डिजिटल तकनीक इस्तेमाल में सावधानी सिखाना जरूरी

संपादकीय
10 दिसंबर 2016


एक खबर है जिसकी सच्चाई परखना अभी बाकी है, लेकिन वह खतरनाक है और हिन्दुस्तान के डिजिटल-राह पर बढऩे में एक बड़ा रोड़ा और खतरा साबित हो सकती है। एक किसी छोटे दुकानदार ने पेटीएम से भुगतान लेना शुरू किया, और जब उसने अपने बैंक खाते में रकम डालने की कोशिश की, तो साढ़े 17 लाख रूपए की रकम गायब हो गई। ऐसी चार घटनाएं, और उसकी चार लाख जगहों पर पढ़ी गई खबरों से हो सकता है कि लोग कैशलेस होने का इरादा छोड़ दें। आज भी रात-दिन ये खबरें आती हैं कि किस तरह किसी के एटीएम कार्ड से जालसाजी हो गई, और उसकी जिंदगी भर की जमा पूंजी लुट गई। जब लोगों के बीच साक्षरता और जागरूकता की तैयारी डिजिटल होने की नहीं है, तब आंधी-तूफान की रफ्तार से डिजिटलीकरण के खतरे कम नहीं हैं। और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में ही जहां मुख्यमंत्री ने यह तय किया है कि कुछ महीनों में ही दस लाख लोगों को डिजिटल लेन-देन के हिसाब से तैयार किया जाएगा, तो ऐसी कई तरह की ठगी के बारे में भी सोचना होगा। और लोगों के घर जाकर नोट लूटकर लाना आसान नहीं होता है, लेकिन ऑनलाईन किसी की भी जानकारी को हासिल करना भी आसान है, और उसे लूट लेना भी आसान है। दो दिन पहले ही इस मुद्दे पर हमने यह लिखा है कि केन्द्र सरकार को एक ऐसी योजना लानी चाहिए कि कैशलेस और डिजिटल लेन-देन में जो लोग ठगी या जुर्म के शिकार होते हैं, उनकी भरपाई करने के लिए एक बीमा योजना लाई जाए, उसके बिना यह पूरा सिलसिला जनता के हितों के खिलाफ जाएगा।
आज छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में साइबर जुर्म से निपटने के लिए पुलिस भी तैयार नहीं है, और साइबर अपराध दर्ज तो हो जाते हैं, लेकिन मुजरिमों तक पहुंचकर लूट को वापिस लाने के मामले बहुत कम हैं। इसलिए आज जब सरकार लोगों के डिजिटल-शिक्षण के काम को युद्धस्तर पर शुरू कर रही है, तो पहले से ही लोगों को सावधानी सिखाना जरूरी है, और ऐसा सिखाने वाले लोगों को भी पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियों से प्रशिक्षण दिलवाना जरूरी है, ताकि पहले वे खुद समझें, और फिर प्लास्टिक इस्तेमाल करने वाले, फोन से भुगतान करने वाले लोगों को समझा सकें। यह काम आसान नहीं होगा, क्योंकि चारों तरफ फैले हुए छोटे-छोटे दुकानदारों और छोटे-छोटे ग्राहकों को संगठित रूप से सिखाने का मौका भी आसान नहीं होगा। और आज जब बाजार पूरी तरह चौपट है, तो ऐसे में किसी छोटे दुकानदार को प्रशिक्षण के लिए किसी जगह बुलाना भी उसके जख्मों पर नमक छिड़कने की तरह का होगा। इसलिए सरकार को अखबार, टीवी, और सीधे जनसंपर्क से भी लोगों को जुर्म से सावधान रहने का प्रशिक्षण देना पड़ेगा। आज तो जो बुजुर्ग लोग हैं, वे भी अपने बचपन से पहले सिक्के, और फिर नोट देखते और इस्तेमाल करते आए हैं। और इसलिए वे इसमें धोखे से आमतौर पर बचना जानते हैं। लेकिन हम अखबारों में जब साइबर धोखाधड़ी की खबरें पढ़ते हैं, तो दिखता है कि बहुत पढ़े-लिखे और पेशेवर, परिपक्व और कामयाब लोग भी ठगी के शिकार हो रहे हैं। इसलिए आज जब लोगों को मोबाइल बैंकिंग, क्रेडिट और डेबिट कार्ड, फोन से भुगतान जैसे कई चीजों की तरफ मोड़ा जा रहा है, तो ऐसी तमाम सावधानी बहुत जरूरी है क्योंकि लोगों का भरोसा इस नई तकनीक पर अगर बैठ नहीं पाया, तो इसका इस्तेमाल कामयाब भी नहीं होगा, और लोग सुरक्षित भी नहीं रहेंगे। 

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