ट्रंप के साथ यह दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध के सबसे करीब हो गई...

संपादकीय
10 नवम्बर 2016  
कल इसी जगह पर लिखने के लिए दो मुद्दों के बीच बड़ी कड़ी टक्कर थी। एक तो अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत की खबर थी, और दूसरी खबर हिन्दुस्तान में हजार-पांच सौ के नोट बदलने की। चूंकि हिन्दुस्तानियों की जिंदगी को नोट अधिक प्रभावित कर रहे थे, इसलिए कल उस पर लिखा गया, और दुनिया के सबसे ताकतवर दफ्तर के लिए दुनिया के एक सबसे बेदिमाग, सनकी, घटिया, हिंसक, और तानाशाह ट्रंप के चुने जाने पर लिखने की बारी आज आई है।
एक चुनाव में कांटे की टक्कर पर चल रहे दो उम्मीदवारों में से किसी का भी जीतना बहुत हैरान करने वाला नहीं होना चाहिए, लेकिन फिर भी दुनिया के अमन-पसंद और समझदार लोगों को यह भरोसा था कि अमरीका का बहुमत इतनी बड़ी चूक नहीं करेगा कि एक बहुत ही घटिया इंसान को राष्ट्रपति बना देगा। लेकिन ऐसा लगता है कि पढ़ाई-लिखाई से समझदारी का अनिवार्य रूप से कोई रिश्ता नहीं होता है, क्योंकि अमरीका में पढ़े हुए तो सभी हैं, लेकिन समझदार लोग या तो वोट डालने गए नहीं, या उनके बहुमत ने ट्रंप को वोट दिया। वहां पर वोटों की गिनती का तरीका कुछ अलग है, इसलिए वहां का बहुमत भी कुछ अलग तरीके से तय होता है। फिलहाल यह बात साफ हो चुकी है कि अगले चार बरस डोनाल्ड ट्रंप अमरीका को हांकेंगे। पिछले आठ बरस से डेमोक्रेटिक पार्टी के बराक ओबामा राष्ट्रपति थे, और इस बार भी इस पार्टी की तरफ से अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव की पहली महिला उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन का विकल्प मतदाताओं के सामने था, लेकिन घोर साम्प्रदायिक, नस्लविरोधी, अल्पसंख्यक विरोधी, दकियानूसी सोच को पूरी हिंसा और दमखम के साथ बार-बार दुहराने वाले, राजनीति से परे के कारोबारी डोनाल्ड ट्रंप को मतदाताओं ने पसंद किया। यह पहला मौका था कि जब रिपब्लिकन पार्टी के बड़े-बड़े नेता, उसके तमाम जिंदा भूतपूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ थे, और ट्रंप जितनी गालियां मुस्लिमों को, प्रवासियों को दे रहे थे, उतनी ही गालियां उन्होंने अपनी ही पार्टी के बड़े-बड़े दिग्गजों को दीं, और फिर भी चुनकर आए।
ऐसा लगता है कि अमरीका में लोकतंत्र का एक नया तौर-तरीका इन दिनों लोगों के बीच जगह बना रहा है। लोगों को हिंसा से परहेज नहीं रहा, गंदी जुबान से परहेज नहीं रहा, दूसरी महिलाओं पर यौन हमले करने के ट्रंप के दावों से परहेज नहीं रहा, और मुस्लिमों को अमरीका से बाहर कर देने जैसी साम्प्रदायिक बातों से भी जनता को परहेज नहीं रहा। अमरीकी जनता की यह दिमागी हालत बहुत ही हैरान और हक्का-बक्का करने वाली है। लेकिन दुनिया में नफरतजीवी नेताओं के जीतने के मामले कहीं-कहीं सामने आते रहते हैं, औैर हिन्दुस्तान भी समय-समय पर इस तरह के सदमे पाते रहता है। फिलहाल डोनाल्ड ट्रंप की शक्ल में दुनिया का सबसे बड़ा खतरा सामने आया है, और हमारी यह आशंका है कि आज दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के खतरे के सबसे करीब है, और अगले चार बरस ऐसे ही धड़कन थामकर इस खतरनाक आदमी का कार्यकाल खत्म होने का रास्ता देखना पड़ेगा। अमरीकी जनता के बहुमत ने, और उस बहुमत से भी शायद दुगुनी घर बैठी जनता की चुप्पी ने वहां के लोकतंत्र की साख चौपट कर दी है। अमरीकी लोकतंत्र के दुनिया भर में बरसाए जाने वाले दावे अब खोखले हो गए हैं, क्योंकि जो देश इतने भयानक अलोकतांत्रिक को चुनता है, वह बाकी दुनिया को लोकतंत्र की भला क्या नसीहत दे सकता है? हमारा ख्याल है कि जिस तरह एक वक्त जर्मन मतदाताओं को यह शर्म आई थी कि उन्होंने हिटलर को चुना था, अमरीकी मतदाता भी शायद चार बरस बाद की वैसी ही शर्मिंदगी की ओर बढ़े हैं। आज अमरीका को और बाकी दुनिया को शुभकामनाओं को बहुत जरूरत है, और पूरी दुनिया के सबसे बड़े गुंडे से बचने के लिए हम अमरीका और बाकी दुनिया को अपनी शुभकामना देते हैं।

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