि देश में जो दसियों करोड़ जन-धन खाते खुले हैं, उन खातों में लोग दलालों और एजेंटों के मार्फत अपना कालाधन जमा करके निकाल लेंगे, और छोटी-छोटी रकम से भी उनका बड़ा-बड़ा काम हो जाएगा। इसके अलावा देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो आयकर नहीं देता है, और उनमें से हर किसी के खाते में लाख-दो लाख रूपए डालकर लोग नई नगदी निकाल सकते हैं, और बाजार का एक अंदाज यह है कि इसमें पांच-दस फीसदी से अधिक खर्च नहीं आएगा। अगर ऐसा होता है तो नए नोटों को छापने पर किया गया पन्द्रह-बीस हजार करोड़ रूपए का खर्च, और उससे कई गुना अधिक बैंकों का खर्च, और उससे भी कई गुना अधिक आम जनता के वक्त का खर्च मिलकर इस पूरी कसरत को पानी में बहाते दिख रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे कार्टून तैर रहे हैं जिनमें देश के सबसे बड़े कारोबारी प्रधानमंत्री के साथ खड़े जोरों से हॅंस रहे हैं कि मूर्ख जनता यह सोचती है कि बड़े लोग अपना कालाधन नोटों की शक्ल में रखते हैं।
सोशल मीडिया पर ही एक दूसरी अफवाह भी जोरों से तैर रही है, और हो सकता है कि उसके चलते सरकार की एक संभावित संभावना खत्म हो जाए। लोग यह फैला रहे हैं कि सरकार सारे बैंक लॉकर भी सील करने वाली है। अब यह बात पिछले दो दिनों में इतनी फैल चुकी है, और लोग अपने लॉकर खोल-खोलकर नगद पैसे निकाल भी चुके हैं, गहने भी शादी के मौसम की वजह से निकाल चुके हैं, कि अब लॉकरों से बहुत कुछ हासिल करना शायद आसान नहीं होगा। लेकिन अगर केन्द्र सरकार नोटबंदी के साथ-साथ एक पखवाड़े के लिए लॉकरबंदी भी कर देती, और उसके बाद वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ ही एक-एक लॉकर खोलने की छूट देती, तो हो सकता है कि नोटों के मुकाबले अधिक कालाधन बरामद होता। फिलहाल तसल्ली की एक बात यह है कि हजार-पांच सौ के नोटों में जो नकली नोट चल रहे थे, वे देश की अर्थव्यवस्था से बाहर हो जाएंगे, और नकली नोट छापने वाली प्रेसों में जो ताजा स्टॉक रवाना होने वाला होगा, वह बेकार हो जाएगा। लेकिन इसके दूसरे पहलू को अगर देखें, तो ऐसे सारे नकली नोट आज बेकसूर लोगों के हाथों में अनजाने में पहुंचे हुए हैं, और जब बैंक उन्हें लेने से मना कर देगा, तो ये नुकसान ऐसे आम लोगों का होगा। यह नुकसान देश की अर्थव्यवस्था का न होकर, निजी लोगों का होगा और इसकी वजह से नकली नोटों के खत्म होने का फायदा भी खत्म होते दिखता है।
सरकार जब भी कोई इतनी व्यापक कार्रवाई करेगी, उससे कई लोगों को तकलीफ होना बहुत स्वाभाविक है। लेकिन फिलहाल नोटबंदी से कोई बड़ा फायदा दिख नहीं रहा है, और आम और गरीब लोगों को रोजाना नुकसान होते जरूर दिख रहा है। एक खतरा यह भी है कि गरीब और मध्यम वर्ग के पास अगर कहीं दबे हुए कुछ नोट रह जाएंगे, तो बाद में उनके मिलने पर उसकी कोई भरपाई नहीं हो सकेगी। एक आखिरी बात यह कि पहले दिन भी हमने लिखा था कि अगर बड़े दाम वाले नोटों की वजह से कालाधन बढ़ता है, तो अभी दो हजार रूपए के नए नोट जारी करने का क्या तुक है? एक तरफ तो सरकार ने नगद भुगतान की सीमा घटा दी है, दूसरी तरफ अधिक दाम के नोट जारी कर रही है, ये दोनों बातें एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं।
अगर सरकार कालेधन पर सचमुच कोई कार्रवाई करना चाहती है, तो उसे सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ तगड़ा वार करना पड़ेगा, भ्रष्ट लोगों को उम्रकैद देने जैसे कड़े कानून बनाने पड़ेंगे, सरकारी भ्रष्टाचार में पकड़ाए गए लोगों के खिलाफ तेजी से जांच और उतनी ही तेजी से मुकदमे की इजाजत देनी पड़ेगी, जो कि आज जरा भी दिखाई नहीं पड़ती है। ऐसा किए बिना नोटों की यह बदली, नीयत की बदली नहीं दिखती है।

ट्रंप के साथ यह दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध के सबसे करीब हो गई...

संपादकीय
10 नवम्बर 2016  
कल इसी जगह पर लिखने के लिए दो मुद्दों के बीच बड़ी कड़ी टक्कर थी। एक तो अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत की खबर थी, और दूसरी खबर हिन्दुस्तान में हजार-पांच सौ के नोट बदलने की। चूंकि हिन्दुस्तानियों की जिंदगी को नोट अधिक प्रभावित कर रहे थे, इसलिए कल उस पर लिखा गया, और दुनिया के सबसे ताकतवर दफ्तर के लिए दुनिया के एक सबसे बेदिमाग, सनकी, घटिया, हिंसक, और तानाशाह ट्रंप के चुने जाने पर लिखने की बारी आज आई है।
एक चुनाव में कांटे की टक्कर पर चल रहे दो उम्मीदवारों में से किसी का भी जीतना बहुत हैरान करने वाला नहीं होना चाहिए, लेकिन फिर भी दुनिया के अमन-पसंद और समझदार लोगों को यह भरोसा था कि अमरीका का बहुमत इतनी बड़ी चूक नहीं करेगा कि एक बहुत ही घटिया इंसान को राष्ट्रपति बना देगा। लेकिन ऐसा लगता है कि पढ़ाई-लिखाई से समझदारी का अनिवार्य रूप से कोई रिश्ता नहीं होता है, क्योंकि अमरीका में पढ़े हुए तो सभी हैं, लेकिन समझदार लोग या तो वोट डालने गए नहीं, या उनके बहुमत ने ट्रंप को वोट दिया। वहां पर वोटों की गिनती का तरीका कुछ अलग है, इसलिए वहां का बहुमत भी कुछ अलग तरीके से तय होता है। फिलहाल यह बात साफ हो चुकी है कि अगले चार बरस डोनाल्ड ट्रंप अमरीका को हांकेंगे। पिछले आठ बरस से डेमोक्रेटिक पार्टी के बराक ओबामा राष्ट्रपति थे, और इस बार भी इस पार्टी की तरफ से अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव की पहली महिला उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन का विकल्प मतदाताओं के सामने था, लेकिन घोर साम्प्रदायिक, नस्लविरोधी, अल्पसंख्यक विरोधी, दकियानूसी सोच को पूरी हिंसा और दमखम के साथ बार-बार दुहराने वाले, राजनीति से परे के कारोबारी डोनाल्ड ट्रंप को मतदाताओं ने पसंद किया। यह पहला मौका था कि जब रिपब्लिकन पार्टी के बड़े-बड़े नेता, उसके तमाम जिंदा भूतपूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ थे, और ट्रंप जितनी गालियां मुस्लिमों को, प्रवासियों को दे रहे थे, उतनी ही गालियां उन्होंने अपनी ही पार्टी के बड़े-बड़े दिग्गजों को दीं, और फिर भी चुनकर आए।
ऐसा लगता है कि अमरीका में लोकतंत्र का एक नया तौर-तरीका इन दिनों लोगों के बीच जगह बना रहा है। लोगों को हिंसा से परहेज नहीं रहा, गंदी जुबान से परहेज नहीं रहा, दूसरी महिलाओं पर यौन हमले करने के ट्रंप के दावों से परहेज नहीं रहा, और मुस्लिमों को अमरीका से बाहर कर देने जैसी साम्प्रदायिक बातों से भी जनता को परहेज नहीं रहा। अमरीकी जनता की यह दिमागी हालत बहुत ही हैरान और हक्का-बक्का करने वाली है। लेकिन दुनिया में नफरतजीवी नेताओं के जीतने के मामले कहीं-कहीं सामने आते रहते हैं, औैर हिन्दुस्तान भी समय-समय पर इस तरह के सदमे पाते रहता है। फिलहाल डोनाल्ड ट्रंप की शक्ल में दुनिया का सबसे बड़ा खतरा सामने आया है, और हमारी यह आशंका है कि आज दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के खतरे के सबसे करीब है, और अगले चार बरस ऐसे ही धड़कन थामकर इस खतरनाक आदमी का कार्यकाल खत्म होने का रास्ता देखना पड़ेगा। अमरीकी जनता के बहुमत ने, और उस बहुमत से भी शायद दुगुनी घर बैठी जनता की चुप्पी ने वहां के लोकतंत्र की साख चौपट कर दी है। अमरीकी लोकतंत्र के दुनिया भर में बरसाए जाने वाले दावे अब खोखले हो गए हैं, क्योंकि जो देश इतने भयानक अलोकतांत्रिक को चुनता है, वह बाकी दुनिया को लोकतंत्र की भला क्या नसीहत दे सकता है? हमारा ख्याल है कि जिस तरह एक वक्त जर्मन मतदाताओं को यह शर्म आई थी कि उन्होंने हिटलर को चुना था, अमरीकी मतदाता भी शायद चार बरस बाद की वैसी ही शर्मिंदगी की ओर बढ़े हैं। आज अमरीका को और बाकी दुनिया को शुभकामनाओं को बहुत जरूरत है, और पूरी दुनिया के सबसे बड़े गुंडे से बचने के लिए हम अमरीका और बाकी दुनिया को अपनी शुभकामना देते हैं।

नोटों के रंग बदलना गिरगिट के रंग बदलने जैसा होकर न रह जाए

संपादकीय
9 नवम्बर 2016  
कल रात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिन्दुस्तानी मीडिया में हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रम्प को खो कर दिया। उन्हें खबरों से ऐसा बाहर धकेला कि लोग अपने घर और जेब में पांच सौ और हजार के नोट गिनने में लग गए, और अगले दिन कैसे इसका निपटारा किया जाएगा यह सोचने में लग गए। नोटों को इस तरह एकाएक बंद करना एक बड़ा फैसला है, और यह फैसला अपने किस्म का देश का पहला फैसला न होते हुए भी आज की एक बड़ी विकसित भारतीय अर्थव्यवस्था में तूफान खड़ा करने वाला जरूर है। इन नोटों की जगह सरकार नए नोट छाप चुकी है और बैंकों में पहुंचा भी चुकी है। इसलिए दो-तीन दिनों की जनता की दिक्कत मानवीय तकलीफ की खबरें तो बनेंगी लेकिन देश की अर्थव्यवस्था से कालेधन को घटाने की एक कोशिश को एक मौका भी देगी। दो दिनों में देश में नए नोट प्रचलन में आ जाएंगे, और अगले डेढ़ महीने में तमाम छोटे और गरीब लोगों की दिक्कतें दूर हो चुकी रहेंगी, ये अपने मौजूदा हजार-पांच सौ के नोट बदल चुके होंगे। इसके बाद दिक्कतें केवल उनकी बचेंगी तो बचेंगी, जिन्होंने बड़ा कालाधन जमा कर रखा है, हालांकि उनकी दिक्कतों का भी अधिक खतरा दिखता नहीं है।
इन नोटों को दो वजहों से बदला गया है। एक तो यह कि आतंक से लेकर तस्करी तक, तरह-तरह के जुर्म से लेकर टैक्स चोरी तक, और भ्रष्टाचार से लेकर कालेधंधे तक, हर कहीं इन बड़े नोटों से ही लेन-देन चलता था, और अब इसे एक झटका लगेगा क्योंकि इतनी रकम को काले से सफेद करना थोड़ा सा मुश्किल होगा। इसकी एक दूसरी वजह यह है कि इन्हीं दोनों नोटों में लगातार नकली नोट बढ़ते जा रहे थे, और उनसे छुटकारा मुश्किल पड़ रहा था। अब उम्मीद की जाती है कि नए नोट ऐसी तकनीक के होंगे कि उनकी नकल करना आसान नहीं रहेगा। एक तीसरी बात बड़ी रकम के नोटों को बंद करने के पीछे यह रहती है कि कालेधन को ढोकर ले जाने में बड़े नोट सहूलियत देते हैं, और यह बात पूरी दुनिया में मानी जाती है। योरप में भी अभी पांच सौ यूरो के नोट को बंद करके बस दो सौ यूरो तक का नोट रखा जा रहा है। ऐसा कई जगहों पर हुआ है और इससे आतंक, जुर्म और समानांतर अर्थव्यवस्था को झटका लगता है। लेकिन भारत के संदर्भ में यह बात याद रखना जरूरी है कि यहां कालाधन कभी भी कम नहीं रहा है। अमरीका या योरप में, जहां पर कि तकरीबन सारी अर्थव्यवस्था बैंकों के माध्यम से चलती है, वहां पर नगदी के बड़े नोट अधिक मायने रखते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था तो हमेशा से नगदी पर चलती समानांतर अर्थव्यवस्था से लदी रही है, इसलिए इस तात्कालिक झटके के बाद हो सकता है कि दो महीनों के भीतर ही सारे कालेधंधे नए नोटों से होने लगें, और आने वाले चुनावों में नए नोट उसी तरह काम आएं जिस तरह अब तक आते रहे हैं।
भारत में कारोबार और काले-सफेद धन की दुनिया में एंट्री लेना एक बड़ा प्रचलित शब्द है जिसमें लोग दूसरों के खातों में अपना कालाधन डालकर उनसे सफेद धन अपने खाते में ले लेते हैं। अभी हमें केन्द्र सरकार के फैसले को लेकर यह शक है कि भारतीय बाजार और कारोबार अपने इस पुराने तरीके को फिर इस्तेमाल कर लेगा, और देश में हाल ही में खुले दसियों करोड़ जनधन खातों का इस्तेमाल, कर्मचारियों के खातों का इस्तेमाल करके पूरे ही कालेधन को सफेद बना लिया जाएगा, और सरकार की इतनी पूरी मशक्कत बेकार जाएगी। हमारा यह पुख्ता अंदाज है कि हफ्ते भर के भीतर देश भर में करेंसी एजेंट उग आएंगे, जो कि कुछ फीसदी कमीशन लेकर पुराने नोटों को नए नोटों में तब्दील करने का धंधा करने लगेंगे, और ऐसे एजेंटों के कर्मचारी बड़े संगठित रूप से करोड़ों जनधन खाता धारकों का इस्तेमाल करने लगेंगे। आज भी भारत में बैंकों के मुकाबले हवाला कारोबार इतना पनपा हुआ है कि बैंकों से रकम जितनी देर में दूसरे शहर पहुंचती है, उससे जल्दी दो नंबर की हवाला रकम पहुंच जाती है। और सरकार इस खुले कारोबार पर आज तक रोक लगा नहीं पाई है, और देश का एक भी ऐसा कारोबारी शहर नहीं है जहां से जितनी चाहे उतनी रकम हवाला न की जा सके। इसलिए महज नियम काफी नहीं होते, उन पर अमल पर सब कुछ टिका होता है। देखना है कि सरकार ने ऐसे खतरों की काट सोच रखी है, या नहीं। फिलहाल मोदी के इस फैसले की आलोचना की कोई वजह नहीं दिखती है, और देश की जनता की कुछ दिनों या कुछ हफ्तों की दिक्कत के बाद अगर नकली नोट, आतंकी कारोबार, जुर्म की दुनिया को झटका लगता है, तो यह अच्छी बात है, लेकिन अगर ये सब संगठित होकर सरकार की इस कोशिश के शिकंजे से बच निकलते हैं, तो फिर यह एक अच्छी लेकिन नाकामयाब कोशिश ही कही जाएगी।
इस पूरे सिलसिले में एक बात यह समझ नहीं आई है कि मोदी सरकार को दो हजार रूपए के नोट जारी करने की क्या जरूरत थी? क्योंकि सरकार ने बीस हजार रूपए से अधिक के नगदी लेन-देन पर रोक लगाई हुई है, खरीदी पर भी तरह-तरह के सुबूत देने की बंदिश लगाई हुई है, ऐसे में हजार रूपए के नोट ही कारोबार के लिए काफी थे, और बड़े नोट बड़ी जल्द ही दो नंबर के धंधों की सहूलियत बन जाएंगे, और सरकारी कोशिश पर हंसने लगेंगे। ऐसा लगता है कि आयकर विभाग ने जितने कालेधन की घोषणा की उम्मीद की थी वह पूरी नहीं हुई है, और नोटों का यह फैसला उसके पहले ही लिया जा चुका था, और कालेधन की घोषणा की तारीख खत्म होने के बाद अब यह दूसरी कोशिश की जा रही है।
सरकार को अपने खुद के कामकाज से भ्रष्टाचार को घटाना होगा। भारत में कालाधन खुद सरकार के धंधों से उपजता है, सरकार चलाने वाले नेताओं के चुनावों से उपजता है, और इसीलिए बाजार के कारोबार में उससे रियायत बरती जाती है, चुनाव के लिए उसे कायम रखा जाता है। आज भी बाजार का यह मानना है कि नेता, अफसर और ठेकेदार के पास ही सबसे अधिक कालाधन रहता है, और यह जनता के हक की कमाई से ही छीना गया पैसा होता है। अगर केन्द्र और राज्य सरकार अपने खुद के भ्रष्टाचार को घटाए, तो देश की अर्थव्यवस्था से कालेधन को वह कड़ाई से दूर कर सकेगी, वरना नोटों के ऐसे रंग बदलना कहीं गिरगिट के रंग बदलने की तरह की एक अस्थायी कार्रवाई होकर न रह जाए।

अगर कांग्रेस राहुल से परे सोच नहीं सकती, तो...

संपादकीय
8 नवम्बर 2016  
कांग्रेस कार्यसमिति ने कल सोनिया गांधी की गैरमौजूदगी में यह तय किया कि अब वे पार्टी की कमान अपने बेटे राहुल गांधी को सौंप दें। हिंदुस्तान की राजनीति में यह सबसे ही कम रहस्य की बात थी कि राहुल गांधी इस पार्टी के अध्यक्ष बनेंगे। और इसके साथ ही मोटे तौर पर ऐसा लगता है कि अगले कई राज्यों के चुनावों और देश के अगले आम चुनाव, इन सबमें कांग्रेस का भविष्य भी तय हो गया है। पूरी तरह से दरबारी चाटुकारिता वाली यह पार्टी एक कुनबे से परे देखना भूल चुकी है। और कुछ वक्त पहले जब नरसिंह राव के दौर में पार्टी और सरकार इस कुनबे के कब्जे से बाहर रहीं, तो उसके तुरंत बाद तमाम दरबारी जाकर फिर सोनिया गांधी के इर्दगिर्द लेट गए, और उन्हें मनाकर पार्टी का मुखिया बना दिया। सोनिया ने पार्टी को दो बार चुनावी जीत दिलवाई, और तमाम खामियों के बावजूद अपनी पार्टी के एक बेहतर नेता मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। उस वक्त सोनिया ने कांग्रेस संसदीय दल द्वारा उन्हें प्रधानमंत्री चुन लेने के बावजूद मनमोहन को जिम्मा दिया, और वह बड़ी समझदारी की बात थी। लेकिन आज ऐसी एक दूसरी समझदारी हो सकती है कि अगर राहुल गांधी से परे देखा जाता, और किसी दूसरे कांग्रेस नेता को पार्टी को जिंदा करने का मौका दिया जाता। पिछले दस से अधिक बरस में राहुल गांधी यह साबित कर चुके हैं कि वे किसी लीडरशिप के लायक नहीं हैं, और उनकी क्षमता की अपनी सीमाएं हैं। ऐसे में उन्हीं के कंधों पर पार्टी के पूरे भविष्य को लादकर कांग्रेसी-दरबारी न तो राहुल के साथ इंसाफ कर रहे हैं, और न ही कांग्रेस के साथ। हमारी फिक्र इससे कुछ और बढ़कर भी है कि कांग्रेस अगर विपक्ष में भी हाफ सेंचुरी से नीचे की पार्टी रहेगी, तो देश में लोकतंत्र का संतुलन पूरी तरह तबाह रहेगा। पिछले आम चुनाव में कांग्रेस की सांसद-संख्या 44 पर सिमट चुकी है।
दरअसल किसी एक कुनबे पर या किसी एक नेता पर टिकी हुई पार्टी का भविष्य तभी तक रहता है जब तक पार्टी की अगली पीढ़ी या वैसे अकेले नेता का करिश्मा कायम रहे। बाल ठाकरे के जाने के बाद बाकी लोगों का वैसा करिश्मा नहीं रहा, लेकिन दूसरी तरफ अखिलेश यादव हो सकता है कि मुलायम के मुकाबले भी अधिक करिश्मे वाले साबित हों। राहुल गांधी की शक्ल में कांग्रेस को नेहरू-गांधी कुनबे का एक ऐसा नेता मिल सकता था जो कि पूरी पार्टी को एक रख सके। पार्टी के बाकी नेता एक दूसरे की लीडरशिप के तहत काम करने को शायद तैयार न हों, और यही बात सोनिया या राहुल के मातहत सबको जोड़कर रख सकती है। लेकिन देश के संसदीय चुनाव कांग्रेस के भीतर नहीं होते, वे देश में मतदाताओं के बीच होते हैं, और वहां पर राहुल गांधी पूरी तरह, और बुरी तरह बेअसर हैं। अगर कांग्रेस राहुल से परे सोच नहीं सकती, तो जनता भी कांग्रेस के बारे में क्यों सोचेगी?

मेरा मुझको अर्पण

7 नवंबर 2016     

इसी महीने 29 तारीख को वल्र्ड गिविंग डे मनाया जाएगा। परोपकार या देने का,  दूसरों के लिए कुछ करने का दिन। और इसके लिए एक अंतरराष्ट्रीय गैरसरकारी संगठन ने अभी दो-चार दिन पहले एक सर्वे के नतीजे जारी किए हैं, उनके मुताबिक भारत के पड़ोस में बसा हुआ म्यांमार दुनिया में इस बात में सबसे आगे है। हालांकि यह देश बहुत संपन्न नहीं है, और यह आंतरिक अशांति से भी गुजर रहा है, लेकिन फिर भी लोगों में अजनबियों की मदद करना, दूसरों के लिए धन या समय देना, इन सभी पैमानों पर म्यांमार दुनिया में अव्वल है। अमरीका दूसरे नंबर पर है, और हिन्दुस्तान 140 देशों की इस लिस्ट में 91वें नंबर पर है।
अब इससे जुड़ी हुई बहुत सी छोटी-छोटी बातें याद पड़ती हैं कि किस तरह हिन्दुस्तान के लोग अपनी संस्कृति, और अपने जीवन मूल्यों को लेकर कुछ लोगों द्वारा खड़े किए गए एक पाखंड को हकीकत मानकर जीते हैं। वे अपने इतिहास की ऐसी गैरमौजूदगी कहानियों को सच मान बैठते हैं कि दुनिया में सबसे अधिक विकसित संस्कृति, विज्ञान, और सबसे महान नीति-सिद्धांत यहीं के थे। लेकिन जब कुछ देने की बात आती है, दूसरों के लिए कुछ करने की बात आती है तो यह देश कतार में सबसे आखिर में खड़ा दिखता है।
और ऐसा तब है जब महावीर और बुद्ध जैसे लोग इस देश में हुए जिन्होंने सांसारिकता को छोडऩे, और दूसरों के लिए करने की मिसालें कायम कीं। इसी देश में गांधी हुए जिन्होंने अपने तन पर एक लंगोटी सी आधी धोती के अलावा शायद चप्पल, चश्मा और एक घड़ी की विरासत भी समाज के लिए छोड़ी, और परिवार के लिए तो अपने नाम के बोझ ढोने के अलावा और कुछ नहीं छोड़ा। यह वही देश रहा जहां जवाहर लाल नेहरू ने अपनी निजी संपत्ति समाज के लिए दी, यह एक अलग बात है कि उन्हीं के कुनबे की आल-औलाद से लेकर कुनबे के दामाद तक ने सरकारी नियम-कायदों के लूटपाट से निजी जागीर खड़ी करने का काम किया, कहीं ट्रस्ट का बेजा इस्तेमाल किया और कहीं पार्टी के रूपयों का।
अब इस देश में अगर हम बड़े-बड़े लोगों को देखें, तो उनमें दो किस्म के लोग दिखते हैं। दूसरों को देने वाले लोग गिने-चुने हैं, और वे बस मिसाल तक सीमित रह जाते हैं। बाकी संपन्न तबका अपने लिए इतना ऊंचा मकान बनाने की सोच रखता है कि उसकी छत पर से हाथ बढ़ाकर चांद को छुआ जा सके। भारत में नारायण मूर्ति और अजीम प्रेमजी जैसे लोग हैं जिन्होंने अपने खुद के खड़े किए हुए पहली पीढ़ी के कारोबार से अपने कमाए हुए पैसों में से दसियों हजार करोड़ समाज के लिए देना तय किया है, देना शुरू कर दिया है, और यह एक अलग बात है कि इनको सार्वजनिक जीवन में विमान की इकॉनॉमी क्लास की सबसे सस्ती सीटों पर बैठे सफर करते देखा जा सकता है, हालांकि इनकी कम्पनियों के दूसरे अफसरों को महंगी सीटों पर भी सफर करने का हक हासिल है।
दूसरी तरफ अदानी और अंबानी जैसे लोग हैं जो कि सत्ता के चहेते रहकर लगातार लाखों-करोड़ रूपए कमा रहे हैं, और अपने देश की सरकार से सीधे और दूसरे देशों के साथ कारोबार में इस कमाई को जारी रख रहे हैं, लेकिन इनका दान किसी ने सुना नहीं है। फिर पुराने कारोबारियों में बिड़ला जैसे लोग हैं, जिनके घर में गांधीजी ठहरा करते थे, प्रवचन किया करते थे, और वहीं उन्होंने आखिरी सांस भी ली थी। एक वक्त बिड़ला को हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना माना जाता था, और हमें पहली नजर में बिड़ला का जो सामाजिक योगदान याद पड़ता है वह है कुछ शहरों में बिड़ला मंदिर बनवाने का। अब मंदिर के भीतर पता नहीं किस देवी-देवता की प्रतिमाएं हैं, लेकिन वह मंदिर कहलाता बिड़ला मंदिर है। इसलिए कुछ करोड़ रूपए खर्च करके इस कारोबारी ने अपने नाम को भगवान के नाम के साथ अमर कर लिया है, और ऐसा लगता है कि जिस तरह गांधी इस कुनबे के घर में ठहरते थे, उसी तरह देवी-देवता भी इन्हीं के घर में ठहरते हैं।
आज अमरीका में अपनी पीढ़ी से ही कारोबार को शुरू करके आसमान पर ले जाने वाले वारेन बफेट और बिल गेट्स जैसे लोग हैं जो कि खुद अमरीका में सबसे संपन्न लोगों में से हैं, और इन्होंने अपने सारे साम्राज्य के आधे या अधिक हिस्से को दान में देने की शपथ ली है, और देना शुरू भी कर दिया है। जिस उम्र में एक आम हिन्दुस्तानी अपनी पहली कार खरीदने की सोचते हैं, उस उम्र में फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने दसियों हजार या लाखों-करोड़ दान में देने की घोषणा कर दी है, ट्रस्ट बना दिया है, और दान का काम शुरू कर दिया है।
लेकिन दान का मौका अकेले दौलतमंद को नहीं मिलता, मामूली हैसियत के लोग भी समाजसेवा में अपना समय दे सकते हैं। हिन्दुस्तान में लोगों के बीच में इस बात को लेकर भी कोई जिम्मेदारी नहीं दिखती है, और गिने-चुने लोग किसी शहर में ऐसे दिखते हैं जो कि दूसरों के लिए खून जुटाने का काम करें, अपने इलाके की सफाई करें, बीमार जानवरों की मदद करें, फुटपाथ पर जी रहे इंसानों के लिए कुछ करें। इन सबमें पैसा नहीं लगता लेकिन एक दिलचस्पी लगती है, और हमदर्द होने की एक सोच लगती है। जाहिर है कि जब भारत 140 देशों में 91वें नंबर पर आ रहा है, तो यहां के लोग चाय ठेले या पान ठेले पर वक्त को बर्बाद कर लेते हैं, लेकिन उस वक्त का धरती के लिए, अपने लिए, दूसरों के लिए बेहतर इस्तेमाल नहीं करते।
और हिन्दुस्तान में दान का शायद पूरे का पूरा हिस्सा धर्म से जुड़ा हुआ है जिसमें लोग अपने धर्म के गुरुओं को, मंदिरों को ऐसा दान देते हैं जो कि उनके ही धर्म के दूसरे धर्मालु लोगों के काम आता है। जो पैसा सबसे जरूरतमंद के सबसे अधिक काम आए, वही दान हो सकता है। जब किसी का दिया हुआ दान अपने धर्म, अपनी जाति, अपनी आस्था, अपने ईश्वर, या अपने गुरू के लिए दिया हुआ होता है, तो वह उनकी निजी आस्था ही होती है, कोई दान नहीं होता।
हिन्दुस्तानी सड़कों के किनारे हर त्यौहार पर लोग भंडारा लगा देते हैं, और वहां पर बिना जाति या धर्म पूछे भी लोगों को प्रसाद खिलाते हैं, या ईश्वर के नाम पर कुछ और खिलाते-पिलाते हैं। लोगों को लग सकता है कि वे भूखे-गरीबों को खिला रहे हैं, लेकिन हकीकत यह रहती है कि राह चलते रूककर यहां पर खाने वाले लोग भूखे बिल्कुल भी नहीं होते, क्योंकि शहरों में भूख की जगह नहीं होती है। वे दिखने में गरीब जरूर होते हैं, और आस्था के नाम पर, या कि मुफ्त मिलने के नाम पर रूककर खा लेते हैं, या उससे उनके जिंदा रहने की बात नहीं जुड़ी होती। जो हकीकत में भूखे हैं, और जो बिना खाने के मरने की कगार पर हैं, वे शहरी भंडारों तक पहुंच भी नहीं पाते, और न इन भंडारों का कुछ प्रसाद वहां तक पहुंच पाता। लेकिन ऐसे भंडारों पर खर्च करने वाले लोगों को यह तसल्ली रहती है कि वे दान कर रहे हैं।
यह तसल्ली उसी तरह की है जिस तरह मुम्बई के एक राजनीतिक-डॉन राज ठाकरे ने पिछले दिनों वहां के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस की मौजूदगी में एक फिल्म  से सैनिक कल्याण के लिए पांच करोड़ का दान दिलवाकर पाई है। इस फिल्म में पाकिस्तान के एक कलाकार को लिया गया था, और उसकी सामाजिक सजा के रूप में, फिल्म को बिना हिंसा सिनेमाघर पहुंचने देने के लिए मुम्बई में गुंडागर्दी के लिए कुख्यात इस नेता ने यह दान दिलवाया, और इसकी घोषणा से ही देश भर से इसकी निंदा भी होने लगी कि क्या देश के सैनिकों को गुंडों की बंदूक की नोंक पर उगाहे गए दान की जरूरत है?
दान और परोपकार का यह पूरा सिलसिला लोगों की धार्मिक सहूलियत से भी चौपट हो जाता है। जो लोग मंदिरों के बाहर बैठे भिखारियों को कुछ सिक्के देकर बाद में दिन भर अपने काम और कारोबार में भ्रष्टाचार, टैक्स चोरी, और कालाबाजारी के लिए मानसिक ताकत पा जाते हैं, वे भी अपने आपको दानी और परोपकारी मान लेते हैं। यह तो अपनी ही आत्मा को बोझमुक्त करने का सबसे सस्ता और आसान रास्ता रहता है, और हिन्दुस्तान में इसी का चलने सबसे अधिक है।
लेकिन आने वाले 29 नवंबर को वल्र्ड गिविंग डे मनाया जाने वाला है, हर बरस की तरह। और इस दिन लोगों को सचमुच अपने भीतर झांककर देखना चाहिए कि उनकी कितना देने की ताकत है, दूसरों के लिए कितना करने की ताकत है, और वे अब तक क्या करते आए हैं? मिसाल के लिए अमरीका तक जाने की जरूरत नहीं है, भारत की सरहद से लगकर बसा हुआ म्यांमार एक मिसाल है। हम अभी पूरी लिस्ट नहीं देख पाए हैं, लेकिन भारत की दूसरी सरहद पर बसा हुआ श्रीलंका एक दूसरी बात के लिए मिसाल है कि वहां लोग इतना नेत्रदान करते हैं कि वहां से आंखें दूसरे देशों के नेत्रहीन लोगों के लिए भी भेजी जाती हैं।
हिन्दुस्तानी सोच और संस्कृति में कहने के लिए तो कह दिया जाता है कि तेरा तुझको अर्पण। लेकिन जब ऐसा करने की नौबत आती है तो लोग मेरा मुझको अर्पण पर ही अमल करते दिखते हैं। मुकेश अंबानी जैसे लोग अपने लिए दुनिया का सबसे ऊंचा रिहायशी मकान बनाते हैं, और उनके हिसाब से वह स्वर्ग से चार हाथ नीचे ही होगा। दूसरी तरफ नारायण मूर्ति और अजीम प्रेमजी जैसे लोग हैं जो कि सादगी और किफायत में जीकर अपना कमाया हुआ सब कुछ समाज को देने पर आमादा और उतारू हैं, और भारत संस्कृति को महान बनाने का काम कर रहे हैं।

एनडीटीवी पर कार्रवाई से सरकार का बड़ा नुकसान

संपादकीय
7 नवम्बर 2016  
देश के एक प्रमुख समाचार चैनल एनडीटीवी पर केन्द्र सरकार ने एक दिन की रोक लगाई है कि इस चैनल ने कश्मीर में सुरक्षा बलों की कार्रवाई के प्रसारण में संवेदनशील सूचनाएं दिखाई थीं। इसके बाद से देश भर के मीडिया के संगठन, और विपक्षी दलों के नेता लगातार सरकार की इस बात के लिए गंभीर आलोचना कर रहे हैं। इस चैनल का कहना है कि उसने कोई भी ऐसी जानकारी नहीं दिखाई जो कि बाकी सारे मीडिया पर नहीं चल रही थी। यह अपने किस्म का पहला मौका है जब देश के एक प्रमुख समाचार चैनल को चौबीस घंटे बंद रखने के लिए कहा गया है, और यह आज के माहौल में अधिक महत्वपूर्ण इसलिए भी हो जाता है कि एनडीटीवी अपनी रीति-नीति की वजह से लगातार केन्द्र सरकार की आलोचना करते आ रहा था, और आज जिस तरह मीडिया दो खेमों में बंटा हुआ सा दिखता है, उसमें एनडीटीवी मोदी सरकार, भाजपा, और संघ परिवार के एजेंडा के आलोचक के रूप में एक बड़ी प्रमुख आवाज के रूप में स्थापित है। इसके साथ-साथ एनडीटीवी देश के सबसे विश्वसनीय समाचार चैनल के रूप में भी जाना जाता है, और इस विश्वसनीयता की वजह से वह देश के स्वघोषित राष्ट्रवादी, और साम्प्रदायिक ताकतों की आंखों की किरकिरी भी बना हुआ है।
अब यहां पर दो सवाल उठते हैं। हम केन्द्र सरकार के इस अधिकार को चुनौती नहीं देते कि अगर कोई समाचार चैनल या अखबार राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नुकसान पहुंचाने वाले किसी कवरेज का कुसूरवार ठहराया जाता है तो उस पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। जब किसी कार्रवाई का कानून बना है तो वह कानून या तो जायज होगा, या उस कानून को ही चुनौती दी जानी चाहिए। लेकिन जब उस कानून के तहत कोई कार्रवाई की जा रही है, तो हम उसे अपने आपमें इमरजेंसी की सेंसरशिप जैसा कहना नहीं चाहते। एनडीटीवी के पास अदालत में जाकर सरकार के इस आदेश को खारिज करवाने की अपील का हक है, और यह चैनल सुप्रीम कोर्ट चले भी गया है। दूसरी तरफ मुम्बई पर आतंकी हमले के वक्त से लगातार यह बात भी चली आ रही थी कि समाचार चैनल अपने जीवंत प्रसारणों में कई बार ऐसी बातें दिखाते हैं जो कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई को ही खतरे में डाल देती है। हम इसमें से कोई बात इस चैनल को लेकर नहीं कर रहे हैं, लेकिन फिर भी अगर बहस के लिए मान भी लिया जाए कि एनडीटीवी ने ऐसी खतरनाक और सवंदेनशील बातों या तस्वीरों को प्रसारित किया था, तो भी उस पर यह कार्रवाई एक समझदार सरकार को नहीं करनी चाहिए थी।
भारत में टीवी की दर्शक संख्या को जानने वाले लोग यह भी जानते हैं कि एनडीटीवी शुरू के दर्जन भर चैनलों जितनी कमाई नहीं करता है, और उसे देखने वाले भी कम हैं। लेकिन पिछले चार दिनों से देश के मीडिया पर केवल एनडीटीवी का नाम चल रहा है, और हमारा ख्याल है कि एक दिन प्रसारण बंद रहने से इसे जो नुकसान होगा उससे सौ गुना या हजार गुना अधिक फायदा इन चार दिनों में हो चुका है। दूसरी बात यह कि केन्द्र सरकार को पिछले चार दिनों में लगातार यह तोहमत झेलनी पड़ रही है कि वह मीडिया का गला घोंटने की कोशिश कर रही है। कोई सरकार अगर ऐसा करने की नीयत रखती भी है, तो भी हमारा ख्याल है कि वह ऐसी तोहमत से बचती है। और एक ही दिन पहले तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सार्वजनिक मंच से माईक पर देश को यह याद दिलाया था कि अब इमरजेंसी जैसी कोई सरकार कभी नहीं आनी चाहिए। और इसके अगले ही दिन केन्द्र सरकार का लगाया गया यह प्रतिबंध एनडीटीवी को हीरो बना गया है। राजनीतिक रूप से भी हमारा ख्याल है कि मोदी सरकार को इससे बड़ा नुकसान हुआ है, और एनडीटीवी को अभूतपूर्व हमदर्दी भी मिली है, और यह चैनल सुर्खियों में आ गया है, और बना रहेगा। इसने देश के मीडिया के लगभग पूरे तबके को एक होने का मौका दिया है, और हर प्रदेश या बड़े शहरों में पत्रकारों के संगठन बैठक करके एनडीटीवी के साथ खड़े हो रहे हैं, और मोदी सरकार की आलोचना कर रहे हैं। हमारा ख्याल है कि केन्द्र सरकार ऐसी किसी गलती, अगर हुई भी है तो, पर किसी चैनल या अखबार को एक चेतावनी दे सकती थी, और वही कार्रवाई राजनीतिक समझदारी की भी होती। एनडीटीवी बाकी बहुत से चैनलों के मुकाबले बहुत ही पेशेवर और जिम्मेदार चैनल है, और उस पर की गई कार्रवाई को जनता भी अच्छी नजर से नहीं देखेगी। यह एक टालने लायक गलती है, या गलत काम है, और किसी भी सरकार को इससे बचना चाहिए। फिलहाल एनडीटीवी को इससे बड़ा फायदा हो रहा है, और मीडिया के बीच एक जिंदा बहस भी छिड़ी है।