अमरीका, जर्मनी, और भारत

संपादकीय
19 नवंबर 2016


पाकिस्तान में अभी एक चट्टान पर बनी हुई बुद्ध की बहुत पुरानी प्रतिमा का जीर्णोद्धार किया गया है, इसे तालिबानों ने तबाह कर दिया था, क्योंकि उनके मुताबिक इस्लाम बुतपरस्ती के खिलाफ है। अब स्वात घाटी में माहौल सरकार के काबू में आया, तो पुरातत्व के जानकार लोगों ने इस पुरानी एतिहासिक प्रतिमा को फिर से शक्ल दी। लेकिन तालिबानी सोच और तबाही का एक छोटा सा दौर भी ऐसी तबाही कर सकता है जो कि बाद में कभी मरम्मत से पुरानी शक्ल में वापिस आ सके, और कभी न भी आ सके। आज अमरीका में निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लेकर एक ऐसी ही दहशत फैली हुई है कि वे अपने एक कार्यकाल में ही अमरीकी मूल्यों की इतनी तबाही कर सकते हैं, कि उन्हें वापिस सुधारना पता नहीं मुमकिन हो पाएगा या नहीं, या हो भी पाएगा तो पता नहीं किस हद तक। 

लोकतंत्र में ऐसे दौर आते-जाते रहते हैं जब लगता है कि तबाही कभी सुधारी नहीं जा सकेगी। लोगों को याद होगा कि अभी पौन सदी पहले ही जर्मनी में हिटलर जनता के बहुमत से चुनकर संसद में आया था, और उस वक्त ऐसा लगता था कि अपनी फौजी ताकत के भरोसे वह पूरी दुनिया में राज करने लगेगा, उसने दसियों लाख यहूदियों का कत्ल करवाया, अपने देश में सोच से लेकर कला तक, सबको कुचल डाला, लेकिन वक्त ने उसे ऐसा कुचला कि जर्मनी आज तक हिटलर की कलंकित शर्मिंदगी से उबर नहीं पाया है। और आज के जर्मनी की हालत यह है कि वह योरप के तमाम देशों में इस बात में सबसे आगे है कि खाड़ी के देशों से वहां पहुंचते मुस्लिम शरणार्थियों को जगह दे। हालत यह है कि इन शरणार्थियों को बहुत अधिक जगह देते-देते सरकार आलोचना का शिकार भी हो रही है, लेकिन अपनी उदार और लोकतांत्रिक, और अंतरराष्ट्रवादी सोच पर कायम है। दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप ने अपने बहुत ही जहर भरे हुए, नफरत पर टिके, साम्प्रदायिक चुनाव प्रचार में यह भी कहा था कि वे मुस्लिमों का अमरीका में आना रोक देंगे। और राष्ट्रपति चुने जाने के बाद भी उन्होंने कहा है कि जो प्रवासी लोग बिना पूरे कानूनी कागजात के अमरीका में हैं, ऐसे दस-बीस-तीस लाख लोगों को भी वे बाहर निकाल देंगे। उनकी इस सोच के खिलाफ अमरीका के उदारवादी लोग, वहां के विश्वविद्यालयों के छात्र इस बात की तैयारी कर रहे हैं कि विश्वविद्यालयों की जमीन को ऐसे लोगों को शरण देने के लिए खोल दिया जाए। 
भारत में भी आज एक सीमित तबके के तौर-तरीकों को लेकर अल्पसंख्यकों से लेकर दलितों और आदिवासियों तक में भारी दहशत फैली हुई है। बहुत से लोगों को लगता है कि मोदी सरकार आने के बाद गोमांस से लेकर बाकी तमाम बातों तक जो एक बहुत ही हमलावर सनातनी या ब्राम्हणवादी सोच देश पर लादी जा रही है, उससे देश के सामाजिक ताने-बाने का जो नुकसान होने जा रहा है, उसकी भरपाई कभी नहीं हो पाएगी। बहुत से लोग अमरीका और भारत की तुलना कर रहे हैं, बहुत से लोग जर्मनी से भारत की तुलना करते ही हैं, और अभी अमरीका में एक शिक्षक को काम से हटा दिया गया है जिसने कि डोनाल्ड ट्रंप के तौर-तरीकों की तुलना हिटलर के तौर-तरीकों से की थी। यह सिलसिला कभी बंद नहीं हो सकता, क्योंकि इतिहास तो हमेशा ही मिसालों के लिए मौजूद रहता है, और ताकतवर लोगों की कार्रवाई लोगों को सोचने के लिए मजबूर करती ही है। आज भारत में जिस तरह से सबसे कमजोर और सबसे गरीब तबके पर नोटबंदी की मार पड़ रही है, उससे भी यह बात लगती है कि सत्ता पर बैठे हुए लोगों की, सत्तारूढ़ पार्टी के लोगों की उंगलियां गरीबों की नब्ज पर बिल्कुल भी नहीं रह गई हैं। 

दुनिया का इतिहास ऐसे कई दौर देख चुका है, और बहुत से देश अलोकतांत्रिक ताकतों से उबर भी पाते हैं, जैसे कि हिन्दुस्तान आपातकाल से उबरा ही था। लेकिन लोग अपने हमलावर तेवरों का इस्तेमाल करते हुए यह भूल जाते हैं कि इतिहास ऐसे बहुत से लोगों से भरा पड़ा है जो अपनी ताकत के दिनों में अपने को खुदा मानने की गलती कर बैठे थे। अमरीका हो, जर्मनी हो, या भारत का लोकतंत्र, इन सबका इतिहास लोकतंत्र पर लौटकर आने का है, और इन तमाम जगहों पर सत्ता पर जो लोग आते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि इतिहास में कोई भी ताकत के बेजा इस्तेमाल के साथ हमेशा कायम नहीं रह पाते।

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