नई पीढ़ी पर अपनी इच्छाओं को थोपते हिंदुस्तानी मां-बाप

संपादकीय
14 दिसंबर 2016


जबलपुर से एक खबर है कि टीवी सीरियल क्राईम पेट्रोल में काम करने वाले एक अभिनेता कमलेश पाण्डेय ने अपने-आपको गोली मार ली। कुछ अखबारों का कहना है कि वे इस बात से नाखुश थे कि उनके साढू की बेटी ने अपनी मर्जी से शादी कर ली थी। बात थोड़ी अटपटी है क्योंकि पत्नी की भांजी अगर अपनी मर्जी से शादी करे तो उसमें किसी का इतना विचलित होना अजीब है, लेकिन हिंदुस्तान इसी तरह का देश है, और आए दिन कहीं पे्रमी जोड़े पेड़ों पर साथ टंगे मिलते हैं, तो कहीं पर बेटी के पे्रमी के पूरे कुनबे को मारकर उसके पिता और भाई फूले नहीं समाते हैं, और ऐसी शान दिखाने के बाद फिर वे चाहे पूरी जिंदगी जेल ही क्यों न चले जाएं। यह देश अपने इतिहास और संस्कृति में तो श्रृंगार रस और पे्रम से भरा हुआ रहा है, लेकिन आज वर्तमान को पे्रम से पूरी तरह अलग रखने के लिए एक अजीब किस्म का माहौल इस समाज में बना दिया गया है। अब इसमें भारत की जाति व्यवस्था, और भारत के धार्मिक टकराव की बात और जुड़ जाती है, और जो जोड़े आत्महत्या नहीं भी कर पाते हैं, वे लगातार एक तनाव और कुंठा के बीच जीने को मजबूर रहते हैं।
फिर आत्महत्या और हत्या के आंकड़े तो खबरों में आ जाते हैं उनसे परे जो लोग घुट-घुटकर जीते हैं, उनकी जानकारी न पुलिस की रिपोर्ट में आती, और न ही यह पता लगता कि उनकी ऐसी हालत की वजह से देश की उत्पादकता पर क्या फर्क पड़ा है। हकीकत यह है कि दुनिया के जो देश अपनी निजी पसंद को लेकर सबसे अधिक आजादी पाते हैं, और देते हैं, वहीं के लोग सबसे अधिक कामयाब भी होते हैं, और वे ही लोग सबसे आगे भी बढ़ते हैं। आज जब हिंदुस्तान के लोग भी अंतरिक्ष में जाकर लौट रहे हैं, तब भी यह देश पुराने पाखंड को ढोकर अपनी नई पीढ़ी को खत्म करने में एक अलग किस्म का आत्मगौरव पाता है।
हिंदुस्तान में मां-बाप को अपनी पसंद बच्चों पर थोपना बहुत अच्छा लगता है। जो बच्चे वोट देने की उम्र के हो जाते हैं, उनके लिए भी कपड़े पसंद करने को भी मां-बाप साथ चले जाते हैं। स्कूल के बाद कॉलेज के विषय तय करने की आजादी मां-बाप बच्चों को नहीं देते हैं, और ऐसे अनगिनत मामले रहते हैं जिनमें मां-बाप अपनी जिंदगी में अपूरित रह गई अपनी इच्छाओं को अपने बच्चों पर लादकर उन्हें उनकी मर्जी के खिलाफ डॉक्टर-इंजीनियर जैसा कुछ बनाने में जुटे रहते हैं। नाकामयाबी को ढोते हुए ऐसे बच्चे कभी-कभी खुदकुशी भी कर लेते हैं। जो बच्चे नोट कमाने लगते हैं, उनको भी अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने की आजादी नहीं रहती है।
अपनी अगली पीढ़ी को अपने काबू में रखने और रखे रहने की यह हसरत एक किस्म की दिमागी बीमारी है जो कि मां-बाप को इसी में राहत देती है कि उनके बच्चे उनके काबू के बाहर नहीं हैं। इस सिलसिले से जब तक यह देश उबरेगा नहीं, तब तक यह आगे नहीं बढ़ सकता। नई पीढ़ी के दिल-दिमाग से देश की उत्पादकता भी जुड़ी रहती है, और तरह-तरह की सामाजिक बातें भी। अपनी इच्छाओं को थोपना खत्म होना चाहिए।

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