अफवाहों के लिए नाजुक इस देश में वैज्ञानिक सोच जरूरी

संपादकीय
12 नवम्बर 2016  
उत्तरप्रदेश में कल ऐसी अफवाह फैली कि नमक ढाई सौ रूपए किलो हो रहा है, और बात की बात में लोग मनमाने दामों पर नमक बेचने लगे, और खरीदने लगे। किसी जगह तो किसी दुकान के लूट लेने की भी खबर है। और यह नोटों को लेकर देश में चल रही दहशत के बीच की अफवाह का असर है। दरअसल हुआ यह है कि जिस तरह ये नोट बंद हुए हैं, उन्हें लेकर जनता के मन में तरह-तरह की आशंकाएं पैदा हो गई हैं, और लोग कहीं सोने की तरफ बढ़ रहे हैं, तो किसी तरह से अपने नोट बदलकर फिर नोटों से परे किसी और जगह अपनी जमा पूंजी लगाने की सोच रहे हैं। यह फैसला देश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा रहा, और जनता के लिए हिला देने वाला रहा, खासकर आम जनता के लिए। इसलिए ऐसे माहौल में किसी भी तरह की अफवाह तेजी से विश्वसनीयता पा लेती है।
लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले इस देश में गणेश प्रतिमाओं के दूध पीने की अफवाह फैली थी, और लोग अपने सरकारी दफ्तर या कारोबार को छोड़कर लोटे-गिलास में दूध लेकर मंदिरों और लोगों के घरों की प्रतिमाओं तक पहुंच रहे थे। कई बार ऐसा लगता है कि भारत जैसे लोकतंत्र में अंधविश्वास की जो पकड़ है, जितनी साम्प्रदायिकता है, या जितनी अंधभक्ति है, उसमें कोई भी अफवाह फैलाना बड़ा आसान काम है, और नमक के रेट बढऩे की अफवाह तो फिर भी ठीक है, अगर किसी साम्प्रदायिकता की, किसी राष्ट्रवादी हिंसा की अफवाह फैलाई जाएगी, तो क्या होगा? हमारे पाठकों को याद होगा कि हम बीच-बीच में देश में वैज्ञानिक सोच, और तर्कसंगत बातों के महत्व पर लिखते हैं। ऐसा जरूरी इसलिए है कि धर्म से लेकर आध्यात्म तक, और राजनीति से लेकर किसी जाति के संगठन तक, जहां-जहां लोगों का विश्वास लोकतंत्र और तर्क से परे किसी पर भी होता है, तो वह कभी भी आपा खोकर हिंसक हो सकता है, और ऐसा हमने जगह-जगह गुरुओं के मामले में देखा हुआ भी है। बरसों से बलात्कार के मामले में जेल में बंद आसाराम को आज भी जब पेशी पर लाया जाता है, तो उसके भक्तगण अदालत के बाहर भीड़ लगा लेते हैं। छत्तीसगढ़ में जगह-जगह सरकारी स्कूलों में कहीं आसाराम की किताबें खपाने की कोशिश करते हैं, तो कहीं उसके पोस्टर लगाकर जुलूस निकालते हैं। अगर लोगों के बीच लोकतंत्र के प्रति आस्था होती, तो ऐसा नहीं होता।
नमक की अफवाह आज देश की अर्थव्यवस्था पर लोगों के हिल गए भरोसे का एक संकेत और सुबूत है। केन्द्र सरकार को इस भरोसे को दुबारा कायम करने के लिए खासी मेहनत करनी पड़ेगी। आज तो जगह-जगह लोग सदमे में मर रहे हैं, या आत्महत्या कर रहे हैं। और इनसे परे भी अनगिनत ऐसे लोग हैं जो अपनी रोज की मजदूरी-कमाई को छोड़कर बैंकों के सामने खड़े हैं। ऐसी दिमागी हालत में जब लोगों के नोट बदल भी जाएंगे, तो एक बहुत बड़ा खतरा देश में यह रहेगा कि बैंकों और नोटों पर से लोगों का भरोसा घटा हुआ रहेगा, और वे पूंजी निवेश या बचत के कई ऐसे रास्ते ढूंढने लगेंगे जिसमें उनकी जमा रकम के डूबने का खतरा और अधिक रहेगा। यह सिलसिला थामने के लिए केवल बाजार में विश्वास लौटना जरूरी नहीं है, सभी तरह की वैज्ञानिक सोच को जनता में लाना जरूरी है, और यह बात महज जुमलों से हो नहीं पाएगी।

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