नगदी वेतन की रियायत सिर्फ सरकारी कर्मचारियों को कैसे?

संपादकीय
25 नवंबर 2016


नोटबंदी को लेकर केन्द्र सरकार के कुछ फैसले, और उसके आदेश परेशान करने वाले हैं क्योंकि वे देश में बराबरी के, समानता के अधिकार के खिलाफ जाते दिख रहे हैं। पहले दिन से ही यह इंतजाम था कि सरकारी अस्पतालों में इलाज का भुगतान पुराने नोटों से किया जा सकेगा, लेकिन निजी अस्पतालों में मरीजों को यह छूट नहीं दी गई थी। पेट्रोल पंपों को छूट दी गई थी कि वे ग्राहकों से पुराने नोट ले सकते हैं, ऐसा इसलिए भी जरूरी था कि लोगों की गाडिय़ां न थम जाएं, क्योंकि ऐसा होने पर एक किस्म से जिंदगी ही थम जाएगी। लेकिन दूध, डबल रोटी, अनाज या सब्जी जैसी चीजें जो कि पेट्रोल के मुकाबले भी अधिक जरूरी थीं, उन्हें छूट नहीं दी गई थी, और आज भी नहीं दी गई है।
इसके बाद एक और आदेश आया कि केन्द्र सरकार अपने कर्मचारियों को इस महीने की तनख्वाह में से दस-दस हजार रूपए नगद देगी, और देश भर में फैले उसके कर्मचारी थोड़ी सी राहत पाएंगे। अब सवाल यह उठता है कि एक सरकारी कर्मचारी को मिलने वाले वेतन के एक हिस्से को तो नगद दिया जाएगा, और सरकारी कर्मचारियों के पास तो अनिवार्य रूप से बैंक खाता भी है, लेकिन देश के असंगठित क्षेत्र के अधिकतर कर्मचारियों के पास न तो बैंक खाते हैं, न ही उनकी तनख्वाह केन्द्र सरकार के कर्मचारियों जितनी है, वे लोग क्या करेंगे? आज छत्तीसगढ़ सरकार का भी यह आदेश आया है कि वह अपने कर्मचारियों को इस महीने की तनख्वाह में से दस-दस हजार रूपए नए नोटों में देगी, अब राज्य सरकार ने किस तरह केन्द्र सरकार से यह रियायत पाई है, यह तो साफ नहीं है, लेकिन यह राज्य कर्मचारियों के लिए एक राहत की बात जरूर होगी। अब फिर यह सवाल उठता है कि केन्द्र और राज्य शासन के कर्मचारियों से परे के लोग अगर बैंक से ऐसी छूट नहीं पाते हैं, तो यह तो भारतीय संविधान के तहत उनको मिले समानता के अधिकार के ठीक खिलाफ बात लगती है। यह नागरिक के बुनियादी अधिकारों में भेदभाव है, और गैरसरकारी तबके को भी ऐसी ही और इतनी ही राहत का अधिकार है। भारत की आबादी को सरकारी और गैरसरकारी दो तबकों में बांटकर उनके साथ ऐसा फर्क करना असंवैधानिक है।
एक और बात यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी के अपने राष्ट्र के नाम संदेश में बड़ा साफ-साफ कहा था कि पांच सौ और हजार रूपयों के पुराने नोटों को 10 नवंबर से 30 दिसंबर तक किसी भी बैंक या चुनिंदा डाकघर से बदला जा सकेगा। कल केन्द्र सरकार ने इस व्यवस्था को भी बदल दिया है, और नोटों की बदली पर कल आधी रात से ही पूरी रोक लग गई है। ऐसी बहुत सी बातें हैं जो कि सरकार के हिस्से में खामियां गिनाती हैं, और गैरबराबरी भी। भारत की आबादी का एक बहुत बड़ा और सबसे कमजोर तबका ऐसा भी है जो कि बेघर है, बंजारा है, जो फुटपाथों और रेल्वे स्टेशनों पर जीने वाले बच्चों का है, और जिनके पास बैंक खाते नहीं है, किसी तरह की पहचान नहीं है, आधार कार्ड नहीं है, और उनके पास भी मेहनत और मुसीबत से बचाए हुए नोट हैं। केन्द्र सरकार की अब तक की सारी योजना, रोजाना बदलने वाले सारे नियम मिलकर भी ऐसे सबसे कमजोर करोड़ों गरीबों के लिए कोई रास्ता लेकर नहीं आए हैं, और अब बीती आधी रात से नोटों की बदली भी बंद हो चुकी है, तो ऐसे लोग खुले बाजार में अपनी बचत को औने-पौने में बेचने या बदलने के अलावा और क्या कर सकेंगे?
अच्छी नीयत से बनाई गई कोई नीति भी अपने अमल में अगर इतनी अमानवीय है कि वह सरकारी और गैरसरकारी तबकों में इतना बड़ा फर्क करती है, जिसमें समाज के सबसे कमजोर करोड़ों लोगों के लिए कोई इंतजाम नहीं है, तो यह एक जनकल्याणकारी सरकार का कार्यक्रम नहीं हो सकता, और ऐसा करके यह सरकार एक कटघरे में तो आ ही जाती है। नोटबंदी पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है और कई राज्यों के हाईकोर्ट भी यह सुन रहे हैं, ऐसे में जाहिर है कि कोई न कोई व्यक्ति सरकारी और गैरसरकारी तबकों के बीच केन्द्र सरकार के भेदभाव के मामले को उठाएंगे, और इस पर जवाब देना सरकार को मुश्किल होगा। 

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