नोटों की यह बदली, नीयत की बदली नहीं दिखती है..

संपादकीय
11 नवम्बर 2016  
नोटों को बदलने का मोदी सरकार का फैसला अब धीरे-धीरे लोगों की अधिक आलोचना का शिकार हो रहा है। आम जनता को बहुत ही दिक्कतें हो रही हैं, और  किसी भी शहर-कस्बे की कोई ऐसी सड़क नहीं है जहां बैंकों के सामने, डाकघर या एटीएम के सामने लंबी-लंबी कतारें न लगी हों। और ये वे तमाम लोग हैं जिन्हें कुल चार हजार रूपए निकालने की या बदलने की छूट है। लोगों को लग रहा है कि करोड़ों लोगों को अपनी रोज की मजदूरी छोड़कर, अपना कामकाज छोड़कर अगर कुछ हजार रूपए बदलने के लिए पूरा-पूरा दिन खराब करना पड़ रहा है, तो केन्द्र सरकार को इसका कोई दूसरा रास्ता सोचना चाहिए था। दूसरी तरफ अर्थशास्त्रियों और जानकार लोगों की यह बात भी सामने आ रही है कि देश में कालाधन शायद कुल तीन फीसदी ही नोटों की शक्ल में है, बाकी कालाधन दूसरी चीजों में लगा हुआ है। ऐसे में आम जनता को बड़ी दिक्कत देकर अगर इस तीन फीसदी कालेधन का एक बड़ा छोटा सा हिस्सा ही हासिल किया जा सकेगा, तो यह पूरी मशक्कत ही फिजूल की साबित होगी।
आज बाजार की चर्चा यह है कि लोग अपने कालेधन के पुराने नोटों को नए नोटों में बदलने के रास्ते निकाल रहे हैं, और वे रास्ते निकल भी जा रहे हैं। एक आशंका यह है कि देश में जो दसियों करोड़ जन-धन खाते खुले हैं, उन खातों में लोग दलालों और एजेंटों के मार्फत अपना कालाधन जमा करके निकाल लेंगे, और छोटी-छोटी रकम से भी उनका बड़ा-बड़ा काम हो जाएगा। इसके अलावा देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो आयकर नहीं देता है, और उनमें से हर किसी के खाते में लाख-दो लाख रूपए डालकर लोग नई नगदी निकाल सकते हैं, और बाजार का एक अंदाज यह है कि इसमें पांच-दस फीसदी से अधिक खर्च नहीं आएगा। अगर ऐसा होता है तो नए नोटों को छापने पर किया गया पन्द्रह-बीस हजार करोड़ रूपए का खर्च, और उससे कई गुना अधिक बैंकों का खर्च, और उससे भी कई गुना अधिक आम जनता के वक्त का खर्च मिलकर इस पूरी कसरत को पानी में बहाते दिख रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे कार्टून तैर रहे हैं जिनमें देश के सबसे बड़े कारोबारी प्रधानमंत्री के साथ खड़े जोरों से हॅंस रहे हैं कि मूर्ख जनता यह सोचती है कि बड़े लोग अपना कालाधन नोटों की शक्ल में रखते हैं।
सोशल मीडिया पर ही एक दूसरी अफवाह भी जोरों से तैर रही है, और हो सकता है कि उसके चलते सरकार की एक संभावित संभावना खत्म हो जाए। लोग यह फैला रहे हैं कि सरकार सारे बैंक लॉकर भी सील करने वाली है। अब यह बात पिछले दो दिनों में इतनी फैल चुकी है, और लोग अपने लॉकर खोल-खोलकर नगद पैसे निकाल भी चुके हैं, गहने भी शादी के मौसम की वजह से निकाल चुके हैं, कि अब लॉकरों से बहुत कुछ हासिल करना शायद आसान नहीं होगा। लेकिन अगर केन्द्र सरकार नोटबंदी के साथ-साथ एक पखवाड़े के लिए लॉकरबंदी भी कर देती, और उसके बाद वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ ही एक-एक लॉकर खोलने की छूट देती, तो हो सकता है कि नोटों के मुकाबले अधिक कालाधन बरामद होता। फिलहाल तसल्ली की एक बात यह है कि हजार-पांच सौ के नोटों में जो नकली नोट चल रहे थे, वे देश की अर्थव्यवस्था से बाहर हो जाएंगे, और नकली नोट छापने वाली प्रेसों में जो ताजा स्टॉक रवाना होने वाला होगा, वह बेकार हो जाएगा। लेकिन इसके दूसरे पहलू को अगर देखें, तो ऐसे सारे नकली नोट आज बेकसूर लोगों के हाथों में अनजाने में पहुंचे हुए हैं, और जब बैंक उन्हें लेने से मना कर देगा, तो ये नुकसान ऐसे आम लोगों का होगा। यह नुकसान देश की अर्थव्यवस्था का न होकर, निजी लोगों का होगा और इसकी वजह से नकली नोटों के खत्म होने का फायदा भी खत्म होते दिखता है।
सरकार जब भी कोई इतनी व्यापक कार्रवाई करेगी, उससे कई लोगों को तकलीफ होना बहुत स्वाभाविक है। लेकिन फिलहाल नोटबंदी से कोई बड़ा फायदा दिख नहीं रहा है, और आम और गरीब लोगों को रोजाना नुकसान होते जरूर दिख रहा है। एक खतरा यह भी है कि गरीब और मध्यम वर्ग के पास अगर कहीं दबे हुए कुछ नोट रह जाएंगे, तो बाद में उनके मिलने पर उसकी कोई भरपाई नहीं हो सकेगी। एक आखिरी बात यह कि पहले दिन भी हमने लिखा था कि अगर बड़े दाम वाले नोटों की वजह से कालाधन बढ़ता है, तो अभी दो हजार रूपए के नए नोट जारी करने का क्या तुक है? एक तरफ तो सरकार ने नगद भुगतान की सीमा घटा दी है, दूसरी तरफ अधिक दाम के नोट जारी कर रही है, ये दोनों बातें एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं।
अगर सरकार कालेधन पर सचमुच कोई कार्रवाई करना चाहती है, तो उसे सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ तगड़ा वार करना पड़ेगा, भ्रष्ट लोगों को उम्रकैद देने जैसे कड़े कानून बनाने पड़ेंगे, सरकारी भ्रष्टाचार में पकड़ाए गए लोगों के खिलाफ तेजी से जांच और उतनी ही तेजी से मुकदमे की इजाजत देनी पड़ेगी, जो कि आज जरा भी दिखाई नहीं पड़ती है। ऐसा किए बिना नोटों की यह बदली, नीयत की बदली नहीं दिखती है।

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