द डे ऑफ्टर के लिए हर कोई तैयारी कर रखे

संपादकीय
18 नवम्बर 2016  
नोटों पर सुलग रहे देश में अब जनता को यह भी सोचना होगा कि सरकार की कार्रवाई से परे, और नोटों के मौजूदा अकाल के गुजर जाने पर भी वह अपना क्या इंतजाम रखे। हम पिछले कई दिनों में सरकार की कमियों पर चर्चा कर चुके हैं, आज कुछ चर्चा जनता के हिस्से की जरूरी है कि ऐसा फिर होने पर उसे किस तरह से तैयार रहना चाहिए। लेकिन यह तो सरकार की लाई हुई नौबत है, हमारे पाठकों को याद होगा कि हम देश पर किसी साइबर हमले की आशंका की चर्चा करते हुए कई बार इसी जगह लिख चुके हैं कि सरकारों को ऐसा होने पर किन-किन बातों के लिए तैयार होना चाहिए। ऐसे हमले किसी देश की बैंकिंग पर, उसके ट्रेन और प्लेन के रिजर्वेशन पर, उसके क्रेडिट कार्ड कंपनियों पर एक साथ हो सकते हैं, और उसका असर भी या तो अभी की नोटबंदी जैसा होगा, या फिर इससे भी और बुरा होगा। और आज दुनिया में एक-दूसरे देशों पर जैसे साइबर हमले होते हैं, उन्हें देखते हुए हम ऐसी किसी नौबत को नामुमकिन बिल्कुल भी नहीं मानते।
भारत की सरकार को भी इस बारे में सोचना चाहिए, क्योंकि आज नोटबंदी को लेकर यह बात साफ है कि सरकार की समझ और उसकी तैयारी दोनों में कमजोरी का एक कड़ा मुकाबला हुआ है, और उसकी शिकार देश की जनता हुई है। दूसरी तरफ जनता ने भी कभी ऐसी नौबत की कल्पना नहीं की थी, और आबादी के शायद चार फीसदी लोगों के पास ही क्रेडिट कार्ड है जिससे कि खरीददारी हो सकती है, बहुत से लोगों के पास एटीएम कार्ड हैं, लेकिन वे उससे खरीददारी के आदी नहीं हैं, और सरकार का इंतजाम बुरी तरह से और पूरी तरह से नाकाफी था। अब अगर किसी दूसरे देश या हिन्दुस्तान के भीतर के किसी आतंकी संगठन के साइबर हमले से अगर बैंक, रेल, विमान, और क्रेडिट कार्ड के सारे ऑनलाईन इंतजाम एक साथ ठप्प कर दिए जाएं, तो देश में गृहयुद्ध जैसी नौबत आ सकती है। लोग खाने-पीने के सामान के लिए पूरे देश में लूटपाट को मजबूर हो सकते हैं, जैसा कि अभी मध्यप्रदेश में एक-दो जगह सामने आया। और ऐसे किसी भी जरूरतमंद को मुजरिम कहना भी जायज नहीं होगा। दूसरी तरफ सोने या शेयर में पूंजीनिवेश, घर की आलमारी या लॉकर में नगदी रखना भी बड़ी हिफाजत का काम नहीं होगा। लेकिन लोगों को कुछ न कुछ सोचकर रखना चाहिए। दिक्कत यह है कि आबादी का अधिकतर हिस्सा ऐसा है जो पाई-पाई को खर्च करके ही दाना-दाना जुटा पाता है, और उसके पास यह ताकत नहीं है कि वह घर पर अधिक नगदी रख सके।
लेकिन जिस तरह से दुनिया में बहुत सी फिल्में बनी हैं जिनमें परमाणु युद्ध के अगले दिन क्या होगा, या किसी और हादसे के अगले दिन क्या होगा, उसी तरह हिन्दुस्तान की जनता को भी ऐसी, द डे ऑफ्टर, नौबत के लिए सोचना चाहिए। कम से कम लोगों को जरूरत की दवाईयां हफ्ते-दस दिन के लिए रखनी चाहिए, गाडिय़ों में पेट्रोल-डीजल भराकर रखने की आदत डालनी चाहिए, राशन कम से कम कुछ दिनों का तो रखना ही चाहिए, और नगदी भी घर या बैंक के लॉकर में कम से कम एक पखवाड़े जिंदा रहने लायक रखना चाहिए, और छोटे नोटों में रखना चाहिए जिसके कि बंद होने का खतरा कम होगा।
इस नोटबंदी से पूरे देश में लोगों का सरकार पर से, बैंकों के इंतजाम पर से, अपने पैसों की ताकत पर से, और अपनी खुद की क्षमता पर से भरोसा बहुत बुरी तरह टूटा है। बहुत कमजोर लोग बहुत बुरी तरह हिल गए हैं, और इससे उबरकर फिर से आत्मविश्वास के साथ खड़ा होना आसान भी नहीं रहेगा। लेकिन दुनिया तो दुनिया है, वह चलती ही रहती है, और कोई नौबत इससे भी अधिक बुरी आ सकती है, और समाज के बाकी लोग कैसे बेरहम हो सकते हैं, यह कल आन्ध्र के एक अस्पताल में दिख गया है जब एक गरीब औरत सरकारी अस्पताल के भीतर अपने विकलांग बीमार पति को रैम्प पर घसीटकर ऊपर की मंजिल पर ले जा रही है, और आसपास के लोग तमाशबीन खड़े हुए देख रहे हैं। इसलिए लोगों को खुद ही इस सरकार, या अगली किसी सरकार के, या किसी दुश्मन देश के, या किसी आतंकी संगठन के डिजिटल और साइबर हमले की सोचकर जिंदा रहने का जुगाड़ करके रखना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें