नोटबंदी की तारीखों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया है सरकार ने...

संपादकीय
17 नवम्बर 2016  
न चाहते हुए भी आज फिर देश में मची हुई तबाही को लेकर फिर एक बार लिखना पड़ रहा है। किसी एक मुद्दे पर न तो इतना लिखना ठीक है, और न ही कोई इतना पढ़ ही सकते, लेकिन यह देश में शायद पहला ऐसा मौका है जो लोगों की जिंदगी कुछ दिनों या हफ्तों के लिए इस तरह और इस हद तक तबाह हुई है। मोदी सरकार का नोटबंदी का फैसला देश के सबसे कमजोर लोगों से लेकर मध्यमवर्गीय लोगों तक इतना भारी पड़ रहा है कि उसका अंदाज तमाम खबरों के बावजूद लगाना बड़ा मुश्किल है। और सरकार हालात पर पल-पल नजर रखते हुए अपने नियमों में हर दिन कुछ न कुछ फेरबदल कर रही है, ताकि जनता की दिक्कत कुछ कम हो, लेकिन देश की बैंकिंग क्षमता इतनी सीमित है, और आबादी का अधिकतर हिस्सा नगदी लेन-देन पर इस कदर टिका हुआ है, कि शहरी योजनाकारों और नीति-निर्धारकों की तैयारी किसी काम नहीं आई। दर्जनों लोग बैंकों की कतारों में मर चुके हैं, पूरी-पूरी सर्द रात बच्चों को लिए हुए महिलाएं कतारों में हैं, लोग आत्महत्याएं कर रहे हैं, और बिना इलाज वक्त गुजार रहे लोगों के आकड़े तो खबरों में आ भी नहीं सकते। लेकिन इसके साथ-साथ आज न दिखने वाला, और आंकड़ों में न आने वाला एक बहुत बड़ा नुकसान और हो रहा है, शादियों के इस मौसम में काम पाने वाले कारीगरों और मजदूरों का धंधा खत्म हो गया है, जो कि देश में करोड़ों की संख्या में हैं, इसके साथ-साथ दसियों करोड़ खेतिहर मजदूर खेत से लेकर मंडी तक से बाहर हैं क्योंकि देने को मजदूरी नहीं है, या मजदूर परिवार बैंकों के बाहर पड़े हुए हैं।
अब इन तमाम बातों को देखकर लगता है कि केन्द्र सरकार ने जनता पर इस भयानक हमले की तैयारी करते हुए मौसम और तारीखों को देखा तक नहीं। शादियों के महूरत बड़ी आसानी से कैलेंडर और पंचांग से देखे जा सकते थे, और भारत के खेत-खलिहानों और मंडी के मौसम की जानकारी तो केन्द्र सरकार के पास हमेशा से रहती ही है। इन दो बड़ी बातों को अनदेखा करके इस वक्त का यह हमला सरकार की बहुत ही कम समझबूझ का एक बड़ा सुबूत है। दूसरी तरफ यह बात भी समझ से परे है कि जब देश के कोई एटीएम नए आकार के नोटों के लिए तकनीकी रूप से तैयार नहीं थे, तब या तो नोट ही पुराने आकार में छप जाते, या बिना किसी हल्ले के एटीएम में एक और आकार जोड़ा जा सकता था। इसके अलावा किसी भी काबिल सरकार से यह उम्मीद भी की जाती है कि अगर इतने बड़े पैमाने पर कोई कार्रवाई होनी थी, तो बैंकों के मौजूदा ढांचे की सीमित क्षमता से परे भी किसी और तरह की समानांतर व्यवस्था सरकार करती, फिर चाहे वह पुलिस थानों पर नोटों की बदली करती, या किसी और विकल्प का इंतजाम करती।
आज की इस कार्रवाई में उन लोगों की कोई जगह नहीं है जिनके पास किसी तरह की पहचान नहीं है, जिनके पास बैंक खाते नहीं हैं, या कि जो लोग बैंकों तक जाने की ताकत नहीं रखते हैं। ऐसे लोग भी करोड़ों में हैं जिनमें बहुत गरीब, विकलांग, फुटपाथी बच्चे, मानसिक विचलित बेघर लोग, और दूसरे प्रदेशों में मजदूरी कर रहे बिना आईडी वाले लोग शामिल हैं। इनके लिए सरकार की योजना में कोई जगह नहीं है, और ये वे लोग हैं जो सबसे ही नाजुक हालात में हैं, जिनके लिए कोई सहारा नहीं है। हमको यह भी हैरानी है कि पिछले बरस दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनने का दावा करने वाली भाजपा ने भी अपने नेता नरेन्द्र मोदी के इस ऐतिहासिक फैसले की दिक्कतों से जनता को उबारने के लिए अपने सदस्यों से कुछ नहीं कहा है। होना तो यह चाहिए था कि अपने नेता के फैसले से गरीब जनता पर आ रही दिक्कत को दूर करने के लिए भाजपा-सदस्यों को झोंक दिया जाता। अगर ऐसा भी होता, तो भी लोगों की तकलीफ और शिकायत कुछ कम होती, कुछ दूर होती। आज तो देश के करोड़ों लोगों के उत्पादक घंटे खत्म हो रहे हैं, जो रोजगार रोज के हैं, उनकी कमाई और मजदूरी की संभावना उस दिन के डूबने के साथ ही डूब रही है, और सच तो यह है कि देश में कालेधन को नोटों की शक्ल में रखने वाले लोग आज भी बेफिक्र हैं कि वे किसी और के नाम से बैंकों में पैसा डालकर निकाल लेंगे, और तीन चौथाई रकम तो बची ही रहेगी। लेकिन इस पूरे दौर में गरीब की तकलीफ, और उसकी यह बेबसी कि उसके पास अपनी रकम रहते हुए भी आज वह भिखारी की तरह बैंकों के सामने खड़ा है, एक-एक दुकानदार के सामने रहम मांग रहा है, अस्पतालों के सामने रो-पीट रहा है, यह बहुत ही भयानक है। हम नहीं जानते कि इस नौबत से निकलने के लिए मोदी सरकार के पास कोई एग्जिट-स्ट्रेटेजी है या नहीं, लेकिन यह बात तय है कि केन्द्र सरकार, और मोदी के सहयोगियों में देश की आधी गरीब आबादी के बारे में अंदाज बहुत ही कम और कमजोर है। ठीक ऐसे में जले पर नमक छिड़कने के लिए ये खबरें आ रही हैं कि विजय माल्या जैसे खरबपति दिवालिया के हजारों करोड़ के कर्ज को बैंक बट्टे-खाते में डाल रहा है। पता नहीं इतने गरीबों की इतनी तकलीफ भरी आह का क्या असर होगा?

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