दिल्ली को देख बाकी देश को अपने-अपने घर सुधारने चाहिए

संपादकीय
6 नवम्बर 2016  
दिल्ली का भयानक प्रदूषण चूंकि दिल्ली में है इसलिए खबरों में है, और इसीलिए वह सुप्रीम कोर्ट में भी है। इसी दिल्ली के प्रदूषण को लेकर पिछले दशकों से कभी डीजल गाडिय़ों पर रोक लगती है, तो कभी सभी पुरानी गाडिय़ों पर। लेकिन जो लोग दिल्ली के प्रदूषण को एक स्थानीय समस्या मानते हैं, उन्हें यह समझना होगा कि राजस्थान के मरुस्थल से उड़कर आने वाली रेत भी दिल्ली की सड़कों पर प्रदूषण पैदा करती है, निर्माण कार्य के दौरान इमारतों से उडऩे वाले सीमेंट और बाकी सामान से भी प्रदूषण होता है, और दिल्ली से दो-दो सौ किलोमीटर दूर हरियाणा, उत्तरप्रदेश, और दूसरी जगहों पर फसलों के बाद खेतों में ठूंठ को जलाने की जो आदत पड़ी हुई है, उसका प्रदूषण भी दिल्ली तक फैलता है, और आसपास के कई प्रदेशों के कई शहरों तक भी। अब दिल्ली में इस प्रदूषण में गाडिय़ों का भयानक प्रदूषण और जुड़ जाता है, और कुछ सौ वर्गमील के इस शहर के घने इलाकों में गाडिय़ों की हालत देखकर ऐसा लगता है कि दिल्ली महज गाडिय़ों की बस्ती है। ऐसे में यह प्रदूषण रोक पाना आसान बात नहीं है।
फिर एक बात यह भी है कि यह सिर्फ दिल्ली की दिक्कत नहीं है, लोगों को याद होगा कि पिछले बरस चीन की राजधानी बीजिंग में जितना भयानक प्रदूषण हुआ था, उसकी तस्वीरों ने दुनिया भर में बीजिंग की साख घटाई थी। आज दिल्ली की साख भी दुनिया के शहरों में चौपट है, लेकिन दिल्ली थमती इसलिए नहीं है कि सरकार, अदालत, और संसद तीनों यहीं बसी हैं, और दुनिया भर में जिनको इनसे वास्ता पड़ता है, देश भर के जिन लोगों को इनसे वास्ता पड़ता है, उनको दिल्ली आना ही पड़ता है। और इसी एक बात को देखें तो यह समझ आता है कि किसी एक शहर में शहरीकरण का इतनी बुरी तरह केन्द्रीयकरण होना अपने आपमें खतरा होता है, और दिल्ली उसे भुगत रही है। दुनिया में कई ऐसे देश रहते हैं जहां लोकतंत्र के ये तीनों संस्थान अलग-अलग शहरों में बसे रहते हैं। इनसे एक तो क्षेत्रीय विकास का संतुलन बना रहता है, और दूसरी बात यह कि किसी एक महानगर में ट्रैफिक और आती-जाती आबादी का इतना बुरा हाल नहीं होता।
लेकिन दिल्ली के इस स्थानीय मुद्दे को लेकर आज यहां पर लिखने का मकसद यह है कि इनमें से कई बातें छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश पर भी लागू होती हैं, और इस प्रदेश की राजधानी रायपुर भी देश के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक गिनी जाती है। छत्तीसगढ़ में लोगों को इस बात पर तसल्ली हो सकती है कि पिछले साल-छह महीने में यहां का प्रदूषण कुछ नीचे गया है, लेकिन लोगों की सेहत को जो नुकसान हुआ है, वह नीचे नहीं जाने वाला है। दूसरी बात यह कि बहुत भयानक से कुछ कम भयानक हो जाना किसी राहत की बात नहीं है। जिस तरह दिल्ली में गाडिय़ों का हाल है, और सड़कें पार्किंग लॉट की तरह दिखती हैं, वैसा ही कुछ हाल रायपुर जैसे शहर का होने लगा है, और यहां की अतिविकसित नई राजधानी ने पिछले एक हफ्ते में दो बार ऐसा ट्रैफिक जाम देखा है कि लोगों के होश उड़ गए। यह बात सही है कि शहरी यातायात के लिए बसें बढ़ती जा रही हैं, लेकिन ऐसी बसों का जाल और अधिक बढ़ाने की जरूरत है चाहे यह सरकार के लिए शुरू में बड़ा नुकसानदेह ही क्यों न हो। जब तक निजी गाडिय़ों पर निर्भर रहने की लोगों की बेबसी खत्म नहीं होगी, तब तक सड़कों पर प्रदूषण नहीं घटेगा। फिर एक बात शहरी गंदगी की भी है, जिस प्रदेश की राजधानी साफ नहीं रह सकती, वहां पर प्रदूषण कैसे घटेगा? छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में स्थानीय म्युनिसिपलों को अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों की तरफ वापिस भेजना होगा। आज हर म्युनिसिपल कमाई के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाने में लगी हुई दिखती है, और सफाई की पहली जिम्मेदारी का एहसास किसी को नहीं रह गया है। गंदगी प्रदूषण बढ़ाती है, और छत्तीसगढ़ की राजधानी को तो नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल लगातार चेतावनी दे-देकर थक भी चुकी है। ये सारी चेतावनी म्युनिसिपल के खाते में जा रही है, और इसे अपनी पहली जिम्मेदारी की खबर नहीं दिखती है।
दिल्ली को लेकर अगर छत्तीसगढ़ सावधान नहीं होगा, तो बहुत दिक्कत होगी। यह पूरा राज्य खनिजों पर आधारित कारखानों वाला है, और कारखानों की यह किस्म हमेशा ही भारी प्रदूषण फैलाने वाली रहती है। कोरबा के बिजलीघरों से लेकर रायपुर के लोहे के कारखानों तक, चारों तरफ औद्योगिक प्रदूषण लोगों को मार रहा है, और सरकार इन पर काबू नहीं कर पा रही है। यह नौबत भी तुरंत सुधारना चाहिए क्योंकि प्रदूषण को आर्थिक प्रगति के लिए जरूरी मान लेने की गलती अगर एक बार हो जाएगी तो हालात कभी नहीं सुधारे जा सकेंगे। दिल्ली की हालत देखकर बाकी देश को अपने-अपने घर सुधारने चाहिए।

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