तालाबों के लिए लड़ते-लड़ते चला गया एक बेहतर आदमी

संपादकीय
19 दिसंबर 2016


हिन्दुस्तान के तालाबों पर सबसे अधिक काम करने वाले एक गांधीवादी पर्यावरण आंदोलनकारी अनुपम मिश्र आज गुजर गए। वे तो चले गए लेकिन देश के तालाबों को बचाने की उनकी कोशिश इतिहास में दर्ज है, और आज इस मौके पर उनके उठाए हुए इस मुद्दे पर बातचीत जरूर होनी चाहिए जिसके लिए उन्होंने तमाम जिंदगी काम किया, और ऐसी किताबें लिखीं जो कि देश के तमाम भाषाओं में अनुवाद के बाद छपती रहीं, और मोटे तौर पर भारत के देश-प्रदेश की सरकारों के रूख के चलते जिन पर कोई काम नहीं हुआ। छत्तीसगढ़ जैसा प्रदेश जो कि तालाबों से भरापूरा प्रदेश रहा है, उसमें भी शहरों से लेकर पंचायतों तक तालाब तभी सरकारी नजरों में आए जब उन पर खर्च का कोई तरीका निकला। तालाबों के किनारों को खूबसूरत बनाना तो सरकार और स्थानीय संस्थाओं की प्राथमिकता रही, लेकिन इससे परे धरती और समाज के लिए तालाबों की जो बुनियादी भूमिका रही है, उस तरफ ध्यान नहीं दिया गया।
छत्तीसगढ़ को ही लेकर अगर हम बात करें, तो गांव-गांव में तालाबों से जुड़ी हुई जिंदगी को देखते हुए भी बढ़ती हुई आबादी, और धरती की भूजल की बढ़ती हुई जरूरत को देखते हुए भी तालाबों की गिनती नहीं बढ़ी, बल्कि रफ्तार से कम होती गई। तालाबों की जितनी गिनती बाकी है, उसमें भी तालाबों का इलाका घटते गया, और गाद भरने के कारण उनकी पानी रखने की क्षमता घट गईं। पूरे प्रदेश में, और बाकी देश में भी, पंप लगाकर जमीन से पानी तो निकाल लिया जाता है, लेकिन तालाबों के मार्फत जो पानी जमीन में वापिस डाला जा सकता था, वह काम लगातार घटते गया, क्योंकि तालाबों की गिनती घटी, उनके किनारों पर अवैध कब्जे हुए, और शहरी जरूरतों के लिए सैर-सपाटे के लिए भी तालाबों के किनारे पाट दिए गए। इस बढ़ती शहरी और ग्रामीण जरूरत के मुताबिक नए तालाब बनाने की जो अपार संभावना छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में थी, उस मोर्चे पर कोई काम नहीं किया गया। तरह-तरह के राहत कार्य, और सरकारी रोजगार के काम से जितने तरह के तालाब, प्रदेश के जितने हिस्सों में बनाए जा सकते थे, उस मोर्चे पर काम नहीं हुआ, और नतीजा यह है कि जमीन के भीतर पानी का जाना कम हो गया, नदियों में बहकर जाने वाली मिट्टी बढ़ गई, और उनमें बाढ़ आने लगी, और पंपों को हजार-हजार फीट की गहराई तक डालकर पानी निकालना पड़ रहा है।
अनुपम मिश्र को एक व्यक्ति के रूप में याद करने की जरूरत नहीं है। पूरे देश की सरकारें कहने के लिए उनका बड़ा सम्मान करती रहीं, उन्हें बुलाकर सुनती रहीं, और फिर उनकी किताबों की कुछ कापियां खरीदकर अपने लाइब्रेरी की आलमारियों में बंद करती रहीं, लेकिन जमीन पर तालाबों के लिए काम नहीं हुआ जो कि अनुपम मिश्र का पूरी जिंदगी का संघर्ष था। आज भी उनकी लिखी और कही हुई बातों पर अमल की जरूरत हर दिन बढ़ती चल रही है, क्योंकि भारत जैसे देश में तालाबों से चलने वाली जिंदगी को बदतर बनने से बचने के लिए तालाब सम्हालने की जरूरत है, और नए तालाब बनाने की जरूरत। अगर कोई तालाबों को महज इंसानों और जानवरों के इस्तेमाल का सामान मानकर चलते हैं, तो उन्हें यह समझना चाहिए कि तालाब महज किनारे तक जाकर इस्तेमाल के लिए नहीं होते, वे भूजल को बढ़ाने के लिए भी होते हैं, और ऐसी जरूरत के तालाब प्रदेश में आबादी से दूर भी बनाए जाने चाहिए जहां से पानी बहकर नदियों तक चले जाता है। जंगल या सुनसान इलाके के बीच भी ऐसे तालाब बनाए जा सकते हैं जिनका आबादी को कोई सीधा इस्तेमाल न हो, और जो महज धरती के लिए बनाए जाएं। राज्य सरकारें चाहें तो आबादी से दूर के ऐसे तालाब मशीनों से भी बनवा सकती हैं, और धरती की इस जरूरत, इंसानों और जानवरों की इस जरूरत को महज रोजगार से जोड़कर देखना भी ठीक नहीं है। अनुपम मिश्र को याद करने का एक तरीका यही हो सकता है कि लोग तालाबों की बात करें, उनके लिए कुछ करें, उनकी गिनती बढ़ाएं, उनका क्षेत्रफल बढ़ाएं, उनकी गहराई बढ़ाएं, और अपनी खुद की जिंदगी बेहतर बनाएं। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें