अगर कांग्रेस राहुल से परे सोच नहीं सकती, तो...

संपादकीय
8 नवम्बर 2016  
कांग्रेस कार्यसमिति ने कल सोनिया गांधी की गैरमौजूदगी में यह तय किया कि अब वे पार्टी की कमान अपने बेटे राहुल गांधी को सौंप दें। हिंदुस्तान की राजनीति में यह सबसे ही कम रहस्य की बात थी कि राहुल गांधी इस पार्टी के अध्यक्ष बनेंगे। और इसके साथ ही मोटे तौर पर ऐसा लगता है कि अगले कई राज्यों के चुनावों और देश के अगले आम चुनाव, इन सबमें कांग्रेस का भविष्य भी तय हो गया है। पूरी तरह से दरबारी चाटुकारिता वाली यह पार्टी एक कुनबे से परे देखना भूल चुकी है। और कुछ वक्त पहले जब नरसिंह राव के दौर में पार्टी और सरकार इस कुनबे के कब्जे से बाहर रहीं, तो उसके तुरंत बाद तमाम दरबारी जाकर फिर सोनिया गांधी के इर्दगिर्द लेट गए, और उन्हें मनाकर पार्टी का मुखिया बना दिया। सोनिया ने पार्टी को दो बार चुनावी जीत दिलवाई, और तमाम खामियों के बावजूद अपनी पार्टी के एक बेहतर नेता मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। उस वक्त सोनिया ने कांग्रेस संसदीय दल द्वारा उन्हें प्रधानमंत्री चुन लेने के बावजूद मनमोहन को जिम्मा दिया, और वह बड़ी समझदारी की बात थी। लेकिन आज ऐसी एक दूसरी समझदारी हो सकती है कि अगर राहुल गांधी से परे देखा जाता, और किसी दूसरे कांग्रेस नेता को पार्टी को जिंदा करने का मौका दिया जाता। पिछले दस से अधिक बरस में राहुल गांधी यह साबित कर चुके हैं कि वे किसी लीडरशिप के लायक नहीं हैं, और उनकी क्षमता की अपनी सीमाएं हैं। ऐसे में उन्हीं के कंधों पर पार्टी के पूरे भविष्य को लादकर कांग्रेसी-दरबारी न तो राहुल के साथ इंसाफ कर रहे हैं, और न ही कांग्रेस के साथ। हमारी फिक्र इससे कुछ और बढ़कर भी है कि कांग्रेस अगर विपक्ष में भी हाफ सेंचुरी से नीचे की पार्टी रहेगी, तो देश में लोकतंत्र का संतुलन पूरी तरह तबाह रहेगा। पिछले आम चुनाव में कांग्रेस की सांसद-संख्या 44 पर सिमट चुकी है।
दरअसल किसी एक कुनबे पर या किसी एक नेता पर टिकी हुई पार्टी का भविष्य तभी तक रहता है जब तक पार्टी की अगली पीढ़ी या वैसे अकेले नेता का करिश्मा कायम रहे। बाल ठाकरे के जाने के बाद बाकी लोगों का वैसा करिश्मा नहीं रहा, लेकिन दूसरी तरफ अखिलेश यादव हो सकता है कि मुलायम के मुकाबले भी अधिक करिश्मे वाले साबित हों। राहुल गांधी की शक्ल में कांग्रेस को नेहरू-गांधी कुनबे का एक ऐसा नेता मिल सकता था जो कि पूरी पार्टी को एक रख सके। पार्टी के बाकी नेता एक दूसरे की लीडरशिप के तहत काम करने को शायद तैयार न हों, और यही बात सोनिया या राहुल के मातहत सबको जोड़कर रख सकती है। लेकिन देश के संसदीय चुनाव कांग्रेस के भीतर नहीं होते, वे देश में मतदाताओं के बीच होते हैं, और वहां पर राहुल गांधी पूरी तरह, और बुरी तरह बेअसर हैं। अगर कांग्रेस राहुल से परे सोच नहीं सकती, तो जनता भी कांग्रेस के बारे में क्यों सोचेगी?

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