न्यायपालिका का इतिहास इसे एक बहुत बड़ी गलती के रूप में दर्ज करेगा

संपादकीय
17 दिसंबर 2016


सुप्रीम कोर्ट ने कल नोटबंदी पर एक आदेश देते हुए देश भर की कई उच्च न्यायालयों में नोटबंदी के खिलाफ लगाई गई याचिकाओं को रोक दिया, और खुद सुप्रीम कोर्ट में इस पर चल रही सुनवाई को पांच जजों वाली संविधान पीठ के हवाले कर दिया। मतलब यह कि अगले कई दिनों में इस पीठ के लिए जज चुने जाएंगे, और फिर वह इस सुनवाई को एक नए सिरे से शुरू करेगी, और ऐसा अंदाज है कि उसका कोई भी आदेश आने में कई हफ्ते या कई महीने लग जाएंगे, और उसका फैसला आने में तो महीनों लगना तय ही है। उसके बाद भी सरकार के पास हो सकता है कि पुनर्विचार याचिका जैसे कोई संवैधानिक विकल्प बाकी रहें, और जनता तक उस फैसले का असर पडऩे में साल भी लग सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह रूख समझ से बिल्कुल ही परे है कि उसने कोई तत्काल राहत नहीं दी है, जबकि बैंक-एटीएम की कतारों में मरने वाले कब के सौ से अधिक हो चुके हैं, देश में मजदूरों के सैकड़ों करोड़ कार्यदिवस खत्म हो चुके हैं, लोग भूख और निराशा में डूबे हुए हैं, कामकाज, कारोबार, कारखाने, और रोजाना की जिंदगी से जुड़े हर किस्म के रोजगार बुरी तरह तबाह हो चुके हैं, और केन्द्र सरकार के नोटबंदी के नियम सिरकटे मुर्गे की तरह चारों तरफ दौड़ रहे हैं, रास्ता बदल रहे हैं। हिन्दुस्तान के इतिहास में यह सबसे बड़ी मानवनिर्मित तबाही है, और सुप्रीम कोर्ट को इस पर कोई राहत देने की नहीं सूझी है! यह तर्क, न्याय, और समझ से परे का फैसला है कि दसियों करोड़ हिन्दुस्तानी आज तकलीफ में हैं, और सुप्रीम कोर्ट इसे कोई जरूरी मुद्दा न समझकर एक संवैधानिक बहस का मुद्दा मानकर इसे संविधान पीठ को दे रहा है।
लोगों को याद रखना चाहिए कि यह वही सुप्रीम कोर्ट है जो अपने आसपास के धूल और धुएं, धुंध और प्रदूषण से डरकर तरह-तरह के आदेश जारी करता है, उसे लागू करवाता है। यह वही सुप्रीम कोर्ट है जो दिल्ली के ट्रैफिक पर सुनवाई करता है, या सहारा जैसे खरबपति की जमानत पर कई-कई दिन का अपना समय लगाता है। यहां पर फिल्मी सितारे बहुत सा वक्त पाते हैं, और बहुत किस्म की रियायतें भी पाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज मानो स्टेडियम में बैठे हुए क्रिकेट देख रहे हों, और उसके सामने बीसीसीआई जैसे भ्रष्ट खेल संगठन बाउंसर फेंक रहे हों। जिस सुप्रीम कोर्ट के पास ऐसी तमाम बातों के लिए वक्त ही वक्त है, एक-एक कंपनी या संगठन के बोर्ड या संचालक मंडल की बैठक तय करने या टालने के लिए वक्त ही वक्त है, उसके पास बैंकों की कतारों में लगे लोगों की मौत, उनके इलाज, उनकी भूख के लिए वक्त नहीं है, और जहां पहली सुनवाई के दिन ही राहत दी जानी चाहिए थी, सरकार से रातों-रात जवाब मांगना था, वहां पर सुप्रीम कोर्ट इसे महीनों चलने वाली संवैधानिक बहस का मुद्दा मान रहा है।
इससे एक बात साबित होती है कि जमीनी हकीकत और तकलीफों से सुप्रीम कोर्ट कट चुका है। बड़े-बड़े जज अरबपति वकीलों की बहस को सुनते हुए इस मकडज़ाल में फंसे हुए दिखते हैं कि कौन से वकील के तर्क अधिक दमदार हैं। यह दम तौलना अधिक मायने रखते दिखता है, बजाय एक प्राकृतिक न्याय करने के। इंसाफ का तकाजा तो यह था कि केन्द्र सरकार को दिन भर कटघरे में खड़े रखकर उससे सुप्रीम कोर्ट जनता की तकलीफों को घटाने, उसे तुरंत राहत दिलवाने का कोई आदेश करती, लेकिन ऐसा लगता है कि सौ करोड़ आबादी की तकलीफें अकेले सुब्रत राय सहारा की दिक्कतों के मुकाबले कम मायने रखती हैं। यही हालत देश की संसद की है, जहां पर अरबतियों और करोड़पतियों से नीचे के लोग न के बराबर रह गए हैं। यही हाल प्रदेशों की विधानसभाओं का है। और यही हाल राजनीतिक दलों का है जिन्हें कि कल केन्द्र सरकार ने नोटबंदी से छूट दी है। गरीब का रोजगार, उसकी रोटी, उसका इलाज, यह सब कुछ राजनीतिक दलों के उस काले चंदे के मुकाबले कोई मायने नहीं रखता, जिस चंदे को सूचना के अधिकार से बाहर रखा गया है। कल से जब से यह खबर आई है कि राजनीतिक दलों को पुराने नोट जमा करने की छूट जारी रखी गई है, तब से देश की जनता सोशल मीडिया पर उबल पड़ी है कि सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के बीच संसद के भीतर और संसद के बाहर की नूराकुश्ती क्या इसीलिए थी कि राजनीतिक दल अपने कालेधन को बैंकों में जमा कराने की रियायत तो पा ही जाएं, वे दूसरों के पुराने नोटों को जमा करने की एक मशीन भी बन जाएं?
सुप्रीम कोर्ट ने देश की जनता को इस बुरी तरह निराश किया है कि जिसका कोई जवाब नहीं। और भारत की न्यायपालिका का इतिहास इसे एक बहुत बड़ी गलती के रूप में दर्ज भी करेगा। 

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