मोदी पर भ्रष्टाचार के आरोप, तर्कसंगत और न्यायसंगत अंत तक लेकर जाएं राहुल

संपादकीय
15 दिसंबर 2016


राहुल गांधी ने कल एक बड़ा वजनदार बयान दिया कि उनके पास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निजी भ्रष्टाचार के सुबूत हैं, और इसीलिए उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया जा रहा है। अगर उन्हें संसद में बोलने दिया गया तो मोदी का गुब्बारा फूट जाएगा। यह कांग्रेस के सबसे बड़े नेता का अब तक का लगाया हुआ सबसे बड़ा आरोप है। और सोनिया गांधी के बाद कांग्रेस पार्टी का मालिकाना हक जिस तरह राहुल को मिलने की घोषणा हो चुकी है, उससे उनकी बात को हम बहुत गंभीरता से नीचे लेना भी नहीं चाहते हैं। भारत के प्रधानमंत्री के निजी भ्रष्टाचार के सुबूत किसी के पास हैं, तो वे सुबूत न महज संसद में सामने आने चाहिए, बल्कि संसद के बाहर भी देश के सामने आने चाहिए, और जब ऐसे सुबूत सामने आ जाएं तो न सिर्फ प्रधानमंत्री को जवाबदेह होना चाहिए, बल्कि देश की जांच एजेंसियों को भी खुद होकर उसे परखना चाहिए।
अब जब राहुल गांधी बड़े गंभीर आरोपों का एक बड़ा सा गुब्बारा सामने रख चुके हैं, तो कुछ सवाल खड़े होते हैं। इनमें एक सवाल यह है कि राहुल गांधी संसद के प्रति जवाबदेह हैं, या कि भारत के लोकतंत्र के प्रति जिसका कि संसद महज एक हिस्सा है। लोकतंत्र संसद से बहुत बड़ी होती है, और एक राजनीतिक दल के नेता, देश के नागरिक, जनता के निर्वाचित लोग लोकतंत्र के प्रति अधिक जवाबदेह होते हैं। ऐसे में हर नागरिक की यह जिम्मेदारी होती है कि वे उनकी जानकारी में आए हुए भ्रष्टाचार के मामलों को जांच एजेंसियों को भेजें, या कि अदालत तक जाने की उनकी ताकत हो, तो वे अदालत में जनहित याचिका लगाएं, या कम से कम मीडिया को तो यह जानकारी दे ही दें, ताकि जांच एजेंसियां उस पर कार्रवाई को मजबूर हो जाएं। लोगों को याद होगा कि मनमोहन सरकार के वक्त राहुल गांधी ने दिल्ली प्रेस क्लब में मीडिया के सामने मनमोहन मंत्रिमंडल द्वारा लाया जा रहा एक कानून फाड़कर फेंक दिया था, और यह पूरा मामला मीडिया के सामने एक सोचे-समझे तमाशे की तरह पेश किया गया था। वह तो कांग्रेस और यूपीए का घरेलू मामला था लेकिन अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सचमुच भ्रष्ट हैं, तो यह आरोपों से परे का मामला है और कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, देश के सांसद, राहुल गांधी की यह भी जिम्मेदारी बनती है कि वे बिना देर किए इस मामले का भांडाफोड़ करें। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो यह समझा जाएगा कि वे लोकतंत्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी पूरी नहीं कर रहे हैं, और न ही उनके पास ऐसे कोई सुबूत हैं।
फिर एक दूसरी बात यह भी है कि अगर प्रधानमंत्री को अपने काम पर बहुत भरोसा है, तो उन्हें राहुल गांधी का यह बयान देश की तीनों-चारों बड़ी जांच एजेंसियों को भेज देना चाहिए, और यह मांग करनी चाहिए कि वे राहुल गांधी से मिलकर सुबूत हासिल करें, और उसकी जांच करें। हमारा मानना है कि देश के सर्वोच्च स्तर पर भ्रष्टाचार की बात किसी आम राजनीतिक बयानबाजी की तरह न तो उछाली जानी चाहिए, और न ही अनदेखी की जानी चाहिए। राहुल गांधी ने यह बयान देकर मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने सरीखा काम किया है, और उनको इस सिलसिले को एक न्यायंसगत और तर्कसंगत अंत तक पहुंचाना चाहिए, वरना वे अपना थोड़ा-बहुत मौजूदा वजन भी खो बैठेंगे।

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