आने वाले चुनाव में ऐसे सारे लुटेरों के हाथ नोट रहें न रहें, एक-एक वोट जरूर रहेंगे

संपादकीय
13 दिसंबर 2016


कर्नाटक में रिजर्व बैंक के एक अफसर को भारत सरकार की जांच एजेंसी ने गिरफ्तार किया है क्योंकि वह नोटों की बदली के धंधे में लगा हुआ था। कई और जगहों पर बैंकों का ऐसा काम पकड़ में आ रहा है, और छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में यह सुनाई पड़ रहा है कि किस तरह सरकारी कामकाज में मजदूरी और दूसरे भुगतान में पुराने नोटों का इस्तेमाल करके उन्हें नए भुगतान की तरह दिखाया जा रहा है, और नए नोट बचा लिए जा रहे हैं। हम पिछले महीने भर में नोटबंदी को लेकर केन्द्र सरकार की नीयत से लेकर गरीब जनता की नियति तक हर पहलू पर बहुत कुछ लिख चुके हैं, लेकिन पिछले दो-चार दिनों में बैंकों की जो धांधली सामने आई है, वह बताती है कि इस देश में सरकार या सार्वजनिक क्षेत्र, या स्थानीय संस्थाओं के अफसरों और कर्मचारियों के भरोसे इतने बड़े पैमाने का ऐसा कोई काम ईमानदारी से होना मुमकिन ही नहीं था, जितना बड़ा काम नोटबंदी है। नतीजा यह हुआ है कि कालेधन वाले सारे के सारे लोग दस-बीस फीसदी नोटों के नुकसान के बाद नए नोट पाकर राहत में हैं, और गरीब लोग कतारों में मर रहे हैं, या आत्महत्याएं कर रहे हैं। इन दोनों किस्म की मौतों के आंकड़े तो खबरों में आ जाते हैं, लेकिन नोटबंदी से जुड़ी हुई बाकी मौतों, तकलीफों, और दूसरे नुकसानों की खबरें आंकड़ों में नहीं आती हैं, और इसका नुकसान कभी भी सरकारी अनुमानों में देखने नहीं मिलेगा।
लेकिन आज भारत के लोगों के ईमानदारी के लिए नजरिए पर बात करने का मौका है। जिस तरह इस देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा किसी भी साफ-सुथरी जगह को देखकर तुरंत ही थूकने या मूतने लगता है कि कोई जगह इस देश में साफ-सुथरी रह न जाए, उसी तरह ईमानदारी की कोई चुनौती सामने खड़ी करने पर हिन्दुस्तानी लोग एकदम कमर कसकर बेईमानी पर उतारू हो जाते हैं कि कहीं उनकी राष्ट्रीय-पहचान पर किसी को शक न हो जाए। जब रात-दिन टीवी चैनल और अखबार बैंक-एटीएम की कतारों में खड़े बेबस, बीमार, बूढ़े, और रोते-बिलखते लोगों की तस्वीरें दिखा रहे हैं, उनके बयान सुना रहे हैं, तो उस बीच भी इस तरह से कमाने के लिए बेईमानी और भ्रष्टाचार करना हिन्दुस्तान का आम चरित्र है, और इसीलिए दुनिया की जितनी वित्तीय संस्थाएं दुनिया भर में भ्रष्टाचार की लिस्ट बनाती हैं, तो उनमें भारत बहुत ऊपर रहता है।
कुछ लोगों को यह लगता है कि दो बरस पहले तक देश में यूपीए की सरकार थी, और यूपीए की भागीदार पार्टियां भ्रष्टाचार में लगी हुई थीं, और आज उनको यह दिखता है कि देश में जहां-जहां नए नोटों का जखीरा पकड़ा रहा है, जहां-जहां किसी नेता के घर करोड़ों-अरबों के खर्च से शादियां हो रही हैं, तो ऐसे सारे लोग भाजपा से जुड़े हुए हैं। लेकिन हकीकत यह है कि वामपंथी दलों के गिने-चुने लोगों को अगर छोड़ दें, तो बाकी पार्टियों में बेईमानी के पैमाने पर कोई बहुत बड़ा फर्क आपस में दिखता नहीं है। छपी हुई खबरों से परे हवा में तैरती हुई बातों को सुना जाए, तो नेता, अफसर, और कारोबारी एक साथ मिलकर, बैंक और दलालों को साथ लेकर अपने कालेधन के नोटों को बदलने में पूरी तरह कामयाब हो गए हैं। आज पूरे देश से नोटबंदी के बाद एक खबर भी ऐसी नहीं आई है कि किसी करोड़पति-अरबपति ने किसी गगनचुंबी इमारत से छलांग लगाई हो, या नुकसान के डर से खुदकुशी कर ली हो। मरने वाले सारे के सारे लोग गरीब हैं, और वे रोजगार खो रहे हैं, सरकार, देश, और अपने आप पर भरोसा खो रहे हैं, और तकलीफ पा रहे हैं। यह एक अलग बात है कि चुनाव के करीब खड़े उत्तरप्रदेश में भाजपा की परिवर्तन यात्रा लेकर पहुंचीं भाजपा की केन्द्रीय मंत्री कृष्णाराज ने अभी सार्वजनिक रूप से कहा है- बैंकों की लाईन में उन्हीं लोगों की मौत हो रही है, जो देश को लूट रहे थे।
आने वाले चुनाव में ऐसे सारे लुटेरों के हाथ नोट रहें न रहें, एक-एक वोट जरूर रहेंगे। 

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