सरहद से परे आज देशभक्ति दिखाने का एक बड़ा मौका

विशेष संपादकीय
13 नवम्बर 2016  
पिछले एक-दो बरस से भारत में देशभक्ति और राष्ट्रवाद की बातें प्रचलन में बहुत अधिक हैं। बात-बात में लोग एक-दूसरे की देशभक्ति और गद्दारी तय करने लगे हैं, यहां तक कि जिन्हें सूर्य नमस्कार पसंद नहीं, वे भी पाकिस्तान जाने के फतवे पाने लगे हैं। ऐसे तमाम फतवेबाज सरहद पर पाकिस्तान से दो-दो हाथ कर लेने की ललकार-फुफकार के बिना दिन पूरा नहीं करते। ऐसे तमाम लोग जो कागजों पर लिखकर या सोशल मीडिया में पोस्ट करते हर कुछ घंटों में अपने-आपको शहीद का दर्जा देते हैं, उनके लिए महानता का एक मौका अनायास आ गया है।
आज देश भर में सबसे गरीब, सबसे बेसहारा, सबसे लाचार लोग बैंकों के सामने कतारों में रातें गुजार रहे हैं, दम तोड़ रहे हैं, खुदकुशी कर रहे हैं, अपने बीमार बच्चे के इलाज के लिए अस्पतालों के सामने बिलख रहे हैं, अपने मरे हुओं की लाशें अस्पताल से वापिस पाने के लिए जूझ रहे हैं, इसलिए कि केन्द्र सरकार ने बिना तैयारी पुराने नोट बंद कर दिए। अभी टीवी के परदे पर एक औरत रोते दिख रही थी जो आठ महीने के बच्चे को लिए आठ घंटे से बैंक के सामने खड़ी थी। पूरा देश ऐसे नजारों से भरा पड़ा है और ये भी वे हैं जहां तक मीडिया के कैमरे पहुंच रहे हैं। एक खबर यह भी है कि देश के सैंतालीस फीसदी लोगों के बैंक खाते हैं ही नहीं। अनगिनत खबरें हैं कि केन्द्र सरकार की रोजगार योजनाओं की मजदूरी लोगों को महीनों से नहीं मिली है। जाहिर है कि सबसे कमजोर आज सबसे मुसीबत में है।
ऐसे में कांग्रेस के राहुल गांधी ने अपनी पार्टी के लोगों से कहा है कि वे बैंकों और एटीएम की कतारों में लगे बुजुर्गों, कमजोर लोगों की मदद करें। ऐसे में वे तमाम लोग जो पाकिस्तानियों के सिर काटकर लाना चाहते हैं, जिनकी रग-रग में देशभक्ति फड़क रही है उनके सामने देशभक्ति साबित करने का एक अनोखा मौका आया है। फिलहाल वे पाकिस्तानी सरहद छोड़कर पास के बैंक या एटीएम जाकर किसी की मदद कर सकते हैं। उनकी जगह कतार में खड़े हो सकते हैं, पानी पिला सकते हैं, लोगों को बिस्किट जैसा कुछ खिला सकते हैं, उनका मोबाइल दस-बीस रूपये से चार्ज करवा सकते हैं। कुछ लोग अस्पताल जाकर दवा-फीस के भुगतान में मदद कर सकते हैं, कुछ लोग ऐसे गरीबों की मदद कर सकते हैं जो बिना बैंक खातों वाले हैं, फुटपाथी बच्चे या भिखारी, या कुछ रोगी-लावारिस, विक्षिप्त लोग, वे कहां जाएंगे?
जिन लोगों को नवरात्रि या दूसरे मौकों पर भंडारे चलाना अच्छा लगता है, तीर्थयात्रियों को पानी पिलाना अच्छा लगता है, उनके लिए भी एक मौका है सच्ची सेवा का, सच्चे तीर्थ का। जिन लोगों के रोज मंदिर-मस्जिद, गुरूद्वारा जाना अच्छा लगता है या हर इतवार चर्च जाना उनके लिए भी एक मौका है कि वे बैंक, एटीएम जाकर ईश्वर को खुश कर सकें। जो लोग उपदेशकों की बातें सुनने में पूरे-पूरे दिन गुजार देते हैं, उनको भी चाहिए कि सुने हुए प्रवचन, उपदेश पर अमल करने के लिए वक्त गुजारें, कतारों में लगे लोगों की मदद करके।
आज मोदी सरकार की तारीफ करने या उसे कोसने से परे यह जरूरी है कि इंसान, इंसान की मदद करें। जो लोग आज अपने शहर-गांव के लोगों की मदद नहीं कर सकते वे पाकिस्तानियों से क्या खाकर लडऩे जाएंगे? आज देखना है कि देश की कितनी पार्टियां, कितने धार्मिक, आध्यात्मिक या सांस्कृतिक संगठन अपने लोगों को जनता की मदद में झोंकते हैं। 

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