पीएम के दौरे की कामयाबी, और उनकी तारीफ के बाद...

संपादकीय
3 नवम्बर 2016  
प्रधानमंत्री की हैसियत से नरेन्द्र मोदी की यह तीसरी छत्तीसगढ़ यात्रा थी, लेकिन इस बार पहले के मुकाबले राज्य सरकार और प्रदेश के पार्टी संगठन में तनाव कम था, और आत्मविश्वास अधिक था। यह तैयारी से लेकर विदाई तक पूरे वक्त झलकते रहा, और देश भर के सारे तनावों से मानो आजाद होकर प्रधानमंत्री ने खुलकर छत्तीसगढ़ सरकार की तारीफ की, और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने इसके पहले प्रधानमंत्री की इससे अधिक तारीफ कर ही दी थी। कुल मिलाकर यह माहौल प्रदेश सरकार के लिए एक उत्साह का था क्योंकि राज्य सूखे से उबरा हुआ दिखता है, और कार्यक्रम में लाई गई या आई हुई भीड़ प्रधानमंत्री को भी खुश करने के लिए काफी थी। पिछले महीनों में कई राज्यों में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को भी राजनीतिक आमसभाओं में कुछ हजार की भीड़ देखना भी नसीब हुआ था, और ऐसे में अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री के सामने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनकी टीम की प्रधानमंत्री के मुंह से वाहवाही राज्य सरकार का उत्साह बढ़ा सकती है। यह पूरा कार्यक्रम गैरराजनीतिक था, और सरकारी मंच होने की वजह से सरकार ने लोगों के लाने के जो इंतजाम किए थे, वे किसी भी प्रदेश में किसी भी पार्टी की सरकार के लिए सत्ता के आम इस्तेमाल से अधिक नहीं थे, और इसके लिए महज मौजूदा सरकार को अलग से कोसना शायद ठीक नहीं होगा।
लेकिन प्रधानमंत्री का आना और तारीफ करके जाना, दीवाली और भाईदूज को छोड़कर तैयारी में लगे हुए राज्य सरकार और भाजपा के लोगों के लिए तो खुशी की बात हो सकती है, लेकिन चुनाव के दो बरस पहले की यह कामयाबी राज्य सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी में एक खुशफहमी पैदा करने का खतरा भी रखती है। राज्योत्सव के मौके पर ऐसा आयोजन सफल करना शायद अधिक आसान है बजाय अगले चुनाव में मतदाताओं के बीच ऐसी कामयाबी पाने के। इसलिए सत्ता और संगठन को अपने पांव जमीन पर रहने देना चाहिए, और राज्य स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री के भारी-भरकम कामयाबी वाले स्वागत को एक कार्यक्रम की सफलता भर मानना चाहिए। यह याद रखने की जरूरत है कि पिछला विधानसभा चुनाव भाजपा ने महज पौन फीसदी वोटों की लीड से जीता था। उस वक्त भी भाजपा की कुछ सीटों पर रहस्यमय और अप्रत्याशित जीत सत्ता में लौटने के पीछे थी। लेकिन इस बार राज्य की राजनीति में जोगी ने एक नया त्रिकोण बनाया है, और उसे लेकर सत्तारूढ़ पार्टी का इस खुशफहमी में रहना भी ठीक नहीं होगा कि जोगी अपनी पिछली पार्टी, कांग्रेस, को ही नुकसान पहुंचाएंगे, और ऐसे त्रिकोण में भाजपा का फायदा होगा।
दूसरी बात यह कि किसी भी तरह के समारोह या जलसे की बनाई गई चकाचौंध को कई बार सरकार में बैठे हुए लोग भी सरकारी जिम्मेदारी के मोर्चे पर कामयाबी मान बैठते हैं। मुख्यमंत्री को इस बारे में भी सोचना चाहिए कि सरकारी पैसों पर कामयाब हो रहे इस पूरे सालगिरह-जलसे से सरकारी काम की कामयाबी साबित नहीं होती है। पूरे प्रदेश में जमीनी स्तर पर हर विभाग के कामकाज में बड़ी गड़बडिय़ां भी हैं, और भारी सुधार की जरूरत भी है। इन दोनों बातों को अगले दो बरस में दूर कर पाना एक ऊंची पहाड़ी पर चढऩे से कम मशक्कत का काम नहीं है, और यह काम राज्योत्सव के आयोजन की तरह आसान नहीं हैं। अक्सर यह होता है कि लोग जनता के सामने रखी गई अपनी चमकीली तस्वीर को खुद भी सच मान लेते हैं, और अपनी कही बातों के झांसे में खुद भी आ जाते हैं। ऐसा होने पर ही देश-प्रदेश में कई बार और कई जगह सत्तारूढ़ पार्टी को बड़ा नुकसान भी झेलना पड़ता है। छत्तीसगढ़ सरकार को मोदी के मुंह से सुनी गई तारीफ को महज राज्योत्सव के कार्यक्रम की तारीफ मानना चाहिए, और इस आयोजन के निपटने के बाद भिड़कर जमीनी हालात सुधारने की कोशिश करनी चाहिए। लगातार तीन कार्यकाल कम खतरनाक नहीं होते हैं, और ऐसे में लोग चौथी बार भी वोट पाना अपना हक और मतदाता की जिम्मेदारी मान बैठते हैं। अगले दो-तीन दिनों में राज्योत्सव खत्म हो जाए, फिर मुख्यमंत्री और उनकी सरकार, उनकी पार्टी, इन सबको भिड़कर राज्य को उतना ही चमकीला बनाने की कोशिश करनी चाहिए, जितनी चमकीली तस्वीर राज्योत्सव में पेश की गई है।

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