भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में एकतरफा फैसलों वाले पीएम

संपादकीय
21 नवम्बर 2016  
भारत में नोटबंदी को लेकर अब तक आम लोगों की जिंदगी तबाह चली आ रही है, और इससे जुड़े हुए पहलुओं पर जब सोचते हैं तो कुछ और बातें समझ पड़ती हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इतना बड़ा फैसला लेते हुए, और लागू करते हुए अपने मंत्रिमंडल को भी भरोसे में नहीं लिया। जबकि उनकी पार्टी सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया है, और एनडीए में बहुत सी और पार्टियां भी शामिल है, जिनमें से एक बड़ी सबसे पुरानी साथी अकाली दल भी है, जिसके पंजाब के मुख्यमंत्री ने हैरानी जाहिर की है कि नोटबंदी से होने वाली दिक्कतों पर केन्द्रीय वित्तमंत्री उनकी बात सुनने को तैयार नहीं हैं। और यह फसल का मौसम है, पंजाब कृषि प्रधान राज्य है, और वहां पर चुनाव सामने खड़े हैं। प्रधानमंत्री के इस फैसले पर जिस तरह अमल हो रहा है, उसे लेकर भाजपा की एक दूसरी सबसे पुरानी साथी शिवसेना भी खफा है, और दबी जुबान से भाजपा के ऊपर से लेकर नीचे तक के नेता फिक्रमंद हैं कि नोटबंदी से फायदा चाहे जिसका भी हो, चाहे देश की अर्थव्यवस्था का हो, आज तो देश की तकरीबन पूरी आबादी जिस तरह सुख-चैन खो बैठी है, जिस तरह से अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है, कारोबार ठप्प हो गया है, उसे देखते हुए यह तो जाहिर है कि यह बहुत बड़ा नुकसान कभी भी पूरा नहीं हो पाएगा, क्योंकि रोज कमाने-खाने वाले लोग अपनी मजदूरी का मौका रोज खोते जा रहे हैं। 
अब यह बात भी खुलकर सामने आ रही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी के इतने दिन बाद भी अपने मंत्रिमंडल के सामने इसका खुलासा नहीं किया है, और दूसरी तरफ अभी जारी संसद सत्र में उन्हें बुलाने की मांग बार-बार की जा रही है, और यह लिखे जाने तक तो वे संसद में गए नहीं थे। ये तमाम बातें कुछ परेशान करती हैं, और यह भी सुझाती है कि देश के व्यापक महत्व के मुद्दों पर विपक्ष को भरोसे में लेना तो दूर रहा, प्रधानमंत्री ने अपनी ही पार्टी के नेताओं को, अपने ही मंत्रिमंडल के लोगों को फैसले की घोषणा के बाद भी भरोसे में नहीं लिया है। यह लोकतंत्र में एक व्यक्ति के फैसले लेने की एक ऐसी नौबत है जिसमें उस फैसले के असर को ढोने का जिम्मा पूरे देश पर आ रहा है। और यह एनडीए और भाजपा के भीतर एक असंतुलित शक्ति केन्द्र का सुबूत भी है कि आज देश को हिलाकर रख देने वाले एक फैसले को कुल तीन लोग मिलकर ले लेते हैं, और न लेने के पहले, न लेने के बाद वे किसी के लिए जवाबदेह हैं। आज तो दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में है न सिर्फ विपक्ष के साथ बात करके, बल्कि हथियारबंद आंदोलनकारियों के साथ भी शांतिवार्ता करके किसी नतीजे पर पहुंचने का रिवाज है, लेकिन नरेन्द्र मोदी के साथ एक यह दिक्कत खुलकर सामने आ रही है कि वे एकतरफा भाषण के मौकों पर तो बहुत सहज रहते हैं, लेकिन विचार-विमर्श के मौकों पर वे संसद के भीतर भी बहस में हिस्सा नहीं लेते, सवालों के जवाब नहीं देते, और सिर्फ बयान देने के लिए वे कभी-कभी संसद में आते हैं। उनका यह रूख मीडिया के साथ बातचीत में भी दिखता है जब वे या तो इंटरव्यू देते नहीं हैं, या फिर उनके इंटरव्यू देख-सुनकर यह समझ पड़ता है कि सबसे तल्ख सवालों को न पूछने की शर्त पर ही वह इंटरव्यू दिया गया है। 
यह बात जरूर है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहली बार ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकार की अगुवाई कर रहे हैं, और पार्टी पर काबू पा सके हैं। लेकिन भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में सड़क से लेकर संसद तक, और मीडिया से लेकर विपक्ष तक के सवालों के जवाब देकर ही वे सम्मान पा सकते हैं, और अपने मन की लंबी-लंबी बातों को माईक और रेडियो पर कहते हुए उन्हें यह भी करना होगा कि वे लोगों की छोटी-छोटी बातों को सुनें, और और अपने पसंदीदा सवालों से परे, अपने को नापसंद सवालों के जवाब भी देना सीखें। आज की नौबत न तो लोकतंत्र के लिए अच्छी है, और न ही मोदी के खुद के लंबे राजनीतिक भविष्य के लिए अच्छी है। नोटबंदी एक ऐसा मौका हो सकता था जब वे बाकी लोगों के साथ मिलकर देश को भरोसे में लेते, लेकिन वे ऐसा कर नहीं पाए। 

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