झूठ फैलाते सोशल मीडिया से खड़े हुए बड़े खतरे...

संपादकीय
15 नवम्बर 2016  
भारत में सोशल मीडिया नए किस्म का खतरा खड़ा कर रहा है, और बहुत से लोग उसे मीडिया के एक विकल्प के रूप में इस्तेमाल करके खुद भी खतरे में घिर रहे हैं, और बाकी लोगों को भी खतरे में डाल रहे हैं। सूरत के एक हीरा कारोबारी के बारे में कल से खबरें तैर रही हैं कि उसने छह हजार करोड़ रूपए के नोट बैंक में जमा कराए हैं, और उस पर वह दो सौ फीसदी जुर्माना भी देने को तैयार है। सामान्य समझबूझ के लोग भी यह हिसाब लगा सकते हैं कि कोई रकम जमा कराकर उस पर दो सौ फीसदी जुर्माना देने से बेहतर यह होगा कि उसे जलाकर हाथ ताप लिए जाएं, और एक इतिहास भी रच दिया जाए। यह झूठी खबर जंगल की आग की तरह सोशल मीडिया पर खबर बनाकर फैलाई गई, और जिस कारोबारी का नाम दिया गया वह पहले से जाना-पहचाना इसलिए भी था कि उसने नरेन्द्र मोदी का एक पहना हुआ सूट नीलामी में करोड़ों में खरीदा था। आज सुबह एक विश्वसनीय समाचार चैनल के कैमरे पर इस कारोबारी ने इस खबर को झूठा बताया और कहा कि उसने एक रूपया भी जमा नहीं करवाया है। लेकिन इसके बाद भी कई घंटे तक बड़े-बड़े अखबार अपनी वेबसाइटों पर इस खबर को पोस्ट करते रहे।
आज के वक्त में जब तक सच अपने जूते के तस्मे भी नहीं बांध पाता है, चटपटा झूठ पूरी दुनिया की सैर करके लौट आता है। एक दिक्कत यह हो गई है कि सोशल मीडिया नाम के इस नए जानवर के नाम में मीडिया शब्द जुड़ गया है और लोग इसे एक किस्म का मीडिया मान बैठे हैं। जबकि एक वक्त, टीवी आने के पहले मीडिया का मतलब प्रेस हुआ करता था, और कागज पर छपे हुए शब्द बड़ी जिम्मेदारी से छापे जाते थे, उनकी विश्वसनीयता रहती थी, और अखबार अपने छापे हुए के प्रति जवाबदेह भी रहते थे। इसके बाद रेडियो और टीवी आए, और उन पर खबरें हवा में तैरती लोगों तक पहुंचती थीं, और पल भर में हवा में घुल जाती थीं। नतीजा यह होता था कि इस मीडिया की जवाबदेही अखबार के मुकाबले कम होती गई। और अब तो सोशल मीडिया नाम के इस नए जानवर का न कोई डीएनए है, न इसके कोई फिंगर प्रिंट हैं, और न ही इसका कोई चेहरा है। नतीजा यह होता है कि इस पर सबसे गैरजिम्मेदार खबर, या सबसे चटपटा झूठ सबसे तेजी से आगे बढ़ाया जाता है, और अब तो इंटरनेट और फोन की टेक्नालॉजी लोगों को सहूलियत बढ़ाते चल रही है, और पल भर में लोग अपने फोन से झूठ को सैकड़ों लोगों तक बढ़ा सकते हैं, और जंगल की आग की तरह अफवाह एक हकीकत बनकर लोगों तक पहुंचती रहती है।
फिर यह भी है कि चटपटे झूठ का मजा लेने वाले कमअक्ल, जागरूकताविहीन लोगों को सच को परखने की नसीहत देना चाट के ठेले पर बेस्वाद खिचड़ी खाने की राय देने जैसा है। अमरीका में राष्ट्रपति का चुनाव जीतने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने भी यह कहा कि उनकी जीत में सोशल मीडिया का बड़ा हाथ रहा है। भारत में भी नरेन्द्र मोदी की पार्टी अपने सारे सांसदों और विधायकों से सोशल मीडिया पर मौजूदगी बढ़ाने और सक्रियता बढ़ाने को कहते आ रही है। खुद प्रधानमंत्री हर कुछ मिनट में कहीं न कहीं अपनी मौजूदगी दर्ज कराते चलते हैं। ऐसे वक्त में भारत में झूठ और नफरत पर आधारित तस्वीरें, लिखा हुआ, या वीडियो बड़ी रफ्तार से फैल रहे हैं, और जिम्मेदार लोग जब तक किसी एक झूठ को उजागर करते हैं, वह झूठ तो चारों तरफ फैल ही चुका रहता है, कई नए झूठ दौड़ शुरू कर चुके रहते हैं। भारत का आईटी कानून एक तरफ तो जरा-जरा सी राजनीतिक बातों पर जुर्म दर्ज करते चल रहा है, लेकिन लगातार साम्प्रदायिकता, हिंसा, और नफरत फैलाने वाले लोगों पर कोई कार्रवाई होते दिखती नहीं है। हमारा मानना है कि सोशल मीडिया एक नए किस्म की अराजकता का हथियार बन चुका है, और आगे भी बने रहेगा, लेकिन जिम्मेदार तबके को झूठ का भांडाफोड़ करने के लिए कुछ वक्त जरूर निकालना पड़ेगा, वरना दुनिया झूठ पर ही चलने लगेगी।

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