किसी भी लोकतंत्र में औसतन निर्वाचित कट्टरता के पांच बरस

संपादकीय
29 नवंबर 2016


अमरीका में अभी एक विमान में सफर करते हुए लोगों के बीच तनातनी हुई क्योंकि निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों ने हिलेरी क्लिंटन के समर्थकों को गाली दे दी। ऐसा पिछले कई दिनों से चल रहा है, और दूसरी तरफ ट्रंप के विरोधी वहां चुनावी नतीजे आने के बाद कई दिनों तक लगातार सड़कों पर प्रदर्शन करते रहे, और ट्रंप के दफ्तर की इमारत के सामने भी जमकर प्रदर्शन हुए। अमरीका की जनता का एक बड़ा बहुमत इस बात से हक्का-बक्का है कि मिलीजुली संस्कृतियों वाले इस देश में ट्रंप जैसा नफरतजीवी कैसे जीतकर आ गया। कमोबेश ऐसा ही हाल ब्रिटेन में हुआ जहां पर यूरोपीय यूनियन से अलग होने के लिए हुए जनमत संग्रह में जनता के बहुमत ने ब्रेक्सिट के पक्ष में वोट डाला, और वह ब्रिटिश सरकार पर एक बंधनकारी जनमत था कि वह यूरोपीय यूनियन से अलग हो जाए। इसके कई मुद्दों में से सबसे बड़ा और तात्कालिक ज्वलंत मुद्दा यह था कि योरप में पहुंच रहे अनगिनत शरणार्थियों में से कई हजार को ब्रिटेन में भी शरण देनी थी, और यूरोपीय यूनियन की ऐसी बातें ब्रिटेन की जनता के एक बहुमत को मंजूर नहीं थी।
अब इन दो देशों के अलावा जर्मनी और फ्रांस में भी संकीर्णतावादी, नस्लवाद के समर्थक लोग, या मिलीजुली संस्कृतियों के विरोधी लोग लोकप्रियता पाते दिख रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि दुनिया का माहौल एक बार फिर दकियानूसी हो रहा है, और आज पश्चिम में जो दिख रहा है, वह दो बरस पहले भारत में इस देश की एक संकीर्णतावादी समझी जाने वाली भारतीय जनता पार्टी की जीत से शुरू हुआ सिलसिला दिख रहा है। भारत में भी इस जीत के बाद मोदी समर्थकों, या हिन्दुत्ववादियों, या राष्ट्रवादियों ने लगातार सार्वजनिक जीवन में जिस तरह का तनाव खड़ा किया है, उससे इस देश की विविधता पर भी बड़ी आंच आई है। कहीं पहरावे को लेकर, तो कहीं साहित्य और फिल्म को लेकर, कहीं इतिहास की किताबों को लेकर, तो कहीं पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर, और सबसे अधिक तो गोमांस को लेकर इस देश में सार्वजनिक जीवन में जैसी आक्रामक उत्तेजना फैलाई गई, कुछ वैसी ही उत्तेजना ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन में दिखी, ट्रंप की जीत के बाद अमरीका में दिख रही है, और जर्मनी-फ्रांस कतार में खड़े हुए दिख ही रहे हैं।
लोकतंत्र में जिन लोगों की गहरी आस्था है, और जिन लोगों ने दुनिया के लोकतंत्र के इतिहास को दो-चार चुनावों से अधिक लंबे दौर में देखा हुआ है, उनका यह मानना है कि कट्टरपंथ के ऐसे सैलाब आते-जाते रहते हैं, और ऐसे हर सैलाब के बाद उन देशों के लोकतंत्र को मजबूती ही मिलती है, और अस्थाई रूप से जो नुकसान होता है, वह लंबे समय तक कायम नहीं रहता। भारत में भी लोग यही उम्मीद करते हैं कि आज देश में विविधतावादी संस्कृति के खिलाफ जो माहौल बना हुआ है, उसे खत्म करने का काम या तो मौजूदा मोदी सरकार करे, या फिर अगले चुनाव में यह एक मुद्दा रहे, और अधिक विविधतावादी कोई गठबंधन, कोई सरकार सत्ता में आए। जो लोग विश्व इतिहास को पढ़ते हैं, वे लोग अलग-अलग देशों में ऐसे फेरबदल के बारे में अधिक सोच सकते हैं, और अधिक बता सकते हैं। फिलहाल दुनिया में कट्टरता का जो सैलाब आ रहा है, वह तमाम उदार लोगों के लिए फिक्र की बात है, और किसी भी देश के लोकतंत्र में औसतन पांच बरस के लिए तो निर्वाचित कट्टरता रहती ही है।

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