डिजिटल-जानकारी के खतरे, ट्रम्प से लेकर भारत तक

संपादकीय
18 दिसंबर 2016


अमरीका से, जैसी कि आशंका थी, ट्रम्प से जुड़ी हुई एक डरावनी खबर आ रही है कि अभी वहां की सबसे बड़ी कुछ कम्प्यूटर कंपनियों के साथ अपनी बैठक में निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यह मदद मांगी कि ये कंपनियां अपने रिकॉर्ड में दर्ज मुस्लिम-अमरीकियों की जानकारी सरकार को दें। एक खबर यह कहती है कि एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजान जैसी कंपनियों ने ट्रम्प को इसके लिए साफ मना कर दिया है। लोगों को याद होगा कि चुनाव अभियान के दौरान ट्रम्प ने यह घोषणा की थी कि अमरीका में बसे हुए मुस्लिमों के बारे में सरकार अलग से जानकारी जुटाकर उनकी प्रोफाइल तैयार करेगी। जो अमरीका दुनिया में अपने आपको एक मेल्टिंग-पॉट के रूप में स्थापित करके सभी धर्मों और रंगों का एक बेमिसाल मेल बना हुआ है, उस अमरीकी संस्कृति को खत्म करने पर ट्रम्प शुरू से आमादा है, और यह कोई नई बात नहीं है, ट्रम्प ने इसी हमलावर मुद्दे और तेवर के साथ यह चुनाव जीता है, और दुनिया के सामने, खासकर अमरीका के सामने वह एक बड़ा खतरा बनकर खड़ा हुआ है।
दुनिया में संकीर्णता और नफरत का एक नया सैलाब भारत से लेकर ब्रिटेन तक, और अमरीका के बाद जर्मनी और फ्रांस तक फैलते दिख रहा है। अमरीका की सारी खूबी उसकी मिलीजुली संस्कृति रही है, और वही हाल भारत का भी रहा है। भारत में सभी धर्मों, जातियों, और प्रांतों की मिलीजुली संस्कृति ने एक साथ रहकर ही तरक्की की है। लेकिन पिछले दो-तीन बरस में, पिछले आम चुनाव से लेकर अब तक, और अगले आम चुनाव तक, साम्प्रदायिक ताकतें बड़े हमलावर अंदाज में काम करते दिख रही हैं। कभी गाय के नाम पर, तो कभी तिरंगे के नाम पर, कभी राष्ट्रगान के नाम पर, तो कभी किसी के देशभक्त और देशद्रोही होने के नारे लगाकर इस देश की भावनाओं को टुकड़ा-टुकड़ा किया जा रहा है। फिर ऐसा भी नहीं है कि कुछ आक्रामक हिन्दू संगठन दूसरे धर्म के लोगों के साथ ऐसा बर्ताव कर रहे हैं। वे दूसरे धर्मों के साथ-साथ हिन्दू धर्म का हिस्सा रहे हुए दलितों के साथ भी वैसा ही बर्ताव कर रहे हैं, और उन्हें अपने से काटने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ वे उन आदिवासियों के साथ भी वही बर्ताव कर रहे हैं जिन्हें कि वे हिन्दू मानते-गिनते हैं, और जो दरअसल हिन्दू धर्म से परे अपनी आदिवासी संस्कृति में जीते हैं।
अमरीका के लोग अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए भारत के मुकाबले बहुत अधिक जागरूक हैं। और वहां पर ट्रम्प की यह नफरत एक चुनाव तो जीत सकती है, लेकिन वह अमरीकी जिंदगी के रूख को नहीं बदल सकेगी। वहां के लोग इस नफरत को रफ्तार से खारिज कर देंगे, और भावनात्मक दहशत दिखाकर ट्रम्प ने जो चुनाव जीता है, उसके पीछे अंतरराष्ट्रीय आतंकी घटनाएं भी रही हैं, और यह उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले चुनाव तक दुनिया और अमरीका में ऐसी नौबत नहीं रहेगी। फिलहाल अमरीकी कंपनियों पर ट्रम्प के इस दबाव से एक खतरा पूरी दुनिया पर दिखता है। भारत में भी आज लोगों की सारी निजी जानकारी, उनका लेन-देन, यह सब कुछ सरकारी कम्प्यूटरों पर दर्ज किया जा रहा है। जिस दिन इस देश की कोई सरकार ऐसी सारी जानकारी को अपने ही नागरिकों के खिलाफ इस्तेमाल करने की सोचेगी, तो आज की यह सारी डिजिटल-सहूलियत एक खतरनाक हथियार में तब्दील हो जाएगी। इसीलिए आज आधार कार्ड के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जो मामला चल रहा है, उसके मुद्दों को सुनकर उसके खतरों पर सोचने की भी जरूरत है कि सरकार के हाथ अपने नागरिकों की कितनी जानकारी रहनी चाहिए, और कितनी जानकारी बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ रहेगी। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें