मप्र के कलेक्टर का एक अलोकतांत्रिक आदेश...

संपादकीय
23 नवंबर 2016


मध्यप्रदेश के इंदौर में कलेक्टर ने एक आदेश निकाला है कि सोशल मीडिया पर या वॉट्सऐप पर नोटबंदी के बारे में आलोचना करने पर या गलत जानकारी फैलाने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। बहुत लंबे इस आदेश में भारत के संविधान की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलते हुए तरह-तरह का प्रतिबंध लगाया गया है, और अदालत में यह एक दिन भी नहीं टिक पाएगा। लेकिन मध्यप्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण समझे जाने वाले जिले के कलेक्टर की यह सोच भयानक है, और सोच के साथ-साथ भारत की संवैधानिक व्यवस्था की उसकी समझ बहुत दयनीय है। कलेक्टर ने अपने आदेश में सोशल मीडिया पर नोटबंदी से संबंधित किसी भी तरह की आलोचना पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस आदेश में पुराने नोटों के बारे में किसी भी तरह की टिप्पणी, नोटों के बदले जाने में होने वाली परेशानी तथा सरकार की आलोचना को दंडनीय अपराध बताया गया है।
अभी कुछ महीनों से देश में असहिष्णुता खबरों और चर्चा से किसी तरह बाहर हुई थी। लेकिन ऐसे आदेश एक बार फिर सरकार या अफसर की सेंसरशिप की सोच, या इमरजेंसी जैसे हालात वाली बात को बढ़ावा देते हैं। हमारा ख्याल है कि इसके पहले कि कोई अदालत कलेक्टर के इस आदेश को खारिज करे, मध्यप्रदेश सरकार को खुद होकर इसे खारिज करना चाहिए, और प्रदेश के बाकी अफसरों को भी नसीहत देनी चाहिए कि नोटबंदी को राष्ट्रवाद, और उसके विरोध को राष्ट्रद्रोह मानने की बेवकूफ तंगदिली से बचें। दरअसल ऐसी सोच उन नेताओं के बयानों से उपजती और पनपती है जिनको लोकतंत्र पर जरा भी भरोसा नहीं है। जब वे बढ़-चढ़कर ऐसा कहते हैं, और ऐसा कहने वालों में संविधान की शपथ लेने वाले मंत्री-मुख्यमंत्री जैसे लोग भी रहते हैं, तो उनके मातहत लोग यही जुबान बोलने लगते हैं, उन्हीं की बातों को आगे बढ़ाते हैं, और उनसे अधिक वफादार होकर दिखाते हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले दिनों भोपाल जेल से सिमी के विचाराधीन कैदियों के फरार होने और मारे जाने को लेकर दिए गए अपने बयानों में उन्हें बार-बार आतंकी और आतंकवादी कहा था, जबकि वे आतंक के आरोपों से गुजर रहे थे, और उनके मामले में अदालती फैसला बाकी ही था। जब प्रदेश का शासकीय मुखिया ही विचाराधीन कैदियों को मुजरिम साबित करने लगे, तो यह सोच मातहत लोगों के लिए एक मार्गदर्शन हो जाती है, और उनको नोटबंदी की आलोचना देश से गद्दारी लगने लगती है, और वे आदेश निकालकर इसे दंडनीय अपराध घोषित करने लगते हैं।
दरअसल भारतीय प्रशासनिक सेवा में आ जाने से ही लोगों के भीतर लोकतंत्र की बुनियादी समझ नहीं आ जाती, और न ही उनमें इंसानियत अनिवार्य रूप से खुद होकर आ जाती है। हम नहीं जानते कि इन अफसरों के लंबे प्रशिक्षण में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवाधिकार, जैसी बातें सिखाई जाती हैं या नहीं, लेकिन अपने राजनीतिक मुखिया का चेहरा देखकर बहुत से लोग अलोकतांत्रिक बर्ताव करने लगते हैं। इंदौर कलेक्टर का यह आदेश एक मिसाल कायम कर सकता है, और इसके लिए जनसंगठनों को तुरंत ही सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल करनी चाहिए। हमारा पूरा अंदाज है कि अदालत से ऐसे अफसर को कड़ी फटकार मिलेगी, और वह देश के बाकी अफसरों के लिए एक सबक भी होगी।

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