टकराव में भी स्कूल-अस्पताल हमलों से परे रखे जाने चाहिए

संपादकीय
5 नवम्बर 2016  
कश्मीर में लगातार स्कूलों को आतंकी और अलगाववादी बंद करवाते चल रहे हैं। कई हफ्तों या कुछ महीनों से कोई पढ़ाई नहीं हुई है, और दर्जनों स्कूलें जला दी गई हैं। इस बीच एक खबर यह भी है कि वहां के एक बड़े अलगाववादी नेता के परिवार की बच्ची जिस स्कूल में पढ़ती है उसे बंद नहीं करवाया गया है, और बाकी स्कूलों में पढ़ाई बंद है, इम्तिहान की तारीख आ चुकी है, लेकिन न पढ़ाई का ठिकाना है न परीक्षा का। लोगों को याद होगा कि बस्तर में एक वक्त था जब सुरक्षा बल वहां के गांवों में सिर छुपाने के लिए स्कूलों की इमारतों में टिकते थे, और उस वजह से नक्सली स्कूलों को बमों से उड़ाने लगे थे। बहुत सी स्कूलें तबाह हुई थीं, और उसकी भरपाई होने में समय लगा था।
इन दो घटनाओं के पीछे उग्रवादियों की सोच अलग-अलग हो सकती है, लेकिन उनका एक असर एक सरीखा है कि पढ़ाई चौपट कर दी जाए। दरअसल आतंकी और उग्रवादी जिस तरह के मुद्दों को लेकर चलते हैं, दुनिया में कहीं भी उन्हें पढ़ाई-लिखाई जैसी धीमी बात से कोई लेना-देना नहीं होता है। जो पढ़ाई बारह बरस की स्कूल और तीन-चार बरस के कॉलेज से पूरी होती हो, वह पढ़ाई आतंकी-एजेंडा की नजरों में महत्वहीन होती है। उनके सामने महज अगले कुछ दिन, महीने, या बरस रहते हैं, और आतंकियों की जिंदगी का भी ठिकाना नहीं रहता है, इसलिए समाज को धीमी रफ्तार से बदलने वाली बातों को उनको कोई परवाह नहीं रहती। नतीजा यह है कि कश्मीरी बच्चों की जिंदगी को एक तरफ तो सुरक्षा बलों की बंदूकों के छर्रे तबाह कर रहे हैं, और दूसरी तरफ जो जख्मी नहीं हैं, उनको भी स्कूल बंद होने से पढऩा नसीब नहीं हो रहा है।
नक्सली हो, या कश्मीर के आतंकी या अलगाववादी, यह बात इन सबको माकूल बैठती है कि जनता न पढ़े-लिखे। क्योंकि न पढ़ी हुई जनता बंदूक थामने और आतंकी-हिंसक हमले करने के लिए अधिक तैयार रहती है। जब लोग पढ़-लिख लेते हैं, तो उनमें से कुछ की नजर में लोकतंत्र का महत्व बढ़ जाता है, बहुतों की नजर में जिंदगी की सहूलियतों का महत्व दिखने लगता है, और वे देश के संविधान के खिलाफ आतंकी वारदातों से दूर रहना बेहतर समझते हैं। आतंकी नेता खुद तो पढ़े-लिखे रहते हैं, खुद के बच्चों को वे बाहर के महंंगे स्कूलों या कॉलेजों में पढ़ाते हैं, लेकिन जिस इलाके पर वे अपना राज चाहते हैं, वहां पर वे आम जनता को अनपढ़ पसंद करते हैं। लोकतंत्र के हिमायती लोगों को चाहिए कि आतंक की ऐसी सोच, और आतंकियों की निजी जिंदगी के पारिवारिक पाखंड का भांडाफोड़ करे। लोगों को यह भी याद होगा कि कर्नाटक का सबसे बड़ा चंदन तस्कर वीरप्पन जब मारा गया, तो पता लगा कि उसकी बेटी किसी महंगे कॉलेज में पढ़ रही थी। जो लोग बंदूक के बल पर जुर्म करते हैं, वे बिना राजनीतिक विचारधारा के मुजरिम हों, या राजनीतिक विचारधारा के साथ वाले मुजरिम हों, उनकी निजी जिंदगी का पाखंड बहुत रहता है। लोगों को यह फर्क भी समझना चाहिए कि लोकतंत्र में आज भी अधिकतर मौकों पर अधिकतर लोगों से सवाल पूछने की आजादी रहती है, और सार्वजनिक जीवन के लोगों के निजी जीवन की जानकारी भी जनता के बीच आती रहती है। लेकिन आतंकी न तो जवाबदेह रहते हैं, न ही उनके परिवार के ऐशोआराम सामने आते हैं। किसी भी अलोकतांत्रिक आंदोलन के भीतर के ऐसे विरोधाभास और पाखंड उजागर होने चाहिए। श्रीनगर के बंगले में बसे हुए अलगाववादी बुजुर्ग की पोती या नातिन का स्कूल तो बख्श दिया गया है, और वहां पढ़ाई चल रही है, लेकिन बाकी स्कूलें बंद करवा दी गई हैं, या जला दी गई हैं। यह कैसा वैचारिक आंदोलन है, यह कैसा राजनीतिक आंदोलन है? जिस तरह पूरी दुनिया में एम्बुलेंस को किसी भी युद्ध या टकराव के बीच भी हमले से परे रखा जाता है, ठीक वैसे ही स्कूलों और अस्पतालों को रखना चाहिए। आज तो सीरिया से जो खबरें आ रही हैं, उनमें सरकारी फौजें ही हवाई हमले करके अपने ही देश की स्कूलों और अस्पतालों में लोगों को दर्जनों और सैकड़ों की गिनती में मार रही हैं।

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