परोसा गया सच, पूरा सच मानने के ही हकदार लोग

संपादकीय
20 नवंबर 2016

देश में आज बहुत से मुद्दों की जिंदगी बस कुछ-कुछ महीनों की चल रही है। कभी सरहद पर हिन्दुस्तानी फौज की एक शहादत भी हफ्तों तक मीडिया में छाई रहती है, और देश की आबादी को देशभक्त और गद्दार ऐसे दो तबकों में बांटने का काम करती है। कभी गाय ऐसा मुद्दा बनती है कि कुछ महीनों तक हर तरफ लोग गाय को मारने के शक में मारे जाते हैं, पिटते हैं, और फिर एकाएक गाय का मुद्दा गायब हो जाता है, और वह महज घूरों पर खाकर जीने के लिए छोड़ दी जाती है। कभी कश्मीर खबरों में आता है तो लगता है कि देश में वही एक मुद्दा है, और फिर महीने-दो महीने में कश्मीर के कोई नामलेवा नहीं बचते। कुछ ऐसा ही नोटों के साथ हो सकता था, और हो सकता है कि केन्द्र सरकार ने नोटबंदी की तकलीफ की जिंदगी कुछ हफ्तों की ही आंकी हो, लेकिन यह मामला लंबा चलते दिख रहा है। 
बहुत से लोगों का यह भी मानना रहता है कि राजनीतिक पार्टियां या सरकारें इस तैयारी में रहती हैं कि उनके लिए किसी बड़ी दिक्कत या असुविधा की कोई खबर अचानक आ जाने पर मीडिया के पहले पन्ने से, या टीवी के प्राईम टाईम से उसे पीछे हटाने के लिए कौन सी खबर झोंकी जा सकती है। हो सकता है ऐसा होता भी हो, और हमारे पास ऐसे कोई सुबूत तो हैं नहीं कि मीडिया को परोक्ष रूप से इस तरह मोड़ देने का काम कोई करते हों, लेकिन बहुत से लोगों का यह मानना है कि ऐसा नियमित रूप से होते ही रहता है। लोगों को याद होगा कि जब उपप्रधानमंत्री देवीलाल ने प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह से बगावत करके जब किसान रैली का आयोजन किया था, और वे खबरों में छा गए थे, ऐन उसी समय वी.पी. सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट जारी की थी। मीडिया का कोई-कोई हिस्सा भी ऐसा होता है जो कि किसी सरकार या पार्टी की मदद करने के लिए ऐसी गढ़ी गई घटना, या थोपी हुई खबर को आगे बढ़ाकर खबरों को मोड़ देने का काम करता है। 
अब इस बात पर चर्चा का कुल मकसद इतना ही है कि पाठकों को यह अंदाज रहे कि उनके सामने खबरों और घटनाओं का, समाचारों और विचारों का जो सैलाब आता है, वह समंदर के कुदरती सैलाब की तरह न होकर कई बार मानवनिर्मित, गढ़ा हुआ सैलाब भी रहता है। और नमकीन समंदरी पानी आंखों में भरकर कुछ वक्त के लिए और कुछ भी दिखाना बंद कर देता है। ये ही ऐसे मौके रहते हैं जब मीडिया के मालिकों के कारोबारी हित एक बड़ी भूमिका निभाते हैं। बहुत से ऐसे मीडिया-कारोबार हैं जहां मीडिया वाला हिस्सा कारोबारी के बाकी हिस्से के मुकाबले पासंग भी नहीं बैठता, यानी एक फीसदी भी नहीं रहता। ऐसे में जाहिर है कि कारोबार के बाकी हित मीडिया के समाचार-विचार पर तो हावी होते ही हैं, वे पाठकों या दर्शकों को झांसा देने के काम में राजनीतिक या सरकारी साजिश के पूरे हिस्सेदार हो जाते हैं। दुनिया में जगह-जगह इसीलिए इस बात को बेहतर माना जाता है कि मीडिया कारोबार के साथ दूसरे कारोबार जुड़े हुए न रहें, लेकिन उदार अर्थव्यवस्था में ऐसी रोकटोक मुमकिन नहीं होती, और कुख्यात अंतरराष्ट्रीय, बहुराष्ट्रीय मीडिया मालिक रूपर्ट मर्डोक के तौर-तरीकों के चलते हुए पश्चिम की सुधारवादी जुबान में मर्डोकीकरण, या मर्डोकाइजेशन जैसा एक शब्द सामने आया है। अब गाली देने के लिए पश्चिम की किसी मिसाल के बिना काम न चले, ऐसा भी नहीं है, खुद भारत के भीतर मीडिया के बहुत से बड़े-बड़े कारोबारी राजनीति, सरकार, और साजिशों में बड़े खिलाड़ी की हैसियत से शामिल होते हैं। और ऐसे ही लोग इस बात में भी मददगार होते हैं कि कब किन घटनाओं को धकेलकर दर्शक-पाठक की आंखों से परे कर दिया जाए, कब झूठे सर्वे से एक भ्रमजाल गढ़कर पेश कर दिया जाए। और जब तक भारत के दर्शक या पाठक रियायती अखबार या रियायती चैनल के मोह में पड़े रहेंगे, उन्हें महज परोसे गए सच को पूरा सच मानने के अलावा और कोई हक हासिल नहीं होगा।

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