जब तक नोटबंदी की धूल बैठेगी तब तक सबसे गरीब...

संपादकीय
26 नवंबर 2016


आज भारत की आम जनता को एक बड़ी सामाजिक समझ की जरूरत है। नोटबंदी ने उसकी जिंदगी और उसके रोज के तौर-तरीकों को इतनी बुरी तरह हिलाकर रख दिया है कि गरीब जनता के पांव अगले शायद एक-दो बरस तक मजबूती से वापिस टिक नहीं पाएंगे। रोज की मजदूरी का नुकसान एक बात है, अपनी बेबसी से देश पर भरोसा हिल जाना एक दूसरी बात है कि पैसे रहते हुए भी लोग उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे। लेकिन एक और बात है जिस पर समाज के लोगों को सोचने की जरूरत है। बहुत गरीब से लेकर गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों तक घर चलाने वाली महिला अपने पास कुछ रकम बचाकर रखने की आदी रहती है ताकि मुसीबत के वक्त घर चलाया जा सके। आज नोटबंदी के चक्कर में उसकी सारी बचत उजागर हो चुकी है, और देश में करोड़ों ऐसी महिलाएं होंगी जो कि अपने पति का उलाहना भी झेल रही होंगी कि उसने छुपाकर नोट रखे हुए थे। परिवार के भीतर का यह तनाव रातों-रात खत्म नहीं होगा, और न ही एक बार उजागर हो चुकी बचत वापिस बच सकेगी। यह बहुत बड़ा सामाजिक खतरा है कि सामने आ गई ऐसी बचत आनन-फानन खत्म हो जाए।
एक दूसरा खतरा यह है कि बहुत से गरीबों के खातों में कुछ कालेधन वालों ने पैसे जमा कर दिए हैं, और आने वाले दिनों में वे तरह-तरह से इसे सफेद करके निकालना चाहेंगे। और यह भी हो सकता है कि ऐसे करोड़ों जन-धन खाते, या कि दूसरे गरीब बैंक खाते रखने वाले लोग इनमें से कुछ पैसा खर्च भी कर दें, और बाद में उन्हें दिक्कत जाए कि वे इसे चुकाएंगे कैसे। एक अलग दिक्कत यह है कि बहुत से संस्थानों ने, कारखानों और कारोबारों ने अपने कर्मचारियों को पुराने नोटों में कई-कई महीने की तनख्वाह एडवांस में दे दी है। आज देश में अधिकतर कर्मचारी ऐसे हैं जिनका घर उनकी महीने की कमाई से नहीं चलता। अब आज एकदम से कई महीनों की तनख्वाह एडवांस में पा लेना तो आसान है, लेकिन आने वाले महीनों में घर खर्च कैसे चलेगा? अनायास आई हुई रकम रफ्तार से खर्च हो जाती है, और बाद में बहुत दिक्कत खड़ी होती है।
हर दिन हिन्दुस्तान में करोड़ों मजदूर और रोज का काम करने वाले फेरीवाले, फुटपाथी व्यापारी ऐसे हैं जिनकी मजदूरी या जिनका धंधा नोटबंदी से बुरी तरह मार खा चुका है। इनका नुकसान तो रोज के रोज हो रहा है, और इनमें से बहुत से ऐसे होंगे जो कि कर्ज से दबे होंगे, जिन्होंने किस्तों पर सामान ले लिए होंगे, और अब कमाई ठप्प हो जाने के बाद ये उसे चुकाएंगे कैसे? आज ही एक रिपोर्ट आई है कि पैसों की कमी की वजह से लोग निजी अस्पतालों में जा नहीं रहे हैं, जहां पर पुराने नोट मंजूर भी नहीं हो रहे हैं, और ऐसे अस्पतालों की कमर भी टूट रही है कि वे अपने कर्ज की किस्त कैसे चुकाएं? बहुत से ऐसे बुजुर्ग लोग रहते हैं जो खुले बाजार में अपनी बचत को ब्याज पर देकर रखते हैं, और बैंक से कुछ अधिक ब्याज पाते हैं। अब आज बाजार में ऐसी रकम पर ब्याज कई जगहों पर एकदम से टूट गया है, और ऐसे बुजुर्ग लोगों का घर चलना मुश्किल होने जा रहा है।
कालाधन खत्म तो होना चाहिए, लेकिन यह लोगों को खत्म करने की कीमत पर नहीं होना चाहिए। आज नोटबंदी के बाद से देश के बड़े लोगों में कोई हाहाकार नहीं है। वे तमाम लोग अपने एक करोड़ के कालेधन के नोटों की जगह 75 लाख तक के नए नोट जुटा चुके हैं। उनका और कोई नुकसान नहीं हुआ है, और रूपए में चवन्नी का यह नुकसान झेलने की उनकी ताकत है। लेकिन बाकी लोगों में जो सबसे गरीब लोग हैं, उनकी पेट पर जो लात पड़ी है, उसका दर्द, उसके जख्म अगले एक-दो बरस तक नहीं जा पाएंगे। और जो लोग यह सोच रहे हैं कि नोटबंदी के बाद अब प्लास्टिक मनी का चलन बढ़ेगा, तो देश में आज शिक्षा और तकनीक की समझ की कमी इतनी है कि लोग आज भी ई-ठगी के शिकार हो रहे हैं, और जैसे-जैसे लोग इस पर अधिक आश्रित होंगे, वे अधिक खतरे में भी पड़ेंगे। कुल मिलाकर जब तक नोटबंदी की धूल जमीन पर बैठेगी, तब तक सबसे गरीब फेंफड़े इतने थक चुके होंगे कि उनकी जिंदगी एक-दो बरस तो कम हो ही चुकी होगी।

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