नोटबंदी को देशभक्ति से जोडऩे के बजाय विश्लेषण की जरूरत

संपादकीय
2 दिसंबर 2016


इंसान का मिजाज बड़ा ही अनोखा होता है। लोगों को दूसरे का दर्द देखकर अपना दर्द कम लगने लगता है। पहले कहा जाता था कि जिनके घरों में दीवारों से पानी रिसना, नमी भीतर आना जब किसी तरह से न रूके, तो ऐसे लोगों को वे घर ले जाकर दिखाने चाहिए जहां उनके घर से भी अधिक पानी रिसता हो, तो उनका दर्द कम हो पाता है। हमारा भी यही ख्याल है कि जो लोग अपनी जिंदगी से बहुत अधिक निराश हो गए हैं, उन लोगों को किसी बड़े सरकारी अस्पताल के भीतर का एक पूरा चक्कर लगा लेना चाहिए, और उनको अपनी खुद की जिंदगी बड़ी अच्छी लगने लगेगी।
आज भारत में नोटबंदी के चलते जितने लोगों का बुरा हाल है, उनके भीतर भी एक अजीब सी तसल्ली देखने मिल रही है। दुनिया के लोग इस बात पर हैरान हैं कि हिन्दुस्तान के लोग इतनी तकलीफ पाते हुए भी बगावत क्यों नहीं कर रहे हैं? लेकिन लोगों से बात करें तो पता लगता है कि जब अच्छे खासे पैसे वाले लोग भी बैंकों की कतार में लगे हैं, एटीएम पर खड़े हैं, फल और सब्जी वालों से उधार ले रहे हैं, अपने घरेलू कर्मचारियों को तनख्वाह लेट देने की बात कर रहे हैं, तो उनकी बदहाली देखकर उनसे कम कमाई वाले और उनसे अधिक गरीब लोगों को एक अजीब सी तसल्ली मिल रही है। गांवों में बहुत गरीब और मजदूर लोग हजार-पांच सौ के लिए कतार में लगे हैं, और वहां उनको यह देखकर बड़ा मजा आ रहा है कि गांव का बड़ा किसान, कल का मालगुजार, या कि सवर्ण जाति का कोई व्यक्ति बाकी आम लोगों के साथ-साथ कतार में खड़े रहने को मजबूर है।
मुंबई से आज एक तस्वीर किसी युवती ने पोस्ट की है कि फिल्म अभिनेता अनिल कपूर एटीएम की कतार में खड़े हैं। अनिल कपूर की संपन्नता से यह तो जाहिर है कि उनके पास कई तरह के क्रेडिट और डेबिट कार्ड होंगे। लेकिन अगर उनको भी जेब में कुछ नगद पैसों की जरूरत है, तो यह जाहिर है कि देश के सबसे अधिक संपन्न तबके का काम भी बिना नगदी के नहीं चल रहा है। आज बाजार में प्लास्टिक करेंसी को बढ़ावा देने के लिए सरकार और बैंक छोटे-छोटे दुकानदारों को भी ऐसी मशीनें लेने को कह रहे हैं जिससे लोग बिना नगदी भी क्रेडिट-डेबिट कार्ड से भुगतान कर सकें। लेकिन सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि आज देश में चार फीसदी लोगों के पास ही क्रेडिट कार्ड है। डेबिट कार्ड हो सकता है कि एक चौथाई आबादी के पास हो, लेकिन छोटी खरीददारी और छोटी-छोटी मजदूरी का भुगतान प्लास्टिक करेंसी से होने में खासा वक्त लगेगा, और तब तक रोज कमाने-खाने वाले ऐसे छोटे लोगों का इतना नुकसान हो चुका रहेगा, कि उसकी भरपाई आने वाले वक्त में कोई नहीं कर पाएंगे।
रही बात दूसरों की तकलीफ को देखकर राहत पाने की, तो वही एक बात ऐसी है जो आज देश के लोगों को हाथ में पत्थर उठाने से रोक रही है। इसके अलावा एक बात और है, नोटबंदी को जिस तरह से राष्ट्रभक्ति के साथ, राष्ट्रवाद के साथ, शहादत के साथ जोड़कर उसे त्याग का एक उदाहरण साबित किया जा रहा है, उससे भी बहुत से लोगों को यह लग रहा है कि वे देश की सरहद पर फौजी मोर्चे पर खड़े होकर त्याग कर रहे हैं, और आने वाली पीढिय़ों को यह बताएंगे कि नोटबंदी के वक्त पैसे पाने के लिए वे कितने दिन या कितने घंटे कतार में लगे थे, और अब तो शायद दिखाने के लिए उसकी सेल्फी भी रहेगी।
लेकिन जब सरकार की किसी योजना और उस पर अमल की बात आती है, तो राजनीतिक पसंद-नापसंद से परे भी यह समझना जरूरी होगा कि फैसले में कौन सी खामियां थीं, और अमल में कौन-कौन सी चूक थीं। इसके बिना सरकार को खुद को एक सबक नहीं मिल सकेगा, और इतना बड़ा तजुर्बा बार-बार तो मिलता नहीं है। आज देश में राजनीतिक माहौल नफरत से भरा हुआ है, और ऐसे में नोटबंदी की आलोचना को देशद्रोह करार देने वाले लोग राष्ट्रवाद का चश्मा लगाकर हकीकत को देखने से मना कर रहे हैं। ऐसे लोगों की भीड़ से उनका भी कोई फायदा नहीं होता जिनके समर्थन में यह भीड़ रहती है। ऐसी भीड़ किसी मजमे का माहौल बनाने के काम आ सकती है, लेकिन किसी चुनाव में समर्थकों की ऐसी अंधभक्त भीड़ लोगों को धोखे में रखकर निपटा भी सकती है। इसलिए नोटबंदी के तमाम पहलुओं पर चर्चा होनी चाहिए, और इसे इंसानी मिजाज या देशभक्ति से जोड़कर देखने की गलती नहीं करनी चाहिए। यह एक सरकारी फैसला है, और यह विश्लेषण और आलोचना के लिए खुला रहना चाहिए।

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