गृहमंत्री के सहायक पर कानून लागू नहीं होता?

संपादकीय
14 नवम्बर 2016  
छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री रामसेवक पैकरा के बहुत ताकतवर निजी सहायक को अफसरों के एक वॉट्सऐप ग्रुप पर बहुत से अश्लील वीडियो पोस्ट करते पाया गया, और उन्हें चेतावनी देकर उस ग्रुप से हटाया गया है। शुरू में ही इस पर प्रक्रिया मांगने पर किसी अखबार से उन्होंने इसे अपनी चूक कहा, और फिर बाद में अपने टैब के चोरी हो जाने की रिपोर्ट लिखाने की बात कही। यह समझना सहज है कि जुर्म हो जाने के बाद जुर्म के सुबूत चोरी हो जाने की रिपोर्ट लिखा देना पुलिस का पुराना मिजाज रहता है, और गृहमंत्री के निजी सहायक का पूरा वास्ता ही रात-दिन पुलिस से पड़ता है, इसलिए यह आसान रास्ता चुनना स्वाभाविक ही था।
अब सवाल यह है कि एक फेसबुक पोस्ट, या एक वॉट्सऐप संदेश को देकर अगर प्रदेश में अब तक दर्जनों या सैकड़ों गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, या जुर्म कायम हो चुके हैं, तो फिर सुबूतों वाला यह मामला उससे अलग कैसे है? और अगर गृहमंत्री का निजी सहायक ही ऐसी अश्लीलता फैलाकर देश के बहुत ही कड़े आईटी कानून को तोड़ रहा है और उसके खिलाफ कोई रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हो रही है, तो ऐसे प्रदेश की पुलिस पर जनता का क्या भरोसा रहेगा? लोगों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले एक दूसरे मंत्री के बेटे ने त्यौहार के मौके पर हो रहे सार्वजनिक अश्लील या वयस्क डांस के बीच पहुंचकर अपने अंगरक्षक से गोलियां चलवाईं थीं, और वह मामला भी रफा-दफा हो गया। इसके अलावा भी छत्तीसगढ़ में बहुत से ऐसे मामले हुए हैं जिनमें आम और खास के लिए अलग-अलग कानून सामने आया है। सत्ता से जुड़े हुए नेताओं, या बड़े अफसरों के खिलाफ न आईटी कानून लगता, और न ही ट्रैफिक के नियम लगते। दूसरी तरफ आम जनता के बीच के नासमझ लोग भी अगर चूक से कुछ कर बैठते हैं, तो वे मामला-मुकदमा झेलते हैं, या लंबा जुर्माना पटाते हैं। एक हेलमेट न लगाने पर एक मध्यमवर्गीय को भी पांच सौ रूपए का जुर्माना पटाना पड़ता है, दूसरी तरफ सत्ता से जुड़े हुए लोग अपनी गाडिय़ों पर नाजायज तरीके से लालबत्ती और सायरन लगाकर दहशत फैलाते हुए घूमते हैं, और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। हेलमेट न लगाने वाला महज अपनी जिंदगी को खतरे में डालता है, न कि दूसरों को परेशान करता है। लेकिन ताकतवर तबका गाडिय़ों से आतंक फैलाता है, नंबर प्लेट लगाए बिना घूमता है, और पकड़े जाने पर पुलिस को पीटकर भी चले जाता है।
सत्ता के साथ ऐसी ही दिक्कतें कार्यकाल खत्म होने के बाद चुनाव में अपना असर दिखाती हैं। कई प्रदेशों में चुनावी नतीजों के बाद कहा जाता है कि एंटीइंकमबेंसी का असर दिखा और सत्तारूढ़ पार्टी हार गई। ऐसा इसलिए होता है कि लगातार पांच बरस की सत्ता सत्तारूढ़ पार्टी के लोगों को बददिमाग कर देती है, और उन्हें ऐसा एहसास कराने लगती है कि वे कानून से ऊपर हैं। नतीजा यह होता है कि इस मजे के चलते पांच साल आम जनता इसे देख-देखकर थकी हुई रहती है, और वह चुनाव के वक्त अपनी भड़ास निकालती है। छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ पार्टी इस बात पर गौर करे।

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