सड़कों पर नियम-कायदे, सरकारी इच्छाशक्ति नहीं

संपादकीय
1 दिसंबर 2016


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से हर कुछ दिनों के बाद पुलिस की तस्वीरें आती हैं कि वह किस तरह बिना हेलमेट वाले दुपहिया चालकों के चालान कर रही है। राहत की बात यही है कि चालान में पुराने नोट भी लिए जा रहे हैं। और तकलीफ की बात यह है कि अखबारों में छत्तीसगढ़ में हर दिन सड़क हादसों में दुपहिया चालकों की मौत की खबर छपती है, तस्वीरें छपती है, लेकिन लोग सबक नहीं लेते हैं। और जितने का चालान पटाना पड़ता है, उतने में हेलमेट आ सकता है, लेकिन लोगों को ऐसा लगता है कि हेलमेट का नियम पुलिस के फायदे के लिए बना है, और उनका अपना कोई फायदा इससे नहीं है। इससे एक बात यह तो साबित होती है कि ऐसे सिर के भीतर इन लोगों के पास दिमाग की कुछ कमी है, लेकिन ऐसे कमदिमाग लोगों की भी हिफाजत करना समाज की जिम्मेदारी है।
राज्य सरकार पिछले कई बरस से लगातार यह नियम तोडऩे वालों के साथ खासी रियायत बरतते आ रही है, और अगर सालभर ऐसा ही और निकला तो चुनाव के बरस में किसी पर कोई कार्रवाई हो भी नहीं पाएगी। इसलिए सरकार को दिल कड़ा करके लोगों को उनकी हिफाजत सिखानी ही होगी, और जो लोग सुधरने को तैयार नहीं हैं, उन्हें जुर्माने के साथ-साथ दूसरी दिक्कतें भी झेलने की नौबत खड़ी करनी चाहिए, क्योंकि सड़कों पर जो लोग एक नियम तोड़ते हैं, वे ही लोग कई और नियम भी तोड़ते हैं, और कुल मिलाकर वे दूसरों की जान के लिए भी खतरा बन जाते हैं।
भारत के ही बड़े शहरों में ऐसे नियम है कि ट्रैफिक के नियम तोडऩे वाले लोगों के ड्राइविंग लाइसेंस पर पुलिस एक छेद बना देती है, और जब ऐसे तीन छेद बन जाते हैं, तो कई महीनों के लिए उनका लाइसेंस सस्पेंड हो जाता है। छत्तीसगढ़ में अगर प्रदेश को सभ्य और सुरक्षित बनाना है, तो कानून तोडऩे वालों के साथ कोई रियायत इसलिए ठीक नहीं है कि ऐसे लोगों को छूट देकर बाकी जनता की जिंदगी पर खतरा खड़े करने का हक सरकार को भी नहीं है। जो लोग कारों में सीट बेल्ट लगाकर नहीं बैठते हैं, जो लोग तरह-तरह की लाइटें और हॉर्न लगाते हैं, जो लोग नंबर प्लेट आड़ी-तिरछी लिखवाते हैं, या तेज रफ्तार से गाडिय़ां चलाते हैं, ऐसे लोगों के लाइसेंस रद्द करना, बार-बार ऐसा करने पर इन गाडिय़ों के रजिस्ट्रेशन रद्द करना, या गाडिय़ों को राजसात करना, कानून के तहत जो-जो हो सकता है, वह सब करना चाहिए।
आज छत्तीसगढ़ में पुलिस का मनोबल इस कदर टूटा हुआ है कि वह किसी भी गाड़ी पर राजनीति का झंडा-स्टिकर देखकर, या प्रेस लिखा हुआ देखकर चुप रह जाती है। कोई कार्रवाई करने के पहले यह सोचने लगती है कि ऐसे लोगों को बचाने के लिए किन नेताओं, अफसरों, या पत्रकारों के फोन आएंगे। हम जब इतिहास के किस्से-कहानियों में पढ़ते हैं कि दिल्ली में एक ऐसी पुुलिस कमिश्नर किरन बेदी हुआ करती थी जिसने इंदिरा गांधी की कार का भी चालान कर लिया था, या कि क्रेन से उसे उठवा लिया था, तो लगता है कि वह एक अलग युग की बात थी, एक अलग देश की बात थी, और वह एक अलग पुलिस की बात थी, और आज छत्तीसगढ़ में इनमें से कोई भी बात लागू नहीं होती है।
हमारा मानना है कि किसी भी प्रदेश में वहां की राजधानी से बेहतर हालात बाकी प्रदेश के नहीं हो सकते। चाहे वह सरकारी कामकाज हो, सड़कें हों, या कि ट्रैफिक हो। और छत्तीसगढ़ में अगर राजधानी को एक मिसाल और मॉडल बनाकर चीजों को नहीं सुधारा जा सकता, तो बाकी प्रदेश को लेकर कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। यही वजह है कि पूरे प्रदेश में हर दिन सड़क हादसों में कई मौतें होती हैं, और जो मरने से बच जाते हैं, उनके तो आंकड़े भी सामने नहीं आ पाते। इसलिए सरकार को अपने अफसरों को नियम-कायदे लागू करने के लिए खुली छूट देनी चाहिए, और इसकी कामयाबी से उनका भविष्य भी तय होना चाहिए। हम यह नहीं मानते कि ऐसे नियम-कायदे तोडऩे वालों से सरकार का कोई भला होता है, लेकिन इतना तो है ही कि सरकार की इच्छाशक्ति का अकाल दिखता है, और सरकार को अपनी खुद की हिचक से उबरना चाहिए।

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