केन्द्र की अपार बेफिक्री उसी के लिए आत्मघाती हो सकती है...

संपादकीय
16 नवम्बर 2016  
संसद में कांग्रेस सहित बाकी विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने नोटों की बदली को लेकर मोदी सरकार पर तगड़ा हमला बोला है, और शिवसेना से लेकर ममता बैनर्जी तक राष्ट्रपति से जाकर शिकायत करने में एक साथ रहे। पिछले हफ्ते भर में हजार-पांच सौ के नोट बंद होने से देश का माहौल लगातार इतना खराब और इतना तनावपूर्ण हो गया है कि इस फैसले की उपयोगिता, उसके फायदे से कहीं अधिक उसका नुकसान देखने में आ रहा है। बैंकों में कितने नोट जमा हुए, और बाकी बचे हुए नोटों को कालाधन मान लेने के आंकड़े तो गिना जाएंगे, लेकिन इस दौरान आम लोगों की रोजी-रोटी जिस बुरी तरह छिन गई है, लोग जिस तरह कतार में लगे-लगे मर गए हैं, जिस तरह आत्महत्या कर रहे हैं, जिस तरह शादियां टल गई हैं, इलाज थम गया है, और लाशों को अस्पताल से छुड़ाना मुश्किल हो रहा है, उसे आंकड़ों में गिनना मुमकिन नहीं रहेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस नोट बदली को देशभक्ति से जोड़ लिया है, और लोगों से उनके पचास दिन मांगे हैं। इस देश में कालेधन वाले लोग एक फीसदी से भी कम हैं, लेकिन बचे निन्यानबे फीसदी लोगों में से अधिकतर ऐसे हैं जो पचास दिन की दिक्कत तो दूर, पांच दिन की दिक्कत भी झेलने की ताकत नहीं रखते। ऐसे लोगों को नोट बदलने के लिए, और बैंकों से मिले बड़े-बड़े नोटों से जिंदगी चलाने के लिए आज जिस तकलीफ से गुजरना पड़ रहा है, वह राष्ट्रीय उत्पादकता के आंकड़ों में अगर गिनी जा सकती, तो वह कालेधन के घटने के फायदों से कहीं अधिक होतीं। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी और इस फैसले में उनके सहयोगियों को जमीनी हकीकत का अंदाज नहीं है कि देश की अधिकतर जनता किस तरह दाने-दाने के लिए संघर्ष करती है, और ऐसे में कमाने के उसके कई-कई दिन अगर खत्म कर दिए जा रहे हैं, तो वह गरीब का बहुत बड़ा नुकसान है। और ये दिन महज बैंकों के सामने कतार में बर्बाद हो रहे दिन नहीं हैं, आज पूरे देश के बाजार-कारोबार को जो लकवा मार गया है, धंधे चौपट हो गए हैं, मजदूर खाली बैठे हैं, सामान सड़ रहे हैं, फसल कट नहीं पा रही है, लोग औने-पौने में अपने नोटों से लेकर सामान तक को देने को बेबस हैं, यह सब देश का बहुत बड़ा नुकसान है, और ये आंकड़े अडानी-अंबानी की बेलैंस-शीट की तरह दिखने वाले नहीं हैं।
इस फैसले को जितने खराब तरीके से केन्द्र सरकार ने लागू किया है, और जितनी खराब तैयारी इसके लिए थी, वह भी हक्का-बक्का करने वाली है। महज भावना की बातें करके और जनता को देशभक्ति की चुनौती देकर सरकार अपनी नाकामयाबी की जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। और संसद में आज कांग्रेस के आनंद शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से यह सवाल भी किया है कि उन्होंने नोटों के बारे में दिए जा रहे अपने सार्वजनिक भाषण में जिस तरह अपनी जान पर खतरा गिनाया है, उन्हें देश को उसकी भी जानकारी देनी चाहिए। यह सवाल भी एक जायज सवाल है, और भारत के प्रधानमंत्री ऐसी गंभीर बात को महज जिक्र करके नहीं छोड़ सकते, उन्हें इसका खुलासा भी करना चाहिए।
आज एक दिक्कत यह हो गई है कि मोदी समर्थक बहुत से लोग सोशल मीडिया पर इतने अधिक सक्रिय हैं, और मोदी के हर फैसले के हर बारीक पहलू तक वे इस तरह समर्थन का कीर्तन-मंजीरा बजाने लगते हैं, कि तर्क खो जाते हैं, इंसाफ की बात भी नहीं उठ पाती है। और ऐसे हो-हल्ले में यह सामने मुश्किल से आ पाता है कि जनता किस तरह की तकलीफ से गुजर रही है। सोशल मीडिया पर तर्कहीन तरीके से जो तबका ऐसे हमलावर अंदाज में हावी होता है, वह जनता की नब्ज पाने की संभावना खो बैठता है। हमको लगता है कि मोदी को अपने समर्थकों के ट्वीट और उनकी फेसबुक पोस्ट से परे भी जमीनी हकीकत को जानने की कोशिश करनी चाहिए। गोमांस को लेकर, देश के दलितों को लेकर, देश के छात्रों को लेकर, और अब गरीबों के गिने-चुने नोटों को लेकर केन्द्र सरकार की जो अपार बेफिक्री दिखती है, वह खुद उसी के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है। और किसी के लिए न सही, अपने आपके लिए मोदी और उनके साथियों को आम जनता की तकलीफों, उनके जख्मों के बारे में मालूम करना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें