बातचीत की ताकत को कम नहीं आंकना चाहिए...

संपादकीय
11 दिसंबर 2016


इन दिनों खबरों में सबसे पीछे है कश्मीर। बर्फबारी की तरह कश्मीर कभी खबरों पर बरसता है, और फिर कई महीनों के लिए आंखों से दूर हो जाता है कि मानो वह मौजूद ही न हो। आज वहां से जरा सी खबर आई है कि यशवंत सिन्हा की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल फिर तमाम लोगों से बात करने गया है ताकि वहां अमन-चैन कायम करने और बनाए रखने का कोई रास्ता ढूंढा जाए। इस प्रतिनिधिमंडल को केन्द्र सरकार की कोई मान्यता नहीं है, और न ही किसी राजनीतिक दल ने इन्हें यह जिम्मा दिया है, लेकिन दुनिया का इतिहास बताता है कि औपचारिक और अधिकृत प्रतिनिधिमंडलों के मुकाबले कई बार ऐसी अनौपचारिक कोशिशें अधिक असर डालती हैं, और कोई रास्ता निकलता है।
हम दरअसल आज इसी एक मामले को लेकर नहीं लिख रहे हैं, बल्कि बातचीत की सारी अहमियत पर चर्चा करना चाहते हैं। यह बातचीत भारत और पाकिस्तान के बीच भी हो सकती है, दिल्ली और श्रीनगर के अलगाववादियों के बीच भी हो सकती है, और छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार और नक्सलियों के बीच भी हो सकती है। अभी एक-दो बरस पहले जब भारत के एक बुजुर्ग पत्रकार वेदप्रकाश वैदिक अपनी निजी कोशिश से पाकिस्तान जाकर वहां हाफिज सईद से मिलकर बात करके आए थे, तो बहुत से लोगों ने यह सवाल उठाया था कि उनको ऐसा करने का हक किसने दिया था। इसी तरह भारत के भीतर भी कभी-कभी कुछ लोग नक्सलियों से बातचीत करके कुछ रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं और ऐसे लोगों को केन्द्र या किसी राज्य की तरफ से ऐसा करने के लिए कहा नहीं गया रहता है, लेकिन सामाजिक जवाबदेही के तहत बहुत से लोगों को लगता है कि हिंसा या जुर्म के खिलाफ अगर कोई रास्ता निकल सकता है, तो उसकी कोशिश की जानी चाहिए। दुनिया भर में बहुत से जनसंगठन, सामाजिक आंदोलन इसी तरह की मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं, और उनकी वजह से बहुत से रास्ते भी निकलते हैं।
ऐसी तमाम बातचीत, चाहे वह भाईयों के बीच जायदाद के बंटवारे का झगड़ा हो, या किसी कारोबार के भागीदारों के बीच का विवाद हो, दो देश, दो प्रदेश, या दो विचारधाराओं के बीच का तनाव हो, ऐसे तमाम मामलों में बातचीत का सिलसिला कभी भी खत्म नहीं करना चाहिए, चाहे दोनों तरफ से गोलियां ही क्यों न चल रही हों, चाहे दोनों तरफ से आतंकी हमले ही क्यों न हो रहे हों। किसी भी सरकार को किसी हमले के खिलाफ पुलिस या फौजी कार्रवाई करने का पूरा हक रहता है, लेकिन ऐसी कार्रवाई से परे बातचीत का सिलसिला जारी रखना चाहिए। जब कभी बातचीत के पहले कोई शर्त जोड़ दी जाती है, तो उससे एक संभावना खत्म हो जाती है। इसका एक और पहलू यह है कि जब दो देशों के बीच सरहद पर तनाव होता है, तो एक-दूसरे की फिल्मों, कलाकारों, खिलाडिय़ों और मैचों पर रोक लगाकर अमन की गुंजाइश को कम ही किया जाता है।
आज अगर यशवंत सिन्हा भाजपा के भीतर भी भाजपा लीडरशिप और प्रधानमंत्री मोदी के काम के तरीकों के आलोचक हैं, तो भी उनकी इस पहल को महत्व देने की जरूरत है और कश्मीर में अमन की वापिसी का रास्ता इसी तरह की गैरसरकारी पहल से निकल पाएगा। आज कोई अगर यह माने कि कश्मीर के अलगाववादियों से कोई बात नहीं की जाएगी, और इसी शर्त पर वहां के बाकी लोगों से बात की जाएगी, तो यह कोई समाधान नहीं हो सकेगा। बात खुले दिल से, खुले दिमाग से, खुली बाहों से गले लगाने की तैयारी से, और बिना किसी शर्त के होना चाहिए, और ऐसी बातचीत ही वो समाधान निकाल सकती है जो कि फौजी बंदूकें नहीं निकाल सकतीं। हम बार-बार छत्तीसगढ़ जैसे उन राज्यों को भी यही सलाह देते आए हैं जो कि नक्सल हिंसा के शिकार हैं। इन सरकारों को भी नक्सलियों से बिना किसी शर्त के बातचीत करनी चाहिए, और ऐसी बातचीत के साथ-साथ सरकार जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए पुलिस कार्रवाई जारी भी रख सकती है। बातचीत का ही नतीजा था कि अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए अर्जुन सिंह ने चंबल के डकैतों का आत्मसमर्पण करवाया था, और उस वक्त जो डकैत चंबल के बीहड़ों में पुलिस से अधिक बड़ी ताकत रखते थे, वे आज नोट बदलवाने एटीएम की कतार में लगे हुए दिख रहे थे। इसलिए बातचीत की ताकत को कम नहीं आंकना चाहिए। 

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