व्यापम भ्रष्टाचार के राज रामनरेश यादव के साथ ही पंचतत्व में विलीन..

संपादकीय
22 नवंबर 2016

मध्यप्रदेश के राज्यपाल रहकर रिटायर हुए रामनरेश यादव का उनके गृह प्रदेश में आज निधन हो गया। उन पर मध्यप्रदेश के इतिहास के सबसे कुख्यात और सबसे बड़े व्यापम घोटाले में शामिल होने के आरोप लगे थे, और राजभवन की दीवारों के पार पुलिस के जाने पर लगी हुई संवैधानिक रोक के चलते हुए उनकी गर्दन तक पुलिस के हाथ नहीं पहुंच पाए। उनके पहले उनके बेटे की मौत हुई जो कि व्यापम घोटाले में रिश्वत लेने के आरोप से घिरा हुआ था। इस तरह इन दो मौतों के बाद भ्रष्टाचार में मध्यप्रदेश राजभवन की हिस्सेदारी और उसकी भूमिका की कहानी दफन सी हो गई है। लेकिन इस बारे में सोचा जाना चाहिए कि राजभवन जैसी संवैधानिक संस्था पर काबिज लोग अगर भ्रष्टाचार के बड़े जाहिर और साफ-साफ आरोपों के बावजूद बचने के लिए किसी पेशेवर मुजरिम की तरह संवैधानिक रियायतों की आड़ लेते हैं, तो सरकार को क्या करना चाहिए, और जनता को क्या करना चाहिए?
हमारा यह मानना है कि निर्वाचित नेता तो फिर भी अपनी हरकतों, करतूतों, और अपने जुर्मों के लिए जनता के प्रति जवाबदेह रहते हैं, और पांच बरस बाद जनता की अदालत में जाकर खड़े होते हैं। उन्हें अदालती कटघरे से, या कि पुलिस जांच से कोई रियायत इसलिए नहीं मिलती है कि वे किसी कुर्सी पर हैं। लेकिन राज्यपाल की कुर्सी को ऐसी रियायत हासिल है, और उसका बेजा इस्तेमाल अकेले रामनरेश यादव के परिवार ने किया हो, ऐसा भी नहीं है। लोगों को याद होगा कि झारखंड के राज्यपाल रहते हुए सरदार बूटा सिंह के बेटों ने जिस तरह का धंधा उस राज्य में चला रखा था, वह शर्म से डूब मरने लायक बात थी, लेकिन वह पूरा कुनबा बेशर्मी के रिकॉर्ड कायम करते रहा। फिर बुजुर्ग नेता नारायण दत्त तिवारी ने एक अलग किस्म का नैतिक भ्रष्टाचार कायम किया जब अविभाजित आंध्र के राजभवन से उनके कई सेक्स-वीडियो निकलकर बाहर आए, पूरे वक्त वे एक अघोषित संतान के दायर किए गए मुकदमे को भी झेलते रहे, और आखिर में जाकर उस संतान को उन्हें अपना मानना पड़ा। 
यह सिलसिला बहुत भयानक है जब सतही स्तर के लोग, भ्रष्ट और अनैतिक जीवन वाले लोग किसी संवैधानिक पद पर पहुंच जाते हैं, और वहां की रियायत पाकर राज्य की पूरी ताकत का बेजा इस्तेमाल करते हैं। कभी-कभी राष्ट्रपति की कुर्सी पर भी ऐसे लोग पहुंचे हैं जिनके परिवारों ने राष्ट्रपति भवन का तरह-तरह से बेजा इस्तेमाल किया है। हमारा मानना है कि ऐसे लोगों के खिलाफ जनहित याचिका लेकर कुछ जनसंगठनों को अदालत तक जाना चाहिए। हो सकता है कि उनके खिलाफ कोई मामला साबित भी न हो सके, लेकिन अदालत में लोगों के ऐसे भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ होना भी छोटी बात नहीं रहती है। अदालत में गवाही के रूप में भी बहुत सी बातें सामने रखी जा सकती हैं, और देश के जागरूक जनसंगठनों को संवैधानिक संस्थाओं पर ऐसी निगरानी रखनी भी चाहिए।

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