सांसद-विधायकों को भ्रष्टाचार पर आश्रित रखना ठीक नहीं

संपादकीय
2 नवम्बर 2016  
संसद की समिति ने सांसदों की तनख्वाह बढ़ाने की सिफारिश कर दी है। केन्द्र सरकार ने सांसदों के मूल वेतन को दुगुना करना तय किया है। अब यह पचास हजार से बढ़कर लाख रूपया हो सकती है। यह सिफारिश पिछले कुछ समय से हवा में तैर रही थी, और लोग सोशल मीडिया पर इसका मजाक भी उड़ा रहे थे कि आमतौर पर कई मुद्दों पर एक-दूसरे से असहमत रहने वाले सांसदों ने बिल्कुल एक होकर अपना वेतन दो गुना करने की सिफारिश की है। अगर वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री इस पर सहमत हो जाते हैं तो संसद के अगले सत्र में यह लागू हो सकता है। आज सांसदों को 50 हजार रूपए महीने तनख्वाह मिलती है, इसे दोगुनी करने का प्रस्ताव है, और संसदीय क्षेत्र का भत्ता 45 हजार रूपए महीने से बढ़ाकर 90 हजार रूपए महीने करने की सिफारिश भी की गई है। इससे पहले देश के अलग-अलग प्रदेशों में राज्य ने विधायकों की तनख्वाह बढ़ाई है, और छत्तीसगढ़ में इसे लेकर कांग्रेस के भीतर ही गुटबाजी का एक बखेड़ा खड़ा हुआ था। लोगों को यह लगता है कि सांसद या विधायक कोई नौकरी नहीं करते हैं, और उन्हें मिलने वाले भत्ते या वेतन को बाजार भाव के हिसाब से नहीं बढ़ाना चाहिए, और सांसद-विधायक सेवाभाव से काम करते रहें।
आज देश में लोगों के बीच यह भी एक भावना है कि सांसदों और विधायकों में से बहुत से लोग भ्रष्ट हैं, और कुछ लोग यह भी मानते हैं कि वे निजी कमाई के लिए अगर भ्रष्टाचार नहीं करते, तो भी वे चुनाव का खर्च जुटाने के लिए भ्रष्ट होते ही हैं। इस देश ने कई तरह के स्टिंग ऑपरेशन देखे हैं जिनमें विधायक और सांसद सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेते पकड़ाए हैं, सांसदों की सदस्यता खत्म की गई है, और अदालतों ने अपनी बेबसी दिखाई है कि संसद के भीतर के मामलों पर वे कार्रवाई नहीं कर सकतीं वरना सांसद-विधायक जेल में भी होते। लोगों का यह भी देखा हुआ है कि चुनावों में आयोग द्वारा तय की गई सीमा से कई गुना अधिक खर्च उम्मीदवार करते हैं, और जनता का एक हिस्सा भ्रष्टाचार को बड़ा पसंद करता है, धर्म और जाति के नेता उगाही करते हैं, और देश का मीडिया पेडन्यूज को लेकर काफी नंगा हो चुका है। ऐसे में एक बात और जुड़ जाती है कि सांसद या विधायक को अपने चुनाव क्षेत्र में जितना दौरा करना पड़ता है, और जितना सामाजिक शिष्टाचार निभाना पड़ता है, लोगों की आसमान छूती उम्मीदों के लिए कम्प्यूटर से लेकर फोटोकॉपी तक और कर्मचारियों से लेकर उनके फोन और पेट्रोल तक जितना खर्च करना पड़ता है, वह विधानसभा या संसद की तनख्वाह से कभी पूरा नहीं हो सकता।
ऐसे में इस देश को यह समझना चाहिए कि अपने घर-परिवार की जरूरतों को अनदेखा करके कोई जनता की सेवा नहीं कर सकते। देश में कुछ गिने-चुने बाबा आम्टे हो सकते हैं, कुछ गिनी-चुनी मदर टेरेसा हो सकती हैं, लेकिन अगर सांसद और विधायक ईमानदार चाहिए, और काबिल भी चाहिए, तो उसके लिए कुछ दाम चुकाना देश को मुफ्तखोरी के मुकाबले अधिक सस्ता पड़ेगा। हमारा यह मानना है कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों को अगर जरूरत के लायक तनख्वाह और भत्ते मिलेंगे, तो चुनावी राजनीति में कुछ बेहतर लोग भी आ पाएंगे। अपने परिवार को अभाव में रखते हुए लोग पूरी जिंदगी जनसेवा नहीं कर सकते। इसलिए जनता को अपने बाकी खर्च की तरह विधायक और सांसद पर भी खर्च करना सीखना चाहिए। बड़े बुजुर्ग बोल गए हैं कि सस्ता रोए बार-बार, महंगा रोए एक बार। पांच बरस में एक बार जिसे चुनना हो, और पांच बरस के बाद जिसके सामने इस काम के जारी रहने की कोई गारंटी न हो, उसे अपने वर्तमान और अपने भविष्य के लिए इतना भुगतान तो मिलना ही चाहिए कि वे घर की फिक्र से बेफिक्र रहकर जनता का काम कर सकें। हम इस सोच से बिल्कुल सहमत नहीं हैं कि सांसद और विधायक तो भ्रष्ट होते ही हैं इसलिए उन्हें अधिक तनख्वाह क्यों दी जाए? इस पैमाने पर तो फिर सरकारी अमले को भी तनख्वाह देने की जरूरत नहीं है क्योंकि उस पर भी भ्रष्टाचार की तोहमत लगती है। लोगों को भ्रष्ट होने से बचाना भी समाज का काम है, और हमारा यह मानना है कि थोड़े से महंगे सांसद या विधायक देश के लिए अधिक उत्पादक हो सकते हैं, बजाय इसके कि वे अपनी ही निजी उलझनों में फंसे रहें, और अपनी संसदीय जिम्मेदारी ठीक से न निभा सकें। निर्वाचित लोगों को बाजार के भ्रष्टाचार पर आश्रित रखना ठीक नहीं है।

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