नोटों के रंग बदलना गिरगिट के रंग बदलने जैसा होकर न रह जाए

संपादकीय
9 नवम्बर 2016  
कल रात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिन्दुस्तानी मीडिया में हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रम्प को खो कर दिया। उन्हें खबरों से ऐसा बाहर धकेला कि लोग अपने घर और जेब में पांच सौ और हजार के नोट गिनने में लग गए, और अगले दिन कैसे इसका निपटारा किया जाएगा यह सोचने में लग गए। नोटों को इस तरह एकाएक बंद करना एक बड़ा फैसला है, और यह फैसला अपने किस्म का देश का पहला फैसला न होते हुए भी आज की एक बड़ी विकसित भारतीय अर्थव्यवस्था में तूफान खड़ा करने वाला जरूर है। इन नोटों की जगह सरकार नए नोट छाप चुकी है और बैंकों में पहुंचा भी चुकी है। इसलिए दो-तीन दिनों की जनता की दिक्कत मानवीय तकलीफ की खबरें तो बनेंगी लेकिन देश की अर्थव्यवस्था से कालेधन को घटाने की एक कोशिश को एक मौका भी देगी। दो दिनों में देश में नए नोट प्रचलन में आ जाएंगे, और अगले डेढ़ महीने में तमाम छोटे और गरीब लोगों की दिक्कतें दूर हो चुकी रहेंगी, ये अपने मौजूदा हजार-पांच सौ के नोट बदल चुके होंगे। इसके बाद दिक्कतें केवल उनकी बचेंगी तो बचेंगी, जिन्होंने बड़ा कालाधन जमा कर रखा है, हालांकि उनकी दिक्कतों का भी अधिक खतरा दिखता नहीं है।
इन नोटों को दो वजहों से बदला गया है। एक तो यह कि आतंक से लेकर तस्करी तक, तरह-तरह के जुर्म से लेकर टैक्स चोरी तक, और भ्रष्टाचार से लेकर कालेधंधे तक, हर कहीं इन बड़े नोटों से ही लेन-देन चलता था, और अब इसे एक झटका लगेगा क्योंकि इतनी रकम को काले से सफेद करना थोड़ा सा मुश्किल होगा। इसकी एक दूसरी वजह यह है कि इन्हीं दोनों नोटों में लगातार नकली नोट बढ़ते जा रहे थे, और उनसे छुटकारा मुश्किल पड़ रहा था। अब उम्मीद की जाती है कि नए नोट ऐसी तकनीक के होंगे कि उनकी नकल करना आसान नहीं रहेगा। एक तीसरी बात बड़ी रकम के नोटों को बंद करने के पीछे यह रहती है कि कालेधन को ढोकर ले जाने में बड़े नोट सहूलियत देते हैं, और यह बात पूरी दुनिया में मानी जाती है। योरप में भी अभी पांच सौ यूरो के नोट को बंद करके बस दो सौ यूरो तक का नोट रखा जा रहा है। ऐसा कई जगहों पर हुआ है और इससे आतंक, जुर्म और समानांतर अर्थव्यवस्था को झटका लगता है। लेकिन भारत के संदर्भ में यह बात याद रखना जरूरी है कि यहां कालाधन कभी भी कम नहीं रहा है। अमरीका या योरप में, जहां पर कि तकरीबन सारी अर्थव्यवस्था बैंकों के माध्यम से चलती है, वहां पर नगदी के बड़े नोट अधिक मायने रखते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था तो हमेशा से नगदी पर चलती समानांतर अर्थव्यवस्था से लदी रही है, इसलिए इस तात्कालिक झटके के बाद हो सकता है कि दो महीनों के भीतर ही सारे कालेधंधे नए नोटों से होने लगें, और आने वाले चुनावों में नए नोट उसी तरह काम आएं जिस तरह अब तक आते रहे हैं।
भारत में कारोबार और काले-सफेद धन की दुनिया में एंट्री लेना एक बड़ा प्रचलित शब्द है जिसमें लोग दूसरों के खातों में अपना कालाधन डालकर उनसे सफेद धन अपने खाते में ले लेते हैं। अभी हमें केन्द्र सरकार के फैसले को लेकर यह शक है कि भारतीय बाजार और कारोबार अपने इस पुराने तरीके को फिर इस्तेमाल कर लेगा, और देश में हाल ही में खुले दसियों करोड़ जनधन खातों का इस्तेमाल, कर्मचारियों के खातों का इस्तेमाल करके पूरे ही कालेधन को सफेद बना लिया जाएगा, और सरकार की इतनी पूरी मशक्कत बेकार जाएगी। हमारा यह पुख्ता अंदाज है कि हफ्ते भर के भीतर देश भर में करेंसी एजेंट उग आएंगे, जो कि कुछ फीसदी कमीशन लेकर पुराने नोटों को नए नोटों में तब्दील करने का धंधा करने लगेंगे, और ऐसे एजेंटों के कर्मचारी बड़े संगठित रूप से करोड़ों जनधन खाता धारकों का इस्तेमाल करने लगेंगे। आज भी भारत में बैंकों के मुकाबले हवाला कारोबार इतना पनपा हुआ है कि बैंकों से रकम जितनी देर में दूसरे शहर पहुंचती है, उससे जल्दी दो नंबर की हवाला रकम पहुंच जाती है। और सरकार इस खुले कारोबार पर आज तक रोक लगा नहीं पाई है, और देश का एक भी ऐसा कारोबारी शहर नहीं है जहां से जितनी चाहे उतनी रकम हवाला न की जा सके। इसलिए महज नियम काफी नहीं होते, उन पर अमल पर सब कुछ टिका होता है। देखना है कि सरकार ने ऐसे खतरों की काट सोच रखी है, या नहीं। फिलहाल मोदी के इस फैसले की आलोचना की कोई वजह नहीं दिखती है, और देश की जनता की कुछ दिनों या कुछ हफ्तों की दिक्कत के बाद अगर नकली नोट, आतंकी कारोबार, जुर्म की दुनिया को झटका लगता है, तो यह अच्छी बात है, लेकिन अगर ये सब संगठित होकर सरकार की इस कोशिश के शिकंजे से बच निकलते हैं, तो फिर यह एक अच्छी लेकिन नाकामयाब कोशिश ही कही जाएगी।
इस पूरे सिलसिले में एक बात यह समझ नहीं आई है कि मोदी सरकार को दो हजार रूपए के नोट जारी करने की क्या जरूरत थी? क्योंकि सरकार ने बीस हजार रूपए से अधिक के नगदी लेन-देन पर रोक लगाई हुई है, खरीदी पर भी तरह-तरह के सुबूत देने की बंदिश लगाई हुई है, ऐसे में हजार रूपए के नोट ही कारोबार के लिए काफी थे, और बड़े नोट बड़ी जल्द ही दो नंबर के धंधों की सहूलियत बन जाएंगे, और सरकारी कोशिश पर हंसने लगेंगे। ऐसा लगता है कि आयकर विभाग ने जितने कालेधन की घोषणा की उम्मीद की थी वह पूरी नहीं हुई है, और नोटों का यह फैसला उसके पहले ही लिया जा चुका था, और कालेधन की घोषणा की तारीख खत्म होने के बाद अब यह दूसरी कोशिश की जा रही है।
सरकार को अपने खुद के कामकाज से भ्रष्टाचार को घटाना होगा। भारत में कालाधन खुद सरकार के धंधों से उपजता है, सरकार चलाने वाले नेताओं के चुनावों से उपजता है, और इसीलिए बाजार के कारोबार में उससे रियायत बरती जाती है, चुनाव के लिए उसे कायम रखा जाता है। आज भी बाजार का यह मानना है कि नेता, अफसर और ठेकेदार के पास ही सबसे अधिक कालाधन रहता है, और यह जनता के हक की कमाई से ही छीना गया पैसा होता है। अगर केन्द्र और राज्य सरकार अपने खुद के भ्रष्टाचार को घटाए, तो देश की अर्थव्यवस्था से कालेधन को वह कड़ाई से दूर कर सकेगी, वरना नोटों के ऐसे रंग बदलना कहीं गिरगिट के रंग बदलने की तरह की एक अस्थायी कार्रवाई होकर न रह जाए।

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