भोपाल की फरारी और फिर मुठभेड़-मौतों से उठे सवाल

संपादकीय
1 नवम्बर 2016  
भोपाल की एक अतिसुरक्षित जेल से फरार हुए सिमी से जुड़े हुए आठ विचाराधीन कैदी कुछ घंटों के भीतर ही एक साथ मार गिराए गए। वे जेल के एक सिपाही की हत्या करके फरार हुए बताए जा रहे हैं, और जिस मुठभेड़ में उन्हें मार गिराया गया है, उसके कुछ वीडियो सामने आए हैं जिन्हें लेकर कांग्रेस, वामपंथी दल, और कुछ दूसरी पार्टियों ने भी जांच की मांग की है। इन वीडियो से ऐसा आभास होता है कि इनमें से कुछ लोगों को जिंदा पकडऩा शायद मुमकिन हो सकता था, लेकिन सुरक्षा बलों ने उन्हें करीब से गोली मारकर खत्म कर दिया। इसके साथ ही फरार होने की इस साजिश पर अब कोई गवाह नहीं बचा है, जो कि सुरक्षा व्यवस्था की जांच के लिए एक नुकसान की बात है।
आज देश में जिस तरह का धार्मिक और राजनीतिक धुव्रीकरण का माहौल बना हुआ है, उसमें इस इस्लामिक छात्र संगठन, सिमी, के विचाराधीन कैदियों को बात की बात में आतंकी करार देना शुरू हो गया, और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने मीडिया-बयानों में बार-बार इन्हें आतंकी कहा। किसी विचाराधीन कैदी को मुजरिम करार दे देना सिर्फ अदालत का काम होता है, और जब प्रदेश का मुख्यमंत्री यह काम करने लगता है, तो वह जांच एजेंसी, सरकारी वकील, और न्याय प्रक्रिया, इन सब पर असर डालने वाली बात होती है। लेकिन न सिर्फ मप्र के भाजपा मुख्यमंत्री, बल्कि देश के अधिकतर मीडिया ने भी इन विचाराधीन कैदियों पर फैसला सुनाते हुए इन्हें आतंकी लिखना और कहना जारी रखा है। यह सिलसिला लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है जिसके तहत जब तक कोई मुजरिम साबित न हो जाए तब तक उसे मासूम मानने को कहा जाता है। आज देश में धार्मिक धुव्रीकरण का जो माहौल है, उसके चलते भोपाल जेल के इस मारे गए सिपाही को राष्ट्रभक्त करार दिया जा रहा है, और फरार होकर मारे गए विचाराधीन कैदियों को आतंकी से लेकर देशद्रोही तक करार दिया जा रहा है।
अब देश के बहुत से संगठनों और राजनीतिक दलों को यह शक है कि यह फरारी और उसके बाद इस तरह की मौत स्वाभाविक साजिश का नतीजा नहीं है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इनके मामलों की सुनवाई हो चुकी थी, और इनके रिहा होने के आसार दिख रहे थे, इसलिए इन्हें इस तरह फरार करवाकर मार डाला गया। कई लोगों को इस बात पर हैरानी है कि भोपाल की अतिसुरक्षित जेल के अलग-अलग दरवाजों के पीछे बंद ये कैदी किस तरह एक साथ सब दरवाजों को तोड़कर बाहर आ सके, और किस तरह आसानी से ऊंची दीवार चादर से पार कर सके। हम अभी किसी किस्म की साजिश को लेकर अटकलबाजी में पड़ना नहीं चाहते क्योंकि यह एक बड़ी जांच के लायक मामला है। लेकिन लोकतंत्र में मुख्यमंत्री से लेकर मीडिया तक से हमारी यह उम्मीद बनी रहेगी कि वे किसी विचाराधीन कैदी को मुजरिम करार देने की सोची-समझी लापरवाही बंद करें। इस हिसाब से तो मीडिया के जो लोग ब्लैकमेलिंग के जुर्म में गिरफ्तार होकर जेल काटकर जमानत पर बाहर हैं, उनके नाम के साथ ब्लैकमेलर कहा जा सकता है, और फिर प्रधानमंत्री ऐसे लोगों को दूसरे देश के प्रमुखों से किस तरह मिलवाएंगे? दूसरी तरफ मुख्यमंत्री जैसे ताकतवर ओहदे पर बैठे हुए शिवराज सिंह चौहान को यह ध्यान रखना चाहिए कि मुकदमे के चलते हुए वे किसी को मुजरिम नहीं कह सकते। यह एक अलग बात है कि इस देश में कमजोर तबके के लिए किसी भी तरह की बातें कहना आम और जायज मान लिया जाता है, और लोग बेधड़क किसी आरोपी को मुजरिम कहने लगते हैं। लेकिन अगर कोई अदालती कटघरे में घसीटे, तो मीडिया हो या मुख्यमंत्री उन्हें अपने ऐसे बयानों के लिए सजा भी हो सकती है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री को तो यह भी सोचना चाहिए था कि ऐसी सुरक्षित राजधानी की जेल से थोक में हुई ऐसी फरारी जेल की बड़ी लापरवाही थी, और इस पर शर्मिंदगी के बजाय अगर वे आरोपियों को मुजरिम कह रहे हैं, तो उनके बेकसूर रिहा होने  की एक संभावना या आशंका के सही साबित होने के बाद वे अपने शब्दों का क्या करेंगे?

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