देशभक्त रात-दिन चौकन्ने और देशद्रोहियों की तलाश

संपादकीय
24 नवंबर 2016


भारत की विविधता में बहुत से ऐसे मौके रहते हैं जब अरबपतियों से भरी हुई संसद और विधानसभाओं की समझ में देश के गरीबों की हालत नहीं दिखती। इसी तरह समाज में अलग-अलग तबके रहते हैं जिनमें एक-दूसरे के बारे में समझ की बड़ी कमी रहती है। कहने के लिए लोग फ्रांस की किसी राजकुमारी की कहानी बताते हैं जिसने कहा था कि अगर लोगों के पास खाने को रोटी नहीं है, तो वे लोग केक क्यों नहीं खाते? कुछ वैसी ही समझ भारत के भी बहुत से लोगों में दूसरे तबके के, दूसरे धर्म के, दूसरी जातियों के लोगों के बारे में है। इन दिनों देश में नोटबंदी को लेकर जिस तरह की वोटबंदी और लामबंदी चल रही है, वह देखने लायक है। बहुत से लोगों को यह लग रहा है कि नोटबंदी देशभक्ति का एक बड़ा पैमाना है, और जो लोग इन कतारों में खड़े रहने की तकलीफ को झेल नहीं सकते, वे देश की सरहद पर खड़े हुए सैनिकों से किसी हिफाजत को पाने के हकदार भी नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ आमतौर पर देशभक्ति और देशद्रोह का मुद्दा उठाने वाली शिवसेना के मुखिया उद्धव ठाकरे ने लोगों को झिड़का है और कहा है कि नोटों की कतारों से किसी की देशभक्ति को जोड़कर देखना गलत बात है।
आज देश की जनता का एक बकबकी तबका सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी से हर घंटे अपनी देशभक्ति साबित करता है। और जब अपने आपको देशभक्त बताना हो, तो ऐसा तभी मुमकिन है जब किसी दूसरे तबके को देशद्रोही और गद्दार साबित किया जाए। जब तक ऐसा कोई पैमाना सामने नहीं होगा, लोग अपने आपको अपने हाथों तिलक लगाकर शहीद का दर्जा भला कैसे दे सकते हैं। नतीजा यह है कि बात-बात में देश के साथ वफादारी को साबित करने की जरूरत पड़ रही है, और कुछ घरों में नौबत ऐसी बिगड़ गई है कि पत्नी अगर पति को सुबह की चौथी चाय बनाकर देने में कुछ भुनभुनाए, तो वह देशद्रोही करार दी जा रही है।
दरअसल देश के मध्यमवर्गीय तबके में देश के सबसे गरीब तबके की हालत, जरूरत, और उसकी नौबत को लेकर समझ भी नहीं है, और समझने की कोई हसरत भी नहीं है। क्योंकि अपने से गरीब की बेबसी को समझने का मतलब अपने मन के सुख-चैन को खोने के बराबर होता है। इसलिए जो लोग नोटों की कमी से, अपनी ही बचत के नोटों के बदल न पाने की वजह से मर रहे हैं या खुदकुशी कर रहे हैं, वे लोग गद्दार कहला रहे हैं, और उन मौतों पर हमदर्दी दिखाने या आंसू बहाने वाले लोग भी देशद्रोही का दर्जा पा रहे हैं। आज हिन्दुस्तान की हवा एक भयानक आक्रामक राष्ट्रवाद की उत्तेजना से ऐसी भरी हुई है कि हर बात को देश के प्रति प्रेम या नफरत करार देने पर लोग आमादा हैं, और अगर कोई विकलांग (दिव्यांग) पहियों वाली कुर्सी पर सिनेमाघर में है, और राष्ट्रगान के वक्त उठकर खड़े होने के लिए उसके पास पैरों में ताकत नहीं है, तो बाकी दर्शकों की मार खाने के लिए उसके पास सिर, मुंह, और बाकी बदन तो है ही। ऐसी उत्तेजना लोगों की तकलीफों को अनदेखा करके एक झूठी तस्वीर देखना और दिखाना चाहती है। ऐसी उत्तेजना यह सुनना भी नहीं चाहती कि कालेधन के खिलाफ की जा रही कार्रवाई में बुनियादी कमी और खामी है, और महज नीयत से सरकार की कोई कार्रवाई सही या गलत नहीं कही जा सकती, अमल की जिम्मेदारी के बिना सरकार का कोई काम नहीं आंका जा सकता। इस बुनियादी जरूरत को अनदेखा करके, देश की बहुत गरीब आधी आबादी की रोज की जिंदा रहने की बेबसी को अनदेखा करके लोग जब लंबी कतारों को बड़ी देशभक्ति मान लेते हैं, और दर्द से कराहने वालों को देश का गद्दार मान लेते हैं, तो यह नुकसान हिन्दुस्तान का कुछ हफ्तों या महीनों का नुकसान नहीं है, यह राष्ट्रवाद महज आक्रामक राष्ट्रवाद नहीं है, यह आत्मघाती राष्ट्रवाद में तब्दील होते जा रहा है। राष्ट्रवाद को हमेशा ही कोई दुश्मन नसीब नहीं होता, उसे हमले का मौका भी हमेशा नहीं मिलता, और ऐसे में ठलहा बैठा राष्ट्रवाद अपने आसपास छोटे-छोटे दुश्मन उसी तरह तलाश या गढ़ लेता है, जिस तरह दशहरे पर हर गली-मोहल्ले में बच्चे एक-एक रावण खड़ा कर लेते हैं, जलाकर तसल्ली पाने के लिए। इसी तरह हिन्दुस्तान में आज उत्तेजित जनता अपनी देशभक्ति को साबित करने के लिए सुबह से रात तक यह देखती रहती है कि और किसे देशद्रोही करार दिया जा सकता है। यह सिलसिला हिन्दुस्तान को इक्कीसवीं सदी से वापिस घसीटकर अठारहवीं सदी की लोकतांत्रिक समझ की ओर ले जा रहा है, जहां पर पत्नी को अपने आपको पतिव्रता साबित करने के लिए मृत पति की चिता पर सती होना पड़ता था। आज सरकार की किसी भयंकर गलती पर भी दर्द से, जख्म से कोई कराहे, तो वह कराह पाकिस्तान जिंदाबाद मानी जा रही है, और जनता की समझ का यह नुकसान किसी एक सरकार के आने या जाने से आता या जाता नहीं है। यह नुकसान बहुत बड़ा है, और पता नहीं भारतीय लोकतंत्र, भारतीय समाज इस नुकसान से कब और कैसे उबरेगा।

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